| अमेरिका पर उसकी जीडीपी से 3.5 गुना अधिक 105.2 ट्रिलियन (खरब) डॉलर का कर्ज, वैश्विक स्तर पर बढ़ता डी-डॉलरीकरण, विश्व में घटती साख तथा सैन्य धमकी और हस्तक्षेप से दुनिया भर के देश उसके विरुद्ध लामबंद हो रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका की दादागिरी, एकाधिकार व वर्चस्व अब ज्यादा दिन नहीं चलेगा। |
हाल में दो समाचारों ने ध्यान खींचा है। एक, यह कि भारत ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड के लिए अपने जोखिम को तेजी से कम करते हुए वैश्विक बाजारों को एक महत्वपूर्ण वित्तीय संकेत दिया है। दूसरी, कि उच्च शिक्षा शोधपत्रों की वैश्विक रैंकिंग में अब अमेरिका के हार्वर्ड जैसी संस्थाओं का वर्चस्व समाप्त हो रहा है और उनकी जगह चीन और अन्य देशों के संस्थान ले रहे हैं। दोनों बातों के अलग-अलग निहितार्थ हैं, जिन पर हम आगे बात करेंगे। मोटे तौर तात्पर्य है कि दुनिया में अमेरिका का महत्व कम होता जा रहा है। बेशक इसमें समय लगेगा, पर उसकी शुरुआत हो चुकी है।
पहले अमेरिकी बॉन्ड का मतलब समझें। अमेरिकी बॉन्ड एक प्रकार के ऋणपत्र हैं। अमेरिका अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दूसरे देशों से कर्ज लेता है। पिछले एक वर्ष में भारत ने 50 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के अमेरिकी बॉन्ड बेचे हैं, जिससे इसकी होल्डिंग में 21 प्रतिशत से अधिक की कटौती हुई है। भारत की अमेरिकी ट्रेजरी होल्डिंग लगभग 241 अरब डॉलर से गिरकर 190 अरब डॉलर हो गई, जो 4 वर्षों में पहली वार्षिक गिरावट है।
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भारत ने इन बॉन्डों को तब बेचा है जब अमेरिकी ट्रेजरी का ब्याज 4 प्रतिशत से ऊपर है। ऐसे मौकों पर भारत ने और खरीदने के बजाय उन्हें बेचना पसंद किया। इसका अर्थ है कि भारत को कुछ दिखाई दे रहे हैं। यह निर्णय लाभ-हानि को देखकर नहीं, वैश्विक-व्यवस्था में आ रहे बदलाव के कारण है। विश्लेषकों के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक डॉलर के कमजोर होते प्रदर्शन और भू-राजनीतिक जोखिमों को देखते हुए निर्णय कर रहा है। डॉलर इंडेक्स में हाल ही में लगभग 8 वर्षों में सबसे खराब वार्षिक गिरावट देखी गई, जिससे वैश्विक स्तर पर विश्वास कम हो रहा है।
भारत ने सोने की खरीद और गैर-डॉलर परिसम्पत्तियों पर पैसा लगाना शुरू किया है ताकि भविष्य सुरक्षित रहे। भारत का सोने का भंडार बढ़कर लगभग 880 टन हो गया है। एक दशक पहले की तुलना में अब भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। याद करें 1991 को जब भारत को अपना सोना बेचना पड़ा था। ऐसा लग रहा है कि दुनिया के देशों ने धीरे-धीरे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना और सोने जैसी ठोस और शुद्ध सम्पत्ति को प्राथमिकता देना शुरू किया है। भारत का यह कदम ब्रिक्स देशों द्वारा उठाए गए ऐसे ही कदमों के अनुरूप है। यह बात वैश्विक स्तर पर बढ़ते डी-डॉलरीकरण को दर्शाती है।
अमेरिका के 25 ट्रिलियन डॉलर के सरकारी बॉन्ड दुनिया में प्रचलित हैं। अनेक कम्पनियों, दूसरे देशों की सरकारों और निजी निवेशकों ने इन बॉन्ड्स में निवेश किया है। अमेरिका की इस व्यवस्था से दुनिया की वित्तीय व्यवस्था चलती है। कभी अमेरिकी व्यवस्था में डिफॉल्ट हुआ तो तत्काल और दूरगामी दोनों तरह के संकट पैदा होंगे। एक और बात जो महत्वपूर्ण है, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से डॉलर ने वस्तुतः वैश्विक मुद्रा का स्थान ले लिया था, जिसमें अब बदलाव आ रहा है।
