| हम अपनी एकता भूल गए, स्वार्थ बढ़ गया, समाज गुणहीन बन गया, अनुशासन नहीं रहा। दरिद्रता, गरीबी और अज्ञान उत्पन्न हुआ। समाज को गुणवान, अनुशासित, समृद्ध और संगठित बनाए बिना स्वतंत्रता को टिकाया नहीं जा सकता। इसी उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार ने विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। |
संघ समाजरूप संगठन खड़ा करना चाहता है। समाज संगठित और गुणवान बनेगा तभी देश में परिवर्तन आएगा। नेता–नारा–नीति–पार्टी–अवतार–सरकार–विचार–तत्वज्ञान ये सभी बातें सहायक हैं, समाज इन सभी का मालिक है। इसलिए मालिक को मूल रूप से जागरूक होना चाहिए, यह उद्बोधन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने दिया।
संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘संघ यात्रा के 100 वर्ष : नए क्षितिज’ इस दो दिवसीय संवाद कार्यक्रम में मुंबई की 900 से अधिक प्रतिष्ठित गणमान्य हस्तियों को उन्होंने मार्गदर्शन किया। वर्ली स्थित नेहरू सेंटर में शनिवार दि. 07 फरवरी के दिन संपन्न हुए पहले सत्र में डॉ. मोहन भागवत जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणादायी यात्रा, उसकी ऐतिहासिक प्रगति और समाज में योगदान का विस्तार से अवलोकन करते हुए, स्थापना से लेकर आज राष्ट्रनिर्माण में निभाई गई भूमिका तक की यात्रा को स्पष्ट किया। इस अवसर पर मंच पर पश्चिम क्षेत्र संघचालक डॉ. जयंतीभाई भाडेसिया, कोंकण प्रांत संघचालक अर्जुन चांदेकर, मुंबई महानगर संघचालक सुरेश भगेरिया उपस्थित थे।
पहले सत्र में उपस्थित जनों को संबोधित करते हुए पू. सरसंघचालक ने कहा कि संघ के स्वयंसेवक संचलन करते हैं, लेकिन वह कोई पैरामिलिट्री संगठन नहीं है। संघ के स्वयंसेवक लाठी-काठी चलाते हैं, लेकिन संघ कोई अखिल भारतीय अखाड़ा नहीं है। संघ में भारतीय रागों के आधार पर घोष, व्यक्तिगत गीत, सामूहिक गीत होते हैं, इसलिए संघ कोई अखिल भारतीय संगीत विद्यालय नहीं है।
संघ के स्वयंसेवक राजनीति में भी हैं, इसलिए वह कोई राजनीतिक दल नहीं है। केवल बाहरी रूप के आधार पर संघ का मूल्यांकन करने से गलतफहमियां पैदा होंगी। यदि संघ को समझना है, तो संघ शाखा का अनुभव लेना होगा। संघ की शाखा, कार्यकर्ता, उनका परिवार, कार्यक्रम, वर्ग, शिविर इनका सूक्ष्म निरीक्षण प्रत्यक्ष रूप से करने पर ही संघ को सही रूप में समझा जा सकता है।
आगे उन्होंने कहा कि संघ का कार्य देश के लिए है। संघ किसी से प्रतिस्पर्धा करने या किसी की प्रतिक्रिया के कारण नहीं चलता। संघ किसी के विरोध में नहीं है। बिना किसी का विरोध किए संघ का कार्य चलता है। संघ सत्ता या प्रसिद्धि की आकांक्षा नहीं रखता।
संघ स्थापना की पृष्ठभूमि पर बोलते हुए पू. सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार ने स्वतंत्रता आंदोलन की सभी धाराओं का अनुभव और चिंतन किया। इतिहास में भी हम बार-बार गुलाम बने। पराक्रम से स्वतंत्रता वापस पाई, लेकिन वह टिक नहीं सकी। अब भी हमें स्वतंत्रता मिलेगी, लेकिन फिर से गुलामी नहीं आएगी—इसकी क्या गारंटी है? हमारे समाज में कुछ कमी है, यह डॉ. हेडगेवार ने पहचाना।
