| आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वदेशी को केवल सरकारी कार्यक्रम न समझा जाए बल्कि राष्ट्रीय स्वभाव का हिस्सा बनाया जाए। इसके लिए नीति, उद्योग और समाज- तीनों का समन्वय आवश्यक है। |
भारत के राष्ट्रीय विमर्श में ‘स्वदेशी’ कोई नया शब्द नहीं है। यह स्वतंत्रता आंदोलन की उस चेतना से जन्मा था, जिसने आर्थिक आत्मसम्मान को राजनीतिक स्वतंत्रता से जोड़ा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष जैसे विचारकों ने स्वदेशी को विदेशी प्रभुत्व के प्रतिरोध के रूप में देखा, किंतु स्वतंत्रता के बाद दशकों तक स्वदेशी मात्र एक भावनात्मक नारा बना रहा। आज जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और आपूर्ति-श्रृंखला संकटों से गुजर रही है, तब स्वदेशी एक बार फिर भारत के सामने रणनीतिक विकल्प के साथ एक अनिवार्यता के रूप में उभर रहा है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में स्वदेशी को इसी यथार्थ के अनुरूप नए अर्थ और नई दिशा मिली है।
प्रधान मंत्री मोदी की स्वदेशी संकल्पना का मूल भारतीय सभ्यता-दृष्टि में निहित है। वे बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि भारत की पहचान उसकी लोक-परम्परा, ग्राम-संस्कृति, सहकारिता और ज्ञान-परम्परा से बनती है। उन्होंने कहा था कि भारत का विकास मॉडल भारत की मिट्टी से निकले बिना सफल नहीं हो सकता। वास्तव में मोदी का स्वदेशी संकल्प पश्चिमी आधुनिकता की नकल पर आधारित विकास मॉडल से स्पष्ट असहमति प्रकट करता है। मोदी की स्वदेशी सोच में भारतीयता और आधुनिकता का द्वंद्व नहीं बल्कि संवाद है।
2014 के पश्चात भारत में स्वदेशी अभियान मुख्य रूप से तीन स्तरों पर कार्य कर रहा है। वैचारिक स्वदेशी, आर्थिक स्वदेशी तथा सांस्कृतिक स्वदेशी।
नरेंद्र मोदी का स्वदेशी के प्रति लगाव केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं है। वे स्पष्ट रूप से कहते हैं, आत्मनिर्भर भारत का अर्थ आत्मकेंद्रित होना नहीं है बल्कि आत्मविश्वास से भरा हुआ भारत है। उनका यह कथन स्वदेशी की आधुनिक परिभाषा प्रस्तुत करता है। यहां स्वदेशी का अर्थ दुनिया से कटना नहीं बल्कि दुनिया के साथ बराबरी के स्तर पर खड़ा होना है।
कोविड-19 महामारी के दौरान घोषित आत्मनिर्भर भारत अभियान इस सोच का स्पष्ट उदाहरण था। जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं चरमरा गईं और बड़े-बड़े देश आवश्यक वस्तुओं के लिए दूसरों पर निर्भर दिखाई दिए, तब यह सच्चाई सामने आई कि आर्थिक निर्भरता अंततः राष्ट्रीय सम्प्रभुता को कमजोर करती है। प्रधान मंत्री मोदी ने उसी समय देश को यह संदेश दिया कि हर संकट अपने साथ एक अवसर लेकर आता है। आत्मनिर्भर भारत उसी अवसर को पहचानने का प्रयास था।
स्वदेशी को जन-आंदोलन बनाने की दिशा में ‘वोकल फॉर लोकल’ का आह्वान एक निर्णायक पहल रहा। यह केवल उपभोक्ता व्यवहार बदलने की बात नहीं करता बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भाव जागृत करता है। नरेंद्र मोदी ने वोकल फॉर लोकल अभियान के विषय में कहा था कि जब आप लोकल उत्पाद खरीदते हैं तो आप किसी गरीब के घर का चूल्हा जलाते हैं। इस एक वाक्य में स्वदेशी का आर्थिक, सामाजिक और नैतिक पक्ष एक साथ समाहित हो जाता है। स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना केवल राष्ट्रभक्ति का प्रतीक नहीं बल्कि रोजगार सृजन, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक न्याय का साधन भी है।
औद्योगिक क्षेत्र में मेक इन इंडिया स्वदेशी की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। 2014 में जब इस अभियान की शुरुआत हुई, तब भारत को मात्र एक उपभोक्ता बाजार के रूप में देखा जाता था। प्रधान मंत्री मोदी ने इस मानसिकता को चुनौती देते हