भारतीय महाकाव्य महाभारत में अभिमन्यु का चक्रव्यूह प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर गया था, लेकिन उससे बाहर निकलने की पूरी रणनीति उसे ज्ञात नहीं थी।
पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की भीषण आंच में झुलस रहा है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच पिछले 15 दिनों से चल रहा संघर्ष धीरे-धीरे एक व्यापक रणनीतिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। प्रारंभ में जिस युद्ध को अमेरिका और इजरायल ने एक सीमित सैन्य कार्रवाई के रूप में देखा था, वही संघर्ष अब अंतरराष्ट्रीय राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली घटना बन गया है।
इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है कि युद्ध के आरंभ में शक्तिशाली राष्ट्रों को त्वरित विजय का भ्रम रहा है, लेकिन जैसे-जैसे युद्ध आगे बढ़ता है, वास्तविकताएँ सामने आने लगती हैं। वर्तमान संघर्ष में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। अमेरिका ने ईरान की सैन्य क्षमता और उसकी रणनीतिक धैर्यशीलता का संभवतः कम आकलन किया। परिणामस्वरूप अब स्थिति यह बनती दिख रही है कि अमेरिका एक जटिल रणनीतिक परिस्थिति में उलझ गया है, जहाँ हर कदम के साथ जोखिम और बढ़ता जा रहा है।
यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का युद्ध नहीं है। इसके पीछे वैश्विक शक्ति संतुलन, ऊर्जा संसाधनों का नियंत्रण, क्षेत्रीय राजनीति और सामरिक प्रतिष्ठा की लड़ाई छिपी हुई है।
युद्ध की पृष्ठभूमि और प्रारंभिक रणनीति
इस युद्ध की पृष्ठभूमि पिछले कई वर्षों से तैयार हो रही थी। ईरान के परमाणु कार्यक्रम, उसके मिसाइल विकास और पश्चिम एशिया में उसकी बढ़ती सामरिक सक्रियता को अमेरिका और इजरायल लंबे समय से चुनौती के रूप में देखते रहे हैं। अमेरिका का आरोप रहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के माध्यम से भविष्य में परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर ईरान लगातार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल ऊर्जा उत्पादन और वैज्ञानिक विकास के लिए है।
तनाव का यह वातावरण तब युद्ध में बदल गया जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कुछ सैन्य और रणनीतिक ठिकानों पर व्यापक हवाई हमले शुरू किए। इन हमलों का उद्देश्य स्पष्ट था, ईरान की सैन्य संरचना को कमजोर करना, उसके मिसाइल और ड्रोन नेटवर्क को नष्ट करना और उसे रणनीतिक रूप से झुकने पर मजबूर करना।
प्रारंभिक चरण में अमेरिका और इजरायल को विश्वास था कि उनकी तकनीकी श्रेष्ठता, आधुनिक हथियार प्रणाली और व्यापक खुफिया नेटवर्क उन्हें शीघ्र सफलता दिलाएगा, किंतु युद्ध के 15 दिनों के भीतर यह स्पष्ट हो गया कि ईरान पारंपरिक युद्ध के बजाय नासमझ में आनेवाली युद्ध नीति का उपयोग कर रहा है।
ईरान की नई युद्ध रणनीति अमेरिका के नाक में दम ला रही है। ईरान की सैन्य रणनीति का मूल सिद्धांत यह है कि वह सीधे पारंपरिक युद्ध में महाशक्ति से टकराने के बजाय ऐसी रणनीति अपनाए, जिससे विरोधी की शक्ति का लाभ कम हो जाए। इसी कारण ईरान ने इस संघर्ष में ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल, समुद्री माइन और क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों का उपयोग किया।
ईरान का उद्देश्य केवल अमेरिका को सैन्य क्षति पहुँचाना नहीं है, बल्कि उसे एक लंबी और थकाऊ रणनीतिक स्थिति में फँसाना है। युद्ध विज्ञान में इसे “असममित युद्ध” कहा जाता है, जहाँ अपेक्षाकृत कमजोर शक्ति अपनी सीमाओं को समझते हुए ऐसी रणनीति अपनाती है जिससे शक्तिशाली विरोधी की श्रेष्ठता निष्प्रभावी हो जाए।
ईरान ने अपने हमलों के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि यदि उसके ऊपर दबाव बनाया गया तो वह पूरे पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है। इसी रणनीति के अंतर्गत उसने खाड़ी क्षेत्र के देशों और समुद्री व्यापार मार्गों को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करना शुरू किया। इस कारण हार्मुज जलमार्ग युद्ध का वास्तविक केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।
इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक बिंदु है हार्मुज जलमार्ग। दुनिया के लगभग पाँचवें हिस्से का तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। ईरान लंबे समय से यह संकेत देता रहा है कि यदि उसके खिलाफ व्यापक सैन्य कार्रवाई हुई तो वह हार्मुज जलमार्ग को बंद कर सकता है। युद्ध के वर्तमान चरण में भले ही यह मार्ग पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन लगातार बढ़ते तनाव ने वैश्विक बाजारों को चिंतित कर दिया है।

अमेरिका और उसके सहयोगी इस मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नौसैनिक तैनाती बढ़ा रहे हैं, लेकिन समस्या यह है कि समुद्री युद्ध का यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील और जटिल है। छोटी-छोटी नौकाएँ, समुद्री माइन और ड्रोन जैसी तकनीकें बड़े युद्धपोतों को भी चुनौती दे सकती हैं। इसी कारण यह संघर्ष अब केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समुद्री शक्ति की परीक्षा भी बन गया है।
ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक उसके तेल निर्यात पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में खारग द्वीप अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह द्वीप ईरान के तेल निर्यात का प्रमुख केंद्र है। यदि इसकी संरचना नष्ट हो जाती है तो ईरान की अर्थव्यवस्था को भारी झटका लग सकता है।