हम अपनी एकता भूल गए, स्वार्थ बढ़ गया, समाज गुणहीन बन गया, अनुशासन नहीं रहा। दरिद्रता, गरीबी और अज्ञान उत्पन्न हुआ। समाज को गुणवान, अनुशासित, समृद्ध और संगठित बनाए बिना स्वतंत्रता को टिकाया नहीं जा सकता। इसी उद्देश्य से डॉ. हेडगेवार ने विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

पू. सरसंघचालक ने स्पष्ट किया कि भारत का स्वभाव सनातन है। उन्होंने कहा, “धर्मनिरपेक्षता शब्द गलत है, इसके स्थान पर पंथनिरपेक्षता शब्द होना चाहिए। बहना पानी का और जलना आग का धर्म है। धर्म हमारा स्वभाव और कर्तव्य है, जो इहलोक और परलोक में सुख देता है। धर्म सभी को उन्नत करता है। धर्म जिस सत्य के आधार पर खड़ा है, वह अस्तित्व की एकता का संदेश है। हमें महासत्ता नहीं बनना है। महासत्ता बल से अपना वर्चस्व स्थापित करती है। हमें विश्वगुरु बनना है। पूरे विश्व को जोड़ना है।”
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उन्होंने संबोधित करते हुए कहा कि हमारे समाज के संगठित शक्ति के आधार पर देश को शक्तिशाली बनाने हेतु समाज को सशक्त करने के ध्येय को लेकर संघ आगे बढ़ रहा है। यदि आप सभी इसमें सहभागी होंगे तो कार्य अधिक गति से होगा। दैनिक शाखा में उपस्थित रहकर शरीर, मन, बुद्धि को मजबूत बनाने के लिए व्यायाम करना यह तो एक काम है ही, परंतु अपने-अपने रुचि और क्षमता अनुसार स्वयंसेवकों एवं सज्जनशक्ति द्वारा चलाए गए देशहित के कार्यों में सहभागी होने तथा प्रामाणिक रूप से निस्वार्थ बुद्धि से समाज हित के लिए कोई भी कार्य करने पर आप संघ का ही कार्य कर रहे हैं, ऐसा संघ समझता है। इस मार्ग से भी आप स्वयं संघ से जुड़ सकते हैं। ‘if you have a theme, we have a team; if you have a team, we have a theme’ ऐसी आज संघ की स्थिति है।

स्वदेशी और स्वबोध पर प्रकाश डालते हुए पू. सरसंघचालक जी ने कहा कि ऐसे बहुत से विदेशी वस्तु है, जिसके बिना हमारा दैनिक व्यवहार चल सकता है। हमारे देश का रोजगार कैसे बढ़े, इसका विचार कर के ही वस्तु खरीदी करने का विचार प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। अपरिहार्य अंतरराष्ट्रीय व्यवहार भी किसी के दबाव में आए बिना हमारे देश के वातावरण के अनुकूल पद्धति से करना सम्भव होगा।
सामाजिक समरसता, पर्यावरण, स्वबोध, कुटुंब प्रबोधन, संविधान आधारित नागरिक कर्तव्य का पालन, इन पंच बिंदुओं पर दैनिक व्यवहार में अधिकाधिक जोर देने का आग्रह स्वयंसेवकों सहित सभी को करना चाहिए, यह संघ कार्य का वर्तमान समय में प्रमुख भाग होने के कारण पंच परिवर्तन के के संकल्प को पू. सरसंघचालक जी ने अपने उद्बोधन में विस्तार से बताया। इस पंच परिवर्तन को व्यवहार में लाने हेतु स्वयंसेवकों को पहल करनी चाहिए। धीरे-धीरे यह समाज मे संक्रमित होगा, इसके लिए विशेष प्रयास करे, ऐसा आह्वान उन्होंने किया।