इस प्रक्रिया की गति बहुत तेज नहीं है, पर संकेत मिलने लगे हैं। रूस और चीन की इसे तेज करने में अग्रणी भूमिका है। ईरान ने चीन और रूस के साथ डॉलर में कारोबार बंद कर दिया है। सऊदी अरब ने घोषणा की है कि हम पेट्रोडॉलर के माध्यम से कारोबार बंद कर रहे हैं और उसके स्थान पर पेट्रोयुआन स्वीकार कर रहे हैं। कुछ वर्ष पहले फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा था कि यूरोप को भी अमेरिकी डॉलर का सहारा लेना बंद करना चाहिए।
पहले विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर कर सामने आया था। सबसे ज्यादा सोना भी अमेरिका के पास जमा हुआ। उसके पहले तक पाउंड स्टर्लिंग अंतरराष्ट्रीय कारोबारी मुद्रा थी। दूसरे विश्व युद्ध के बाद विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की स्थापना से अमेरिकी डॉलर ने वैश्विक मुद्रा का स्थान ले लिया था।
अमेरिकी डॉलर तब स्वर्ण आधारित मुद्रा थी। 60 के दशक के उत्तरार्ध में यूरोप और जापान की वस्तुओं ने अमेरिकी माल से प्रतिस्पर्धा शुरू कर दी। इसके साथ ही डॉलर का प्रसार पूरी दुनिया में होने लगा। रिचर्ड निक्सन के कार्यकाल में 1971 में डॉलर को स्वर्ण मानक से अलग कर दिया गया। अब वह केवल कागजी मुद्रा है, स्वर्ण मुद्रा नहीं। अमेरिका अपने घाटे को पूरा करने के लिए डॉलर छापता है। कागजी मुद्रा के रूप में डॉलर की साख कब तक बनी रहेगी?
डी-डॉलरीकरण व्यापार, वित्त और विदेशी मुद्रा भंडार के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की वैश्विक प्रवृत्ति है, जिसके साथ अमेरिका का प्रभुत्व क्रमशः कम हो रहा है। इसे डी-अमेरिकनाइजेशन कहा जा रहा है। चीन, रूस और ब्रिक्स देश अब स्थानीय मुद्राओं और सोने जैसे विकल्पों को बढ़ावा दे रहे हैं।
हाल में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक समाचार छापा है कि नीदरलैंड के लीडेन विवि की अकादमिक प्रकाशनों के आधार पर जारी रैंकिंग में अब चीनी विश्वविद्यालयों का बोलबाला है। हाल के वर्षों तक हार्वर्ड से दुनिया के सबसे अधिक रिसर्च पेपर आते थे, पर अब स्थिति बदल रही है। इस रैंकिंग में हार्वर्ड तीसरे स्थान पर आ गया है। 2000 के दशक की शुरुआत में 7 अमेरिकी शिक्षा संस्थान दुनिया के पहले 10 में शामिल थे, जिनमें हार्वर्ड विश्वविद्यालय नम्बर एक पर था। केवल एक चीनी स्कूल, झेजियांग विश्वविद्यालय शीर्ष 25 में जगह बना पाया था।
आज लीडेन रैंकिंग में झेजियांग पहले स्थान पर है और 7 अन्य चीनी संस्थान शीर्ष 10 में हैं। हार्वर्ड एकमात्र अमेरिकी विश्वविद्यालय है जो टॉप 10 की सूची में है। यह रैंकिंग केवल एक आधार पर है। बेशक अमेरिकी विश्वविद्यालय आज भी समग्र रूप से दुनिया में सबसे आगे हैं, पर स्थिति अब तेजी से बदल रही है। चीन अपने विश्वविद्यालयों में अरबों डॉलर डाल रहा है और उन्हें विदेशी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षक बनाने के लिए आक्रामक रूप से काम कर रहा है।