अमेरिका के रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ईरान को आर्थिक रूप से कमजोर करना है तो खारग द्वीप को निष्क्रिय करना एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। लेकिन इस कदम के साथ एक बड़ा जोखिम भी जुड़ा हुआ है। यदि ईरान की तेल आपूर्ति बाधित होती है तो वह खाड़ी देशों के तेल प्रतिष्ठानों पर जवाबी कार्रवाई कर सकता है। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच सकती है।
इस युद्ध के 15 दिनों में अमेरिका के सामने तीन प्रमुख चुनौतियाँ स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई हैं। पहली चुनौती है क्षेत्रीय समर्थन की अनिश्चितता। अमेरिका के कई सहयोगी देश इस संघर्ष में सीधे सैन्य भागीदारी से बचते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसका कारण यह है कि पश्चिम एशिया का युद्ध किसी भी समय व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकता है।
दूसरी चुनौती है ईरान की धैर्यपूर्ण रणनीति। ईरान ने अभी तक पूर्ण युद्ध की स्थिति उत्पन्न नहीं की है, बल्कि वह सीमित लेकिन प्रभावी जवाबी हमलों के माध्यम से अमेरिका को उलझाए रखने का प्रयास कर रहा है। तीसरी चुनौती है वैश्विक प्रतिष्ठा का प्रश्न। अमेरिका स्वयं को विश्व की प्रमुख शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यदि इस संघर्ष में उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिलती तो उसकी वैश्विक छवि पर प्रभाव पड़ सकता है।
भारतीय महाकाव्य महाभारत में अभिमन्यु का चक्रव्यूह प्रसंग अत्यंत प्रसिद्ध है। अभिमन्यु चक्रव्यूह में प्रवेश तो कर गया था, लेकिन उससे बाहर निकलने की पूरी रणनीति उसे ज्ञात नहीं थी। परिणामस्वरूप वह अंततः उसी चक्रव्यूह में फँस गया। वर्तमान परिस्थिति में कुछ विश्लेषकों को अमेरिका की स्थिति कुछ वैसी ही प्रतीत होती है। युद्ध के आरंभ में अमेरिका को विश्वास था कि वह अपनी सैन्य शक्ति से स्थिति को शीघ्र नियंत्रित कर लेगा, लेकिन जैसे-जैसे संघर्ष आगे बढ़ रहा है, नए-नए मोर्चे खुलते जा रहे हैं।
यदि अमेरिका युद्ध को और बढ़ाता है तो यह पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध की आग में झोंक सकता है। यदि वह पीछे हटता है तो उसकी रणनीतिक प्रतिष्ठा को क्षति हो सकती है और यदि वह समझौता करता है तो ईरान इसे अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में प्रस्तुत करेगा। युद्ध के इस संघर्ष के भविष्य को लेकर तीन प्रमुख संभावनाएँ सामने आती हैं। पहली संभावना यह है कि कुछ समय बाद कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से युद्ध को सीमित कर दिया जाए। इस स्थिति में दोनों पक्ष अपने-अपने दावों के साथ युद्धविराम की घोषणा कर सकते हैं।
दूसरी संभावना यह है कि यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध में बदल जाए। यदि लेबनान, यमन या अन्य क्षेत्रीय संगठन इस संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल हो जाते हैं तो युद्ध का विस्तार हो सकता है। तीसरी संभावना यह है कि यह संघर्ष वैश्विक आर्थिक संकट का कारण बने। यदि ऊर्जा आपूर्ति बाधित होती है और समुद्री व्यापार मार्ग असुरक्षित हो जाते हैं तो विश्व अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
यह युद्ध केवल सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए युग का संकेत भी हो सकता है।
पिछले कई वर्षों से यह चर्चा चल रही है कि विश्व व्यवस्था अब एकध्रुवीय नहीं रही और धीरे-धीरे बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। यदि इस युद्ध में अमेरिका को अपेक्षित सफलता नहीं मिलती तो रूस, चीन और अन्य उभरती शक्तियों की भूमिका अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके साथ ही ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न भी विश्व राजनीति का केंद्रीय मुद्दा बन सकता है।

भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश के लिए यह संघर्ष अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक स्थिर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर करती है। यदि पश्चिम एशिया में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो इसका प्रभाव भारत की आर्थिक वृद्धि, व्यापार और विदेश नीति पर पड़ सकता है। भारत को इस स्थिति में संतुलित कूटनीति अपनानी होगी। एक ओर पश्चिम एशिया के देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखना और दूसरी ओर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाना।
पश्चिम एशिया में चल रहा यह संघर्ष केवल एक युद्ध नहीं है। यह 21वीं सदी की शक्ति राजनीति, ऊर्जा संसाधनों और वैश्विक रणनीति की परीक्षा है। 15 दिनों के भीतर ही यह स्पष्ट हो गया है कि यह युद्ध त्वरित विजय की कहानी नहीं बनने वाला। इसके परिणाम दूरगामी होंगे और संभव है कि आने वाले वर्षों तक इसकी प्रतिध्वनि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सुनाई देती रहे।
इतिहास हमें यह सिखाता है कि युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे समाप्त करना अत्यंत कठिन। आज पश्चिम एशिया में जो स्थिति बन रही है, वह इसी सत्य की पुनः पुष्टि करती है। यदि कूटनीति और समय रहते हस्तक्षेप नहीं किया तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।

