वर्तमान दौर में तनाव यानी दबाव प्रत्येक विद्यार्थी जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है। पूर्व में किए गए कुछ अध्ययनों से पता चला है कि छात्रों को सफलता प्राप्त करने के लिए मध्यम दर्जे का दबाव लाभकारी होता है, परंतु इसकी चरम स्थिति जीवन को तहस-नहस कर सकती है। जिसके कई घातक परिणाम सामने आते हैं जिनमें व्यग्रता, चिंता, उत्कंठा यानी एंग्ज़ाइटी के साथ-साथ अवसाद और मनोवैज्ञानिक समस्याएं हैं।
परीक्षा नजदीक आने पर विद्यार्थियों को अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने का भारी दबाव झेलना पड़ता है। दबाव के तीन आयाम होते हैं। पहला, एक्यूट स्ट्रेस – जो अल्पकालिक होने के कारण अधिक प्रभावित नहीं करता, परंतु इसका प्रभाव अधिक अवधि तक बना रहने पर पीठ में दर्द, जबड़े में दर्द, सिर दर्द जैसी पेशी से जुड़ी समस्याएं उभरना सामान्य है। एक्यूट स्ट्रेस की स्थिति में एसिडिटी, डायरिया आदि जैसी समस्याएं भी उभर सकती हैं। दूसरा है एपिसोडिक एक्यूट स्ट्रेस – जो परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन करने और परिणाम के लिए उच्च मानक का निर्धारण करके ऊंची प्रत्याशाएं यानी अधिक आशाएं पाल लेने पर उभरता है। वांछित परिणाम नहीं मिलने की स्थिति में व्यक्ति में उच्च स्तर का दबाव पैदा हो सकता है। दबाव की तीसरी श्रेणी क्रॉनिक स्ट्रेस होती है जो लम्बी अवधि तक दुखी रहने, मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ बार-बार संघर्ष (अनावश्यक वाद-विवाद) करने जैसी स्थितियों के साथ क्यूट और क्रॉनिक स्ट्रेस के मिल जाने से उत्पन्न होती है।
परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों में उभरी दबाव की स्थिति में व्यक्ति की गतिविधि, प्रतिक्रिया और विशेष स्थिति में उसके द्वारा दी गई व्याख्या एंग्ज़ाइटी सिंड्रोम में बदल सकती है। यह स्थिति प्रतिकूल मनोवैज्ञानिक अवस्था के लिए एक गम्भीर चिंताजनक यानी भय पैदा करने वाली परिस्थिति होती है, जिस पर तत्काल ध्यान देने और उपाय ढूंढने की आवश्यकता होती है।
एंग्ज़ाइटी पैदा होने के पीछे कई कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। अधिकांश विद्यार्थियों के अध्यापकों और माता-पिता की आशाएं बच्चों पर दबाव डालती हैं कि वे अच्छे अंक ले आएं। यही सोच बच्चों के दोस्तों और परिवार के सदस्यों की भी होती हैं। प्रायः बच्चों में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की होड़ लगी रहती है ताकि वे भविष्य में भौतिक सुख-सुविधाएं अर्जित कर एक सम्पन्न जीवन व्यतीत कर सकें। परीक्षा का डर भी बच्चों पर दबाव डालकर उन्हें तनावग्रस्त कर देता है। कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई में रुचि कम होती है, परंतु परीक्षा की उपयुक्त तैयारी नहीं होने और माता-पिता की उच्च अपेक्षाओं के चलते वे तनावग्रस्त हो जाते हैं।
परीक्षा के दौरान एंग्ज़ाइटी
परीक्षा नजदीक आने पर विद्यार्थियों में एंग्ज़ाइटी एक आम समस्या के रूप में उभर कर आती है, जिससे उनका मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। यही एंग्ज़ाइटी उनकी पढ़ाई, परीक्षा तथा उनके सामाजिक सम्बंधों में समस्याएं खड़ी कर देती हैं।
एंग्ज़ाइटी के कारण
परीक्षा आते ही विद्यार्थियों में अध्ययन का दबाव एंग्ज़ाइटी का एक प्रमुख कारण है। प्राइमरी और मिडिल स्तर के बच्चों को अपने अभिभावकों की इच्छानुसार क्लास में शीर्ष रैंक प्राप्त करने का दबाव बना रहता है। हाई स्कूल और इंटरमीडिएट के विद्यार्थियों पर मनचाहे विषय में प्रवेश मिलने तथा मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, डिफेंस, जैसे आकर्षक संस्थानों में प्रवेश पाने का गहरा दबाव रहता है। परीक्षा में वांछित परिणाम प्राप्त करने की होड़ तथा माता-पिता की महत्वाकांक्षा जैसी स्थितियां विद्यार्थियों में एंग्ज़ाइटी का प्रमुख कारण बनती हैं। इनके अलावा बच्चों के परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, पास-पड़ोस के लोगों का भी सामाजिक दबाव रहता है। कभी-कभी विद्यार्थियों की व्यक्तिगत समस्याएं जैसे कि घरेलू समस्याएं, स्वास्थ्य समस्याएं, दुर्घटनाग्रस्त होने जैसी स्थितियां भी एंग्ज़ाइटी का कारण बन सकती हैं।
एंग्ज़ाइटी के लक्षण
सालाना परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों में मानसिक एवं भावनात्मक दबाव के करण तनाव और चिंता/व्यग्रता के लक्षण उभर सकते हैं। परीक्षा की एंग्ज़ाइटी के चलते उनमें सिर दर्द, पेट दर्द जैसे लक्षण उभर सकते हैं। परीक्षा समीप आते ही विद्यार्थी अपनी तैयारी का मूल्यांकन अवश्य करते हैं, कई विषयों का अध्ययन छूट जाने की स्थिति में उनमें गम्भीर भय पैदा हो जाता है कि कहीं उसी विषय अथवा चैप्टर से प्रश्न आ गए तो क्या होगा? ऐसी स्थिति में उनमें उदासी, गुस्सा जैसे भावनात्मक लक्षणों पर आधारित एंग्ज़ाइटी होना स्वभाविक हो जाता है।
एंग्ज़ाइटी से बचाव
परीक्षा की एंग्ज़ाइटी लगभग सभी बच्चों में होती है जो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। परीक्षा की एंग्ज़ाइटी से विद्यार्थियों को परीक्षा के दौरान एंग्ज़ाइटी से बचने के लिए उन्हें पूरे साल नियमित अध्ययन करते रहने की आदत डालना आवश्यक है। व्यायाम और योग करना उनमें एंग्ज़ाइटी को कम करने में सहायक हो सकता है। मेडिटेशन और ध्यान भी एंग्ज़ाइटी को दूर भगाने में सहायक सिद्ध हो सकता है। सामाजिक और धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय भागीदारी से उनकी अध्ययन अवधि के बीच ब्रेक तो मिलेगा ही, उनके मन-मस्तिष्क में ताजगी का भी अनुभव होगा। हालांकि परीक्षा के दौरान अपनी दैनिक दिनचर्या में बदलाव लाकर परीक्षा के दबाव से बहुत सीमा तक बचा जा सकता है।
अध्यापकों और माता-पिता को चाहिए कि बच्चों को सकारात्मक सोच विकसित करने को प्रोत्साहित करें। बच्चों को पढ़ाई के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए और अपना ध्यान उन विषयों पर अधिक केंद्रित करें, जिन्हें अभी तक उपेक्षित रखा गया था। परीक्षा के दौरान विद्यार्थियों की मानसिक सक्रियता बहुत अधिक बढ़ जाती है। अतः एक निश्चित अवधि के बाद पढ़ाई से ब्रेक लेना, उनके मस्तिष्क के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। माता-पिता द्वारा बच्चों की अध्ययन प्रणाली पर अनावश्यक हस्तक्षेप की जगह, उन्हें शांतिपूर्ण अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराने के साथ-साथ उनके पोषण की उपयुक्त व्यवस्था भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। विद्यार्थियों की शारीरिक और बौद्धिक क्षमता अपने ही क्लास के अन्य विद्यार्थियों की तुलना में भिन्न होती है। उनमें हीन भावना विकसित होने से बचाने के लिए उनकी अन्य विद्यार्थियों से तुलना नहीं की जानी चाहिए।
–डॉ. कृष्णा नंद पांडेय

