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डिजिटल डोपामिन: मोबाइल युग का नया नशा

डिजिटल डोपामिन: मोबाइल युग का नया नशा

मानसिक स्वास्थ्य 2026

by हिंदी विवेक
in युवा
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21वीं सदी को यदि किसी एक प्रतीक में संक्षेपित करना हो तो वह प्रतीक होगा, मनुष्य की हथेली में सिमटा हुआ स्मार्टफोन। यह छोटा-सा उपकरण केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता संसार है। समाचार, मनोरंजन, शिक्षा, व्यापार, मित्रता, प्रेम, राजनीति, सब कुछ इस चमकती स्क्रीन के भीतर समाहित हो गया है। मानव इतिहास में पहली बार सूचना इतनी तीव्र, सुलभ और सर्वव्यापी हुई है।

किंतु हर क्रांति अपने साथ अप्रत्याशित परिणाम भी लाती है। डिजिटल क्रांति ने जहाँ जीवन को सरल बनाया है, वहीं इसने मानव मस्तिष्क की रासायनिक संरचना को भी सूक्ष्म रूप से प्रभावित करना प्रारंभ कर दिया है। इस प्रभाव का केंद्र है, डोपामिन।

डोपामिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, अर्थात् मस्तिष्क की कोशिकाओं के बीच संदेश संप्रेषित करने वाला रासायनिक पदार्थ। इसे सामान्य भाषा में “आनंद का हार्मोन” कहा जाता है, यद्यपि वैज्ञानिक दृष्टि से यह केवल आनंद ही नहीं, बल्कि प्रेरणा, प्रत्याशा, पुरस्कार और सीखने की प्रक्रिया से गहराई से जुड़ा हुआ है।

जब मनुष्य कोई लक्ष्य प्राप्त करता है, कोई प्रशंसा सुनता है, स्वादिष्ट भोजन करता है या प्रेम का अनुभव करता है, तब मस्तिष्क में डोपामिन का स्राव बढ़ता है। यह स्राव एक प्रकार का जैविक संकेत है— “यह कार्य लाभकारी है, इसे दोहराओ।” यही कारण है कि डोपामिन मानव विकास की आधारशिला रहा है। शिकार की सफलता, कृषि की खोज, सामाजिक संबंधों की स्थापना— इन सभी में इसी पुरस्कार-प्रणाली की भूमिका रही।

समस्या तब आरंभ होती है जब यह जैविक प्रणाली कृत्रिम रूप से और अत्यधिक उत्तेजित होने लगे। डिजिटल तकनीक, विशेष रूप से सोशल मीडिया, इसी प्रणाली को बार-बार सक्रिय करती है। Instagram, Facebook, YouTube, WhatsApp और X जैसे मंच केवल सूचना देने वाले प्लेटफ़ॉर्म नहीं हैं; वे मानव व्यवहार को विश्लेषित करके उसे दिशा देने वाले एल्गोरिद्मिक तंत्र हैं। हर “लाइक”, हर “कमेंट”, हर नोटिफिकेशन, हर नई पोस्ट— एक सूक्ष्म पुरस्कार की तरह कार्य करती है। यह पुरस्कार छोटा होता है, परंतु अनिश्चित होता है। यही अनिश्चितता इसे अधिक आकर्षक बनाती है।

मनोविज्ञान में “वैरिएबल रिवार्ड सिस्टम” का सिद्धांत बताता है कि यदि पुरस्कार निश्चित न होकर अनियमित अंतराल पर मिले, तो व्यक्ति उस व्यवहार को अधिक तीव्रता से दोहराता है। यही सिद्धांत जुए की मशीनों में प्रयुक्त होता है।

सोशल मीडिया ने इसी सिद्धांत को डिजिटल रूप दिया है। कभी पोस्ट पर अत्यधिक प्रतिक्रिया मिलती है, कभी बहुत कम; कभी संदेश तुरंत आता है, कभी देर से। यह अनिश्चितता मस्तिष्क में प्रत्याशा को जन्म देती है, और प्रत्याशा स्वयं डोपामिन का स्रोत बन जाती है। व्यक्ति बार-बार स्क्रीन देखता है, भले ही उसे पता हो कि कोई आवश्यक सूचना नहीं आई है।

Doomscrolling: Is Gen Z addicted to short-form internet content - BBC News

समय के साथ यह व्यवहार आदत से बढ़कर बाध्यकारी प्रवृत्ति बन सकता है। व्यक्ति बिना कारण मोबाइल खोलता है, नोटिफिकेशन न होने पर भी स्क्रीन को स्वाइप करता है। यह केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि मस्तिष्क के भीतर निर्मित अपेक्षा-चक्र का परिणाम है। डिजिटल संसार त्वरित संतुष्टि प्रदान करता है, जबकि वास्तविक जीवन में उपलब्धियाँ श्रम और धैर्य मांगती हैं। जब मस्तिष्क त्वरित पुरस्कारों का आदी हो जाता है, तो दीर्घकालिक प्रयास बोझिल प्रतीत होने लगते हैं।

डिजिटल डोपामिन का प्रभाव विशेष रूप से किशोरों में अधिक दिखाई देता है। किशोरावस्था में मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स पूर्णतः विकसित नहीं होता, जो आत्म-नियंत्रण और निर्णय-क्षमता का केंद्र है। दूसरी ओर, पुरस्कार-प्रणाली अत्यंत सक्रिय होती है।