अमेरिका का वैश्विक-प्रभुत्व तीन मुख्य कारणों से है। 1. सैन्य-बल, 2. अर्थव्यवस्था और 3. सॉफ्ट पावर, यानी लाइफ स्टाइल और संस्कृति। 1992 में अमेरिकी विद्वान फ्रांसिस फुकुयामा ने अपनी पुस्तक ‘द एंड ऑफ हिस्ट्री’ यानी ‘इतिहास का अंत’ में एक तरह से अमेरिकी दिग्विजय की घोषणा कर दी थी। इसके अनुसार शीत युद्ध के बाद अमेरिकी पूंजीवादी उदार लोकतंत्र की जीत के साथ, मानव वैचारिक विकास का अंतिम बिंदु आ गया है। अब कोई बड़ा वैचारिक संघर्ष नहीं बचा है। अस्तु उस घोषणा के 3 दशक बाद आज लग रहा है कि इतिहास की यात्रा जारी है।
19 जनवरी, 2023 को अमेरिका अपनी तय ऋण सीमा (डेट सीलिंग) तक पहुंच गया था, जिसके बाद ट्रेजरी विभाग ने ’असाधारण उपायों’ का प्रयोग करना शुरू किया ताकि सरकार अपने बिलों का भुगतान जारी रख सके। यह स्थिति जून 2023 तक चली जब तक कि संसद ने ऋण सीमा बढ़ाई या निलम्बित नहीं कर दी, जिससे देश एक बड़े वित्तीय संकट से बच पाया। सामान्यतः सरकारें अपनी आय से ज्यादा खर्च करती हैं और आय-व्यय के अंतर को पूरा करने के लिए ऋण लेती हैं। इस स्थिति से बचने का एक तरीका यह है कि खर्च कम किया जाए। दूसरा तरीका है कि टैक्स बढ़ाए जाएं। तीसरा तरीका है कर्ज लिया जाए। इन तीनों तरीकों के संतुलन को राजकोषीय कौशल का नाम दिया जाता है।
अमेरिका में 1960 के बाद से सार्वजनिक ऋण सीमा को 78 बार बदला या बढ़ाया जा चुका है। इस परिघटना को भी अमेरिका के पराभव के रूप में देखा जाता है। वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी के दबाव में दुनिया के ज्यादातर देश कानून बनाकर जीडीपी के अनुपात में अपने राजकोषीय घाटे की सीमा तय कर चुके हैं। सामान्य तौर पर यह सीमा 3 प्रतिशत की है। भारत में भी केंद्र के लिए 3 प्रतिशत है और राज्यों के लिए भी 3 प्रतिशत यह सीमा है। अमेरिका में इस तरह का कोई कानून नहीं है। इसके बजाय वहां कुल सार्वजनिक ऋण के लिए एक सीमा है, जिससे इस ऋण को कभी ऊपर नहीं निकलना चाहिए। इस समय यह सीमा 41.1 ट्रिलियन (खरब) डॉलर की है, जबकि देश की जीडीपी 31 ट्रिलियन के आसपास है। राष्ट्रपति ट्रम्प चाहते हैं कि कर्ज लेने की सीमा एकदम समाप्त कर दी जाए।
2010 के अंत से अमेरिकी पराभव वैश्विक चिंता का विषय है। इस चिंता को राष्ट्रपति ट्रम्प अपने ‘मागा या मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ नारे से मिटाना चाहते हैं। प्रश्न है कि क्या वे मिटा पाएंगे? बड़ी संख्या में अमेरिकी विचारक मानते हैं कि जब तक अमेरिका विश्व-व्यवस्था को चलाने में अनेक देशों के साथ गठबंधन बनाकर अपनी भूमिका निभा रहा था, तब तक उसका वैश्विक प्रभाव भी था।
कई अर्थों में वही अमेरिकी साम्राज्य था। यूरोप को युद्ध की बर्बादी से उबारने के बाद अमेरिका ने गैर-कम्युनिस्ट देशों के बीच एक प्रमुख आर्थिक और सैन्य स्थिति स्थाई रखी। ट्रम्प ने 20 जनवरी 2025 को नया पदभार ग्रहण करने के बाद उस भूमिका को ध्वस्त कर दिया। अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में भूमिका निभाई, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्थापना की, विश्व व्यापार संगठन बनाने में सहयोग किया। बेशक इन संगठनों ने हमेशा अमेरिकी हितों की रक्षा की, पर वे कभी अमेरिकी शक्ति के स्पष्ट माध्यम नहीं बने।
अमेरिकी विद्वान पॉल क्रुगमैन ने लिखा, आज हम पर कोई विश्वास नहीं करता। दुनिया हमसे नहीं डरती। ट्रम्प ने सोचा होगा, उनके टैरिफ से भारत राहत के लिए उनके पास आएगा। इसके बजाय भारत आगे बढ़ता दिख रहा है। वह चीन के साथ घनिष्ठ सम्बंध बना रहा है। दुनिया को हमारी आवश्यकता नहीं रह गई है। विनाश काले, विपरीत बुद्धि।
– प्रमोद जोशी
-प्रमोद जोशी

