अच्छी लगती हैं अब नारियां
अच्छी लगती हैं अब नारियां
भागती हुईं दौड़ती हुईं,
ऊंची एड़ी के सैंडल और थोड़ी सी ऊंची जींस में
अच्छी लगती हैं अब नारियां।
अब मुक्त हैं वह
सर से पल्लू सरकने के भय से,
साड़ी के प्लेट के झंझट से
पायल की छम-छम और
मैचिंग कंगन से,
अच्छी लगती हैं अब नारियां।
अब दे रही हैं वह वक्त
सजने-संवरने की जगह
आंत्रप्रेन्योर बनने में,
जॉब स्विच करने में,
अपना मनचाहा करने में,
खुश रहने में,
सचमुच अच्छी लगती हैं अब नारियां।
अब बातों को तर्क से तौलती हैं,
कहीं होता अन्याय देख खौलती हैं,
अब पैसे पति से मांगती नहीं
स्वयं अपना खाता खोलती हैं,
बहुत अच्छी लगती हैं अब नारियां।
सास-ननद की चुगलियां बीते दिनों की बात हुईं
अब तो नारियां विदेश नीति पर बोलती हैं
बेटी अब कोई बोझ नहीं है
यह करके दिखलाती हैं
बहुत बदल गई अब नारियां।
अब वे ‘शेयर‘ में रिस्क उठाती हैं
और ’इंवेस्टमेंट’ के पाठ पढ़ाती हैं,
घुटती थीं जो घर के अंदर
अब इतिहास बनाती हैं,
सचमुच अच्छी लगती हैं अब नारियां।
मुख में जिनके जुबा नहीं थीं
अब वह देश चलाती हैं,
रहती थीं जो परदे के अंदर
अब ‘राफेल‘ उड़ाती हैं
सचमुच बदल गई है नारियां।
क्या धरा क्या नील गगन
क्या हिम क्या पर्वतमाला है,
उनकी सीमा बंधी नहीं अब
चंहु ओर परचम लहराया है।
सचमुच अच्छी लगती हैं अब नारियां।
रोती थीं जो ‘सिंदूर‘ की खातिर
अब ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाती हैं,
आंखों में अंगारे भरकर
बहनों को न्याय दिलाती हैं।
वक्त पड़ने पर घर में घुस कर
दुश्मन को धूल चटाती हैं
अब देश का मान बढाती हैं,
रूप बदलती नारियां
अब शक्ति बनती हुईं नारियां।
सचमुच अच्छी लगती हैं अब नारियां।
सचमुच अच्छी लगती हैं अब नारियां।
-शन्नो श्रीवास्तव

