तेहरान के आसमान में B1-B लांसर की गड़गड़ाहट और ईरान के मिसाइल लॉन्च में आती भारी कमी… यह मात्र कोई संयोग नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध कला का वो कटु सत्य है जिसे समझना सभी के लिए आवश्यक है।
वर्तमान में युद्ध केवल बारूद से नहीं, बल्कि ‘सेंसर-टू-शूटर’ लूप की उस घातक सटीकता से जीते जा रहे हैं जहाँ दुश्मन के पास छिपने का कोई रास्ता नहीं बचता!
आज यदि देखा जाए तो ईरान की मिसाइल आक्रमण शक्ति के लगातार कमजोर पड़ते जाने का सबसे बड़ा कारण अमेरिका, इज़रायल और सहयोगी देशों की ‘किल चेन’ तकनीक है। जैसे ही कोई ईरानी बैलिस्टिक मिसाइल किसी स्थान से लॉन्च होती है, विशेषतः ईरान पर स्थिर करके रखे गए अंतरिक्ष में तैनात SBIRS (Space-Based Infrared System) उपग्रह उसकी तापीय लपट यानी ‘थर्मल प्लूम’ को मिलीसेकंड्स में पकड़ लेते हैं। यह डेटा तुरंत उन टारगेटिंग सिस्टम तक पहुँचता है जो हवा में उपस्थित ड्रोन्स और B-1B लांसर जैसे घातक बमवर्षकों को लक्ष्य के सटीक निर्देशांक (Coordinates) भेज देते हैं।

सटीक निर्देशांक (Coordinates) मिलते ही अब खेल ‘लॉन्च… डिटेक्ट… ट्रैक और नष्ट’ का होता है। ईरान के पास मोबाइल लॉन्चर (TEL) तो हैं, लेकिन जैसे ही वे मिसाइल दागने के लिए सक्रिय होते हैं, वे एक चमकते हुए बीकन की तरह अपनी लोकेशन उजागर कर देते हैं। आधुनिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) और इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म बादलों और अंधेरे को चीरकर इन लॉन्चर्स को ट्रैक कर लेते हैं।
इसके बाद काउंटर-स्ट्राइक इतनी तेज और निर्णायक होती है कि ईरानी मोबाइल लॉन्चर (TEL) ऑपरेटर को संभलने का मौका भी नहीं मिलता! यही कारण है कि अब ईरान के मिसाइल हमलों की संख्या लगातार घट रही है।

तकनीकी रूप से उनके लॉन्चर्स और मिसाइल डिपो का भौतिक विनाश तो हो ही रहा है, लेकिन इससे भी गहरा असर वहां के ऑपरेटर्स के मनोवैज्ञानिक स्तर पर पड़ा है। जब मिसाइल यूनिट्स को यह पता चलता है कि बटन दबाने का अर्थ ही अपनी मौत को निमंत्रण देना है, तो कमांड स्ट्रक्चर में दरारें पड़ने लगती हैं। ऑपरेशंस के दौरान दिखने वाला यह डर और टूटता हुआ मोरल (Morale) आज ईरानी खेमे की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुका है।
थ्रेशोल्ड डिटर्जेंस का यह नया रूप है, जहाँ तकनीक ने ‘छिपकर वार’ करने की क्षमता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है।
-हरेन्द्र त्यागी
