| स्वदेशी उत्पादन, नवाचार और तकनीकी विकास के साथ एमएसएमई से लेकर हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग तक, देश आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। रक्षा, अंतरिक्ष, ऊर्जा और डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का विस्तार स्पष्ट दिखाई देता है। युवा शक्ति, कौशल विकास और स्टार्टअप संस्कृति इस परिवर्तन के प्रमुख आधार बन रहे हैं। |
भारत ने हाल में कुछ ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों में प्रवेश किया है, जो अपेक्षाकृत नए हैं और जिनमें भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। ये क्षेत्र हैं: आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, अक्षय ऊर्जा और रक्षा उत्पादन। इसके अलावा हमारा परम्परागत वस्त्र और परिधान-उद्योग, ऑटोमोबाइल्स, फार्मा और सॉफ्टवेयर उद्योग पहले से ज्यादा मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ा रहा है। इन बातों का सकल परिणाम है: नई पूंजी+ नई तकनीक= औद्योगिक गुणवत्ता में सुधार। हमारे वस्त्र, ऑटो पार्ट्स, औषधियां, केमिकल ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। इससे निर्यात-आधारित उद्योगों को सीधा लाभ मिलेगा। परिणामत: उत्पादन बढ़ेगा, रोजगार बढ़ेगा, उद्योगों का विस्तार होगा।
इस प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए हमें दो स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। एक स्तर छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योगों का है, जो बड़ी संख्या में रोजगार उपलब्ध कराते हैं और आम उपभोग की वस्तुएं तैयार करते हैं। ऐसे उद्योग भी तभी सफल होंगे, जब हमारे पास नवीनतम उच्चस्तरीय तकनीक होगी। साथ ही हमें ऐसे सामाजिक विकास की आवश्यकता है, जो बड़ी संख्या में लोगों की समृद्धि का कारण बने। जब लोगों के पास पैसा होगा, तभी वे अपनी आवश्यकताओं की चीजें खरीदेंगे। जब उनका उपभोग बढ़ेगा, तब औद्योगिक विकास भी होगा।
- भारी उद्योगों की भूमिका
हमने ऊपर जिन उद्योगों का उल्लेख किया है, उनमें से ज्यादातर भारी उद्योगों की श्रेणी में आते हैं। भारी उद्योगों से आशय उन बड़े पैमाने के विनिर्माण उद्यमों से हैं, जिनमें भारी मात्रा में पूंजी, जटिल मशीनरी और कच्चे माल का उपयोग होता है। ये उद्योग, जैसे इस्पात, भारी इंजीनियरिंग, मशीनरी, सीमेंट, पोत और विमान निर्माण और ऑटोमोबाइल आदि बुनियादी ढांचे के विकास, अन्य उद्योगों के लिए मशीनें बनाने और अर्थव्यवस्था के सुदृढ़ीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये भारी उद्योग अत्यधिक पूंजी प्रधान होते हैं और इनमें विशाल कारखाने, भारी मशीनरी व उपकरण शामिल होते हैं। इनमें मुख्यतः कच्चे माल (जैसे- लोहा, कोयला, खनिज) को परिष्कृत कर धातु, मशीनरी और अन्य भारी वस्तुओं का उत्पादन करते हैं। इनमें भारी इंजीनियरिंग उद्योग, मशीन टूल उद्योग, भारी विद्युत उपकरण, ऑटोमोबाइल उद्योग, इस्पात संयंत्र, पोत और विमान निर्माण और पेट्रोकेमिकल इकाइयां शामिल हैं।
