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Sheetla Ashtami 2026: लोकज्ञान और स्वास्थ्य का पर्व

Sheetla Ashtami 2026: लोकज्ञान और स्वास्थ्य का पर्व

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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भारतीय त्योहार केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं होते, बल्कि उनमें जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाने की गहरी समझ भी छिपी होती है। हमारे पूर्वजों ने कई सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के माध्यम से स्वास्थ्य, स्वच्छता और प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश दिया है। शीतला अष्टमी भी ऐसा ही एक पर्व है, जो आस्था के साथ-साथ स्वास्थ्य और वैज्ञानिक सोच से भी जुड़ा हुआ है। यह पर्व चैत्र मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है और माता शीतला की पूजा की जाती है, जिन्हें रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है।

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शीतला शब्द का अर्थ है — शीतलता देने वाली। भारतीय लोक परंपरा में माता शीतला को विशेष रूप से त्वचा रोगों और संक्रामक बीमारियों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में माना गया है। पुराने समय में जब आधुनिक चिकित्सा सुविधाएँ और टीकाकरण उपलब्ध नहीं थे, तब समाज ने रोगों से बचाव के लिए कई व्यवहारिक नियम और परंपराएँ विकसित की थीं। शीतला अष्टमी उन्हीं में से एक है, जो लोगों को स्वच्छता, सावधानी और संतुलित जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देती है।

बसोड़ा (बंसोड़ा)
शीतला अष्टमी से जुड़ी एक प्रमुख परंपरा बसोड़ा या बंसोड़ा कहलाती है। इसमें अष्टमी से एक दिन पहले भोजन तैयार कर लिया जाता है और अष्टमी के दिन वही ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है। पहली नज़र में यह केवल धार्मिक परंपरा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे भी एक व्यवहारिक और वैज्ञानिक सोच छिपी हुई है।

दरअसल, शीतला अष्टमी का समय ऐसा होता है जब मौसम सर्दी से गर्मी की ओर बदल रहा होता है। इस दौरान वातावरण में बैक्टीरिया और संक्रमण फैलने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसे समय में रसोई को एक दिन का विश्राम देना, चूल्हा या गैस न जलाना और पहले से तैयार भोजन का सेवन करना एक तरह से घरेलू व्यवस्था को संतुलित करने का तरीका भी था। इससे रसोई की सफाई करने, बर्तनों को व्यवस्थित रखने और घर के वातावरण को साफ रखने का अवसर मिलता था।

Women Devotees Offer Prayers on Sheetla Ashtami

शीतला अष्टमी: लोकज्ञान और स्वास्थ्य का पर्व

बसोड़ा की परंपरा का एक सामाजिक पहलू भी है। इस दिन परिवार के लोग मिलकर भोजन करते हैं और घर में सादगी और संयम का वातावरण रहता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और संतुलन के लिए भी होना चाहिए।

शीतला अष्टमी का संबंध स्वच्छता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन घर और आसपास के वातावरण की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो साफ-सफाई संक्रमण और बीमारियों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है। पुराने समय में लोगों को स्वच्छता के महत्व को समझाने के लिए इसे धार्मिक परंपरा के रूप में स्थापित किया गया, ताकि समाज इसे आसानी से अपनाए।

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इस पर्व में नीम का भी विशेष महत्व होता है। कई स्थानों पर शीतला माता की पूजा में नीम की पत्तियाँ या टहनियाँ रखी जाती हैं। आयुर्वेद के अनुसार नीम में प्राकृतिक एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुण होते हैं। पुराने समय में चेचक या त्वचा रोग होने पर रोगी के आसपास नीम की पत्तियाँ रखने की परंपरा थी, जिससे वातावरण अपेक्षाकृत शुद्ध रहता था और संक्रमण कम फैलता था।

शीतला अष्टमी हमें यह भी याद दिलाती है कि ऋतु परिवर्तन के समय शरीर को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है। मौसम बदलने पर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कुछ समय के लिए कमजोर हो सकती है। इसलिए इस समय हल्का, स्वच्छ और संतुलित भोजन करना, पर्याप्त आराम करना और स्वच्छता बनाए रखना बेहद आवश्यक माना जाता है।

आज के आधुनिक दौर में चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है, लेकिन इसके बावजूद शीतला अष्टमी का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि स्वच्छता, संतुलित भोजन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता स्वास्थ्य के लिए कितनी महत्वपूर्ण है।

वास्तव में शीतला अष्टमी केवल पूजा या परंपरा का दिन नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक संदेश भी है कि मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहिए। जब हम इस पर्व के पीछे छिपी वैज्ञानिक सोच को समझते हैं, तब यह स्पष्ट होता है कि हमारी परंपराएँ केवल आस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन के व्यावहारिक ज्ञान से भी जुड़ी हुई हैं।
– डॉ. शिवानी कटारा

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