यह असंतुलन डिजिटल उत्तेजनाओं को और प्रभावशाली बना देता है। जब किशोर सोशल मीडिया पर स्वीकृति की खोज करते हैं और लाइक्स के माध्यम से पहचान पाते हैं, तो उनका आत्मसम्मान बाहरी मान्यता पर निर्भर होने लगता है। तुलना की संस्कृति—दूसरों के चयनित और सजाए गए जीवन को देखकर स्वयं को कमतर आँकना—अवसाद और चिंता को जन्म दे सकती है।

न्यूरोप्लास्टिसिटी का सिद्धांत बताता है कि मस्तिष्क अपने उपयोग के अनुसार स्वयं को ढाल लेता है। यदि उसे बार-बार छोटी और तीव्र उत्तेजनाएँ मिलती हैं, तो उसकी संरचना उसी अनुरूप परिवर्तित होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति का ध्यान खंडित होने लगता है। निरंतर नोटिफिकेशन और स्क्रोलिंग ध्यान की निरंतरता को बाधित करते हैं। अध्ययन और गहन चिंतन के लिए आवश्यक दीर्घकालिक एकाग्रता प्रभावित होती है। यही कारण है कि आज अनेक विद्यार्थी और पेशेवर लोग कार्य के दौरान भी मोबाइल जाँचने की तीव्र इच्छा अनुभव करते हैं।

डिजिटल डोपामिन का प्रभाव केवल मानसिक नहीं, शारीरिक भी है। देर रात तक स्क्रीन उपयोग से नीली रोशनी मेलाटोनिन के स्राव को कम करती है, जिससे नींद की गुणवत्ता घटती है। अपर्याप्त नींद मानसिक संतुलन और भावनात्मक स्थिरता को प्रभावित करती है। थका हुआ मस्तिष्क त्वरित मनोरंजन की ओर अधिक आकर्षित होता है, और इस प्रकार एक दुष्चक्र बन जाता है; स्क्रीन, उत्तेजना, थकान और पुनः स्क्रीन।

आर्थिक दृष्टि से देखें तो डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म “ध्यान अर्थव्यवस्था” पर आधारित हैं। उपयोगकर्ता का समय ही उत्पाद है। जितना अधिक समय उपयोगकर्ता ऑनलाइन रहेगा, उतनी अधिक विज्ञापन-आय होगी। इसलिए एल्गोरिद्म इस प्रकार बनाए जाते हैं कि उपयोगकर्ता अधिकतम समय तक संलग्न रहे। वे उपयोगकर्ता की रुचियों, व्यवहार और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करके उसी प्रकार की सामग्री प्रस्तुत करते हैं जो उसे बाँधे रख सके। यह केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान का सूक्ष्म उपयोग है।

हालाँकि यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि डिजिटल माध्यम पूर्णतः नकारात्मक नहीं हैं। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक जागरूकता और अभिव्यक्ति के नए अवसर दिए हैं। समस्या तकनीक में नहीं, उसके असंतुलित उपयोग में है। जब डिजिटल संसार जीवन का पूरक होने के बजाय प्रमुख स्रोत बन जाता है, तब असंतुलन उत्पन्न होता है।

What is a 'dopamine fast'? And how can it help you find contentment and simple joy? | CNN

समाधान के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है। डिजिटल साक्षरता को शिक्षा का भाग बनाया जाए ताकि विद्यार्थी समझ सकें कि डोपामिन कैसे कार्य करता है और तकनीक किस प्रकार उनकी मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है। परिवारों में संतुलित उपयोग का वातावरण बने, जहाँ भोजन-काल और विश्राम के समय मोबाइल का प्रयोग सीमित हो। नोटिफिकेशन को नियंत्रित करना, निश्चित स्क्रीन-समय तय करना और समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाना व्यावहारिक उपाय हैं।

नीतिगत स्तर पर भी एल्गोरिद्मिक पारदर्शिता और उपयोगकर्ता कल्याण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। तकनीकी कंपनियों को यह समझना होगा कि दीर्घकालिक सामाजिक स्वास्थ्य अल्पकालिक लाभ से अधिक महत्वपूर्ण है। भविष्य में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणालियाँ उपयोगकर्ता की मानसिक प्रवृत्तियों को और अधिक सटीकता से समझ सकेंगी। तब आत्म-नियंत्रण और नैतिक डिज़ाइन की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाएगी।

डिजिटल डोपामिन वास्तव में आधुनिक युग का अदृश्य नशा है। यह शराब या तंबाकू की तरह प्रत्यक्ष नहीं दिखता, परंतु इसका प्रभाव व्यापक और गहरा है। यह हमारी आदतों, संबंधों, ध्यान-क्षमता और आत्मबोध को प्रभावित करता है। प्रश्न यह नहीं कि तकनीक को त्याग दिया जाए, बल्कि यह है कि क्या हम तकनीक के साथ सजग, संतुलित और विवेकपूर्ण संबंध स्थापित कर सकते हैं।

मानव मस्तिष्क लाखों वर्षों की जैविक यात्रा का परिणाम है; डिजिटल तकनीक कुछ दशकों की उपलब्धि है। यदि हमें स्वस्थ, सृजनात्मक और संतुलित समाज का निर्माण करना है, तो हमें इस तकनीक को साधन बनाए रखना होगा, स्वामी नहीं बनने देना होगा। अंततः निर्णय हमारा है, क्षणिक डोपामिन की चमक में खो जाना या दीर्घकालिक संतुलन और सृजनशीलता की राह चुनना।

– डॉ. दीपक कोहली

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