| जब हम प्रकृति से सीधा, स्थिर और त्वरित उत्तर की अपेक्षा करते हैं, तब हमें भ्रम का अनुभव होता है। विज्ञान हमें सिखाता है कि संकेतों को सतह पर नहीं, संदर्भ में पढ़ा जाए। जो झूठ प्रतीत होता है, वह अधूरा पाठ है। |
प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध जितना प्राचीन है, उतना ही जटिल भी। कभी उसे माँ कहा गया, कभी गुरु और कभी न्यायाधीश। किंतु जब यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या प्रकृति झूठ बोलती है, तब वास्तव में हम प्रकृति से अधिक अपनी ही व्याख्यात्मक सीमाओं की परीक्षा कर रहे होते हैं। प्रकृति जिन संकेतों के माध्यम से स्वयं को व्यक्त करती है, वे सरल, एकार्थी या नैतिक श्रेणियों में बंधे हुए नहीं होते। दृश्य सौंदर्य, सुगंध, ध्वनि, रंग और आकृति, ये सभी मिलकर ऐसी बहुस्तरीय भाषा निर्मित करते हैं जिसमें अर्थ संदर्भ-सापेक्ष होता है। यही संदर्भ-सापेक्षता अनेक बार भ्रम का रूप ले लेती है।
सूक्ष्म स्तर पर जीवन की उत्पत्ति और उसका संचालन संकेतों पर ही आधारित है। मानव शरीर में सहजीवी रूप से रहने वाले लैक्टोबैसिलस एसिडोफिलस और बिफीडोबैक्टेरियम लॉन्गम सामान्य परिस्थितियों में पाचन, प्रतिरक्षा और चयापचय के सहायक माने जाते हैं। किंतु प्रतिरक्षा-क्षय या पारिस्थितिक असंतुलन की स्थिति में यही सूक्ष्मजीव अवसरवादी व्यवहार प्रदर्शित कर सकते हैं। यहाँ कोई झूठ नहीं, बल्कि परिस्थितियों के साथ बदलता जैविक संदर्भ है। जो संकेत एक अवस्था में सुरक्षा का प्रतीक था, वही दूसरी अवस्था में चेतावनी बन जाता है।
मिट्टी के पारिस्थितिक तंत्र में स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस और बैसिलस सबटिलिस जैसे जीव जड़ों के समीप ऐसे जैव-रसायन छोड़ते हैं जो पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं। कृषक के लिए यह उर्वरता का संकेत होता है, पर उसी स्थान पर सूक्ष्मजीवों के बीच संसाधनों को लेकर तीव्र प्रतिस्पर्धा भी चल रही होती है। हरियाली और गंध स्थायित्व का आभास देती है, जबकि सूक्ष्म स्तर पर संतुलन अत्यंत क्षणिक होता है। यह प्रकृति का छल नहीं, बल्कि मानवीय इंद्रियों की सीमाओं का प्रतिबिंब है।
पादप जगत में संकेत और भ्रम की यह भाषा और अधिक जटिल रूप धारण कर लेती है। भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से फैली लैंटाना कैमारा अपने आकर्षक पुष्पों द्वारा परागणकर्ताओं को आमंत्रित करती है, जबकि उसके द्वारा स्रावित ऐलिलोपैथिक रसायन आसपास की वनस्पतियों के विकास को बाधित करते हैं। दृश्य स्तर पर यह पौधा निर्दोष प्रतीत होता है, किंतु पारिस्थितिक स्तर पर वह एक आक्रामक रणनीतिकार है। इसी प्रकार ब्रैसिका जूनसिया जैसे पौधे कीट-आक्रमण की स्थिति में वाष्पशील यौगिक उत्सर्जित करते हैं, जो परजीवी ततैयों को आकर्षित करते हैं। पौधा स्वयं संघर्ष नहीं करता, बल्कि संकेतों के माध्यम से जैविक सहयोग सक्रिय करता है।

मेघालय के वर्षावनों में पाई जाने वाली नेपेंथीस खासियाना आकर्षण को शिकार की रणनीति में बदल देती है। मीठी गंध, चमकदार किनारे और फिसलनयुक्त सतह आमंत्रण का संकेत देती हैं, जबकि भीतर पाचक द्रव सक्रिय रहता है। यहाँ सौंदर्य सत्य का नहीं, बल्कि कार्यकुशलता का आवरण बनता है। ऑर्किड कुल की कई प्रजातियाँ परागणकर्ताओं के मादा फेरोमोन की नकल करती हैं, पर मधु प्रदान नहीं करतीं। कीट भ्रमित होता है, किंतु प्रजाति का अस्तित्व सुरक्षित रहता है।
समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में संकेतों की यह भाषा और भी गतिशील हो जाती है। नॉक्टिलुका सायन्टिलन्स द्वारा उत्पन्न जैवदीप्ति रात्रि समुद्र को आलोकित कर देती है। यह दृश्य मनुष्य को उत्सव जैसा प्रतीत होता है, जबकि वास्तविकता में यह शिकारियों को भ्रमित करने और बड़े जीवों को आकर्षित कर खतरे से बचने की रणनीति है। विब्रियो हार्वेई जैसे जीवाणु क्वोरम सेंसिंग के माध्यम से सामूहिक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं। संख्या सीमा पार करते ही जीन-अभिव्यक्ति में परिवर्तन होता है और विषाक्तता या प्रकाश अचानक उभर आता है।

भारतीय महासागर में पाया जाने वाला थौमोक्तोपस मिमिकस नकल की चरम अवस्था का उदाहरण है। वह विषैले समुद्री साँप, लायनफ़िश या फ्लैटफ़िश जैसी आकृतियों की नकल कर शिकारी को भ्रमित कर देता है। ऑक्टोपस वल्गारिस त्वचा की बनावट और रंग क्षण भर में बदल सकता है। शिकारी जो देखता है, वही सत्य मान लेता है और यहीं उसकी चूक होती है। प्रकृति स्थिर सत्य नहीं प्रस्तुत करती; वह परिस्थिति-संगत सत्य रचती है।
इसी प्रकार पैपिलियो पॉलीटेस तितली की मादाएँ विषैली प्रजातियों की नकल करती हैं, जबकि नर अपने वास्तविक रूप में रहते हैं। यह नकल सार्वभौमिक नहीं, चयनित है। यहाँ सत्य और असत्य का संतुलन प्रजनन-सफलता से निर्धारित होता है। भारतीय मानसून के साथ उत्पन्न पेट्रिकोर गंध ताजगी और शुद्धता का प्रतीक बन जाती है, जबकि यह गंध मिट्टी में सक्रिय एक्टिनोमाइसीट्स द्वारा कार्बनिक अपघटन का परिणाम होती है। संकेत स्वच्छता का लगता है, पर प्रक्रिया जैव-रासायनिक अपघटन की होती है।
वन पारिस्थितिकी में माईकोराइज़ा नेटवर्क इस संकेत-तंत्र का अदृश्य आधार हैं। ग्लोमस जैसे कवक पौधों के बीच पोषक तत्वों और चेतावनी संकेतों का आदान-प्रदान कराते हैं। बाहर से शांत दिखने वाला वन भीतर निरंतर सूचना-संचार में लगा रहता है। इन सभी उदाहरणों में प्रकृति किसी नैतिक अर्थ में झूठ नहीं बोलती। वह सत्य या असत्य की मानवीय श्रेणियों से परे कार्य करती है। उसके संकेत अस्तित्व की उपयोगिता से संचालित होते हैं, नैतिकता से नहीं।
जब हम प्रकृति से सीधा, स्थिर और त्वरित उत्तर की अपेक्षा करते हैं, तब हमें भ्रम का अनुभव होता है। विज्ञान हमें सिखाता है कि संकेतों को सतह पर नहीं, संदर्भ में पढ़ा जाए। जो झूठ प्रतीत होता है, वह अधूरा पाठ है। पूर्ण पाठ के लिए मापन, प्रयोग और दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। अंततः यह प्रश्न स्वयं बदल जाता है। प्रकृति झूठ नहीं बोलती; वह हमें यह बोध कराती है कि सत्य सरल नहीं, बल्कि बहुस्तरीय होता है और संभवतः यही उसका सबसे ईमानदार संदेश है।
– डॉ. दीपक कोहली