इस कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योगपति, फिल्म जगत के गणमान्य व्यक्ति, डॉक्टर, वैज्ञानिक, शिक्षाविद, विधिवेत्ता, खिलाड़ी, मीडिया प्रतिनिधि, सामाजिक संस्थाओं के सदस्य, धर्मगुरु, लेखक, सोशल मीडिया तथा विज्ञापन क्षेत्र के पेशेवर शामिल हुए। इनमें राधाकिशन दमाणी, अभिनेता सलमान खान, रणवीर कपूर, हेमा मालिनी, संजय जिंदल, दीपक पारेख, अजय पिरामल, सुभाष चंद्रा, रोनी स्क्रूवाला, विनीत जैन, नितेश तिवारी, मोहित सूरी, रमेश तौरानी, बोनी कपूर, ओम राउत, वरिष्ठ निर्देशक सुभाष घई, पार्श्वगायक अदनान सामी, निर्देशक विपुल शाह, इंदर कुमार, प्रसाद ओक, आईआईटी मुम्बई के शिरीष केदारे, स्वामी स्वरूपानंद, अक्षत गुप्ता, अभिनेत्री अश्विनी भावे, ज्येष्ठ गायिका अनुराधा पौडवाल, वरिष्ठ पत्रकार भाऊ तोरसेकर, दै. पुढारी के योगेश जाधव, संस्कार भारती कोंकण प्रांत अध्यक्ष अभिनेता सुनील बर्वे, मुंबई विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. रविंद्र कुलकर्णी, एसएनडीटी विश्वविद्यालय की कुलगुरु डॉ. उज्वला चक्रदेव, इज़राइल–इटली दूतावास के अधिकारी सहित भारत के सिंधी गुरुद्वारा के प्रमुख जसकीरत जी भाईसाहब, अमर सिंह जी, राम सिंह राठौड़, कैबिनेट मंत्री नीतीश राणे, सांसद एवं वरिष्ठ अधिवक्ता उज्ज्वल निकम समेत अन्य मान्यवर उपस्थित थे। इससे संघ का व्यापक और समावेशी संपर्क रेखांकित हुआ।
कार्यक्रम के पहले दिन गहन व्याख्यान और संवाद पर जोर दिया गया, जबकि दूसरे दिन सर्वसमावेशक प्रश्नोत्तर सत्र का आयोजन किया गया है। इसमें सहभागी सदस्यों को विभिन्न राष्ट्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर सीधे प्रश्न पूछने और स्पष्टता प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
कार्यक्रम का संचालन कोंकण प्रांत कार्यकारिणी सदस्य विवेक भागवत ने किया। मंचासीन अतिथियों का परिचय कोंकण प्रांत सहसंघचालक विष्णु वझे ने कराया। कार्यक्रम की प्रस्तावना कोंकण प्रांत संपर्क प्रमुख अजय जोशी ने रखी। उन्होंने बताया कि संघ शाखा विस्तार, गृहसंपर्क अभियान और समाज की गणमान्य हस्तियों से संपर्क जैसे विभिन्न कार्यक्रम आने वाले समय में संघ के माध्यम से किए जाएंगे।
समाज के लिए आदर्श उदाहरण ही प्रेरणादायी
- बस्तियों में, गांव-गांव में, चरित्रवान और निस्वार्थ बुद्धि से कार्य करने वाले, सभी के सुख-दुःख में सहभागी होने वाले ईमानदार व्यक्तियों के उदाहरण निर्माण हों और वे देशव्यापी बनें—इस उद्देश्य से संघ कार्य करता है।
– डॉ. मोहन भागवत जी
सज्जनशक्ति से मित्रता मूलभूत भाव
- हम समाज के प्रेम और सज्जनों की भावना के बल पर चले और कार्यकर्ताओं के विश्वास पर आगे बढ़े। संघ का विरोध हुआ, आज भी हो रहा है, परंतु विरोधियों के विरुद्ध कटुता का भाव न रखते हुए संघ के कार्यकर्ता आगे बढ़े। सज्जनों से मित्रता और सज्जनशक्ति का जागरण यह हमारे संघकार्य का मूलभूत भाव रहा। समय बदला, परिस्थिति बदली, पर संघ ने अपनी दिशा नहीं बदली और अपने ध्येय की ओर संघ आगे बढ़ रहा है।
देशभर में समाज के सहयोग से 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवाकार्य शुरू है। साप्ताहिक या दैनिक शाखा के माध्यम से देश के लगभग साढ़े 6 लाख गांव व 43 हजार शहरी बस्ती में से लगभग सवा लाख गांवों व 23 हजार बस्ती तक संघ कार्य पहुंचा है। शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संघकार्यों का विस्तार अधिक व्यापक करने की ओर संघ प्रयत्नशील है।