इन्हें देश के आर्थिक-विकास की रीढ़ माना जाता है और ये भारी संख्या में रोजगार के अवसर भी प्रदान करते हैं। ये राष्ट्र की भौतिक और तकनीकी नींव को मजबूत करने के लिए भारी मात्रा में स्टील, मशीनें, और परिवहन के साधन जैसे जहाज, ऑटोमोबाइल आदि बनाते हैं। देश को आत्मनिर्भर बनाने में इन उद्योगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और आधारभूत है। ये उद्योग पूंजीगत वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, जो अन्य सभी क्षेत्रों जैसे कृषि, बुनियादी ढांचा, रक्षा, विनिर्माण और सेवाओं की नींव रखते हैं। भारी उद्योगों में मुख्य रूप से ऑटोमोबाइल, भारी इंजीनियरिंग, मशीन टूल्स, हैवी इलेक्ट्रिकल उपकरण, स्पेशलिटी स्टील, जहाज निर्माण, रेलवे इक्विपमेंट और उन्नत बैटरी आदि शामिल हैं।
- आयात प्रतिस्थापन
ये भारी उद्योग घरेलू स्तर पर मशीनरी, उपकरण और कच्चा माल उपलब्ध कराकर विदेशी-आयात पर निर्भरता कम करते हैं। उदाहरण के लिए- स्पेशलिटी स्टील और ऑटोमोबाइल सेक्टर में आयात कम हो रहा है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और आपूर्ति श्रृंखला मजबूत बनती है। देश में छोटे और मझोले उद्योगों के लिए भी मशीनरी और आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने में ये सहायता करते हैं। भारत सरकार अब प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (स्कीम) के अंतर्गत इन्हें प्रोत्साहन देकर करोड़ों रोजगार सृजित करने का कार्य कर रही है। भारत अब ऑटोमोबाइल और हैवी इंजीनियरिंग उत्पादों का निर्यातक बन रहा है। रक्षा क्षेत्र में भारत अब पोत निर्माण में पूरी तरह आत्मनिर्भर है और हाईटेक लड़ाकू विमानों के क्षेत्र में भी तेजी से विकास कर रहा है। भारत में रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है। भारत ने वित्त वर्ष 2024-25 में 1.54 लाख करोड़ रुपये से अधिक के रिकॉर्ड रक्षा उत्पादन के साथ आत्मनिर्भरता में बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है, जो 2014-15 की तुलना में 174 प्रतिशत अधिक है। ‘मेक इन इंडिया’ के अंतर्गत निजी भागीदारी (23 प्रतिशत) और सार्वजनिक क्षेत्र (77 प्रतिशत) के सहयोग से रक्षा निर्यात भी रिकॉर्ड 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जिसमें 100 से अधिक देशों को भारत निर्मित रक्षा उपकरण बेचे जा रहे हैं।
भारत अब तीसरा सबसे बड़ा ऑटोमोबाइल बाजार है (जापान को पीछे छोड़कर) और इलेक्ट्रिक वाहनों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ये सभी कदम जो आत्मनिर्भर भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने का आधार बनेंगे। कुल मिलाकर सुखी और समृद्ध देश को बनाने के लिए हमें नए ‘आत्मनिर्भर भारत’ का निर्माण करना होगा। यह हमारे स्वदेशीकरण का मूलमंत्र है। निश्चित रूप से भारत इस दिशा में बढ़ रहा है और जल्द ही उसके परिणाम भी दिखाई पड़ेंगे, पर उसके पहले हमें स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय की परिस्थितियों और अपनी विवशताओं पर भी एक दृष्टि डालनी चाहिए।
- 1947 का भारत
स्वतंत्रता के समय भारत के स्वदेशी उद्योगों की स्थिति बहुत कमजोर और असंतुलित हो चुकी थी। यह स्थिति अचानक नहीं बनी बल्कि लगभग सैकड़ों साल की औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम थी। उस समय हमारे परम्परागत उद्योग लगभग नष्ट हो चुके थे। ब्रिटिश शासन से पहले भारत दुनिया के बड़े औद्योगिक उत्पादकों में था, विशेषकर: सूती और रेशमी कपड़े, हस्तशिल्प, धातु-काम, जहाज निर्माण आदि में। अंग्रेजी सरकार की नीतियों ने भारतीय माल पर भारी कर लगाकर और ब्रिटेन के मशीन-निर्मित माल को खुली छूट देकर स्वदेशी उद्योगों की कमर तोड़ दी। परिणाम यह हुआ कि ढाका का मलमल, बनारस की बुनाई, कारीगरों के हुनर-सब लगभग समाप्त हो गए। इसे इतिहास में ‘वि-औद्योगीकरण या डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन’ कहते हैं।
- औद्योगिक आधार
1947 तक हमारे पास कुछ आधुनिक स्वदेशी उद्योग अवश्य थे, पर उनकी संख्या और दायरा छोटा था। मुंबई और अहमदाबाद वगैरह में कुछ कपड़ा मिलें थीं, बंगाल में जूट उद्योग था, जमशेदपुर में टाटा आयरन एंड स्टील था, सीमेंट, चीनी और कागज के कुछ कारखाने थे, पर भारी उद्योग बहुत कम थे। मशीनें और तकनीक ज्यादातर आयातित थीं, उत्पादन घरेलू आवश्यकताओं से कम था। उद्योग मुख्यतः उन्हीं क्षेत्रों में थे जहां अंग्रेजो को लाभ था। बंदरगाह के शहर थे मुम्बई, कोलकाता और मद्रास। देश का बड़ा हिस्सा औद्योगिक रूप से पिछड़ा ही रहा।
भारतीय पूंजीपति वर्ग का जन्म हो रहा था, पर वह भी सीमित था। कुछ स्वदेशी घराने थे, जिन्होंने स्वदेशी उद्योगों की नींव रखी, लेकिन पूंजी की कमी, सरकारी संरक्षण का अभाव और ब्रिटिश कम्पनियों की प्रतिस्पर्धा ने इनके विकास को रोक रखा था। देश की अर्थव्यवस्था कच्चे माल के निर्यात पर निर्भर थी। तैयार औद्योगिक माल का हम आयात करते थे। कम शब्दों में कहें तो भारत औद्योगिक राष्ट्र नहीं, औपनिवेशिक सप्लायर था।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने पंचवर्षीय योजनाओं, सार्वजनिक क्षेत्रों और भारी उद्योगों पर जोेर दिया। शुरुआती वर्षों में राज्य-प्रेरित तीव्र औद्योगीकरण पर जोर दिया गया, लेकिन बाद में आर्थिक सुधारों, वैश्विक चुनौतियों और नीतिगत बदलावों ने इसकी दिशा प्रभावित की। कुल मिलाकर विकास की गति शुरुआत में तेज रही, मध्य में मंद पड़ी और 1990 के दशक से फिर तेज हुई। विकास के इन प्रमुख चरणों को इस तरह से समझें:
शुरुआती चरण: योजना अवधि और भारी उद्योगों का आधार (1947-1965): स्वतंत्रता के तुरंत बाद भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाई, जहां सार्वजनिक क्षेत्र को भारी उद्योगों के विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) ने आधारभूत संरचना पर ध्यान दिया, लेकिन द्वितीय योजना (1956-1961) में पीसी महालनबीस मॉडल के अंतर्गत भारी उद्योगों को प्राथमिकता मिली। इस मॉडल ने पूंजी-आधारित उद्योगों (जैसे लोहा-इस्पात, कोयला और भारी इंजीनियरिंग) पर जोर दिया ताकि देश आत्मनिर्भर बने और उपभोक्ता वस्तुओं पर निर्भरता कम हो।
इस नीति की प्रमुख उपलब्धियां और चुनौतियां: सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े प्लांट स्थापित हुए, जैसे भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर स्टील प्लांट। 1950 के दशक में औद्योगिक उत्पादन में मध्यम वृद्धि हुई और विनिर्माण का जीडीपी में हिस्सा 7 प्रतिशत से बढ़कर 15.9 प्रतिशत तक पहुंचा। पूंजी की कमी, लम्बी अवधि की परियोजनाएं और विदेशी सहायता पर निर्भरता के कारण लागत अधिक हुई। 1960 के दशक की शुरुआत में कृषि संकट और दो युद्धों (1962, 1965) ने गति को प्रभावित किया।
मध्य चरण: मंदी और सुधार की शुरुआत (1966-1990): 60 के दशक के मध्य से भारी उद्योगों की वृद्धि धीमी पड़ गई। लाइसेंस-परमिट राज (लाइसेंसिंग सिस्टम) ने निजी क्षेत्र को बाधित किया, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में अक्षमताएं बढ़ीं। पांचवीं योजना (1974-1979) में विकास और पुनर्वितरण पर जोर दिया गया। 1980 के दशक में हल्के उदारीकरण (जैसे नरसिम्हन समिति की सिफारिशें) से निजी निवेश बढ़ा और भारी उद्योगों में वृद्धि पुनः तेज हुई। स्टील और रसायन जैसे क्षेत्रों में उत्पादकता में सुधार हुआ। दूसरी ओर विदेशी मुद्रा संकट, उच्च मुद्रास्फीति और क्षेत्रीय असमानताओं ने गति को रोका। औद्योगिक विकास दर औसतन 0.55 प्रतिशत प्रति वर्ष रही और जीडीपी में भारत का वैश्विक हिस्सा 16 प्रतिशत से घटकर 4 प्रतिशत हो गया।
उदारीकरण और वैश्वीकरण (1991 से अब तक): 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारी उद्योगों की गति को नई दिशा दी। लाइसेंसिंग हटाई गई, व्यापार और विदेशी निवेश खोले गए और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन मिला। 90 के दशक में उत्पादकता में वृद्धि हुई, भारी उद्योगों की संरचना में बदलाव आया। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद मंदी आने लगी। 2014 के बाद ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों से स्टील और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में निवेश बढ़ा है। अब भारत वैश्विक स्तर पर स्टील उत्पादन में दूसरा स्थान प्राप्त करने में सफल हुआ है। इस दौरान कई चुनौतियां भी आईं। विशेषतौर से कृषि में श्रमिकों का काम हुआ, फिर महामारी 2020 ने नई समस्याएं खड़ी कर दीं। अस्तु, 2022 के बाद से रिकवरी चल रही है, जिससे उम्मीदें बढ़ रही हैं। हमारा विकास हुआ है, पर चीन और दक्षिण कोरिया जैसी निरंतरता नहीं है। इस बात को सब मानते हैं कि भारत के पास क्षमता है, पर तकनीक और स्केल में अभी कमी है।
- स्वर्णिम भारत
अतीत में भारत लम्बे समय तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल था। यह कोई राष्ट्रवादी दावा नहीं बल्कि इतिहासकारों और आर्थिक अध्ययनों से निकला निष्कर्ष है। ईसा की पहली शताब्दी से 1700 तक भारत की विश्व के जीडीपी में 25 से 33 प्रतिशत तक हिस्सेदारी रही। उस समय भारत और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र थे। इसका कारण था उस समय के संदर्भ में हमारी कृषि प्रणाली उन्नत थी और विश्व-प्रसिद्ध उद्योग हमारे पास थे, जिनमें सूती-रेशमी वस्त्र, इस्पात, मसाले और हस्तशिल्प शामिल थे। हमारे पास मजबूत व्यापार नेटवर्क था, जो रोमन साम्राज्य से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था। जिस समय दुनिया में औद्योगिक क्रांति हुई, भारत अंग्रेजों के अधीन था, जिन्होंने भारतीय उद्योगों का आधुनिकीकरण नहीं होने दिया। यह औद्योगिक क्रांति यूरोप तक सीमित रह गई, भारत में नहीं हो पाई।
- आत्मनिर्भर भारत
हाल के वर्षों में भारत का सारा जोर ‘आत्मनिर्भरता’ पर केंद्रित है। इसका आशय है पराश्रय से मुक्ति। आज का पुनरुत्थान ऐतिहासिक निरंतरता का एक चरण है। यूके, यूरोपियन यूनियन और अमेरिका के साथ हाल में हुए व्यापार और औद्योगिक समझौतों और दीर्घकालीन साझेदारियों का भारत के औद्योगिक विकास पर असर बहुत ही बहुआयामी होगा। अमेरिका, यूके और ईयू की कम्पनियां भारत को अब मात्र बाजार नहीं बल्कि मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई-चेन हब के रूप में देख रही हैं। इसके साथ ही भारत अब अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के औद्योगिक-विकास में बड़ी भूमिका निभाने के लिए मैदान में उतर रहा है।
-प्रमोद जोशी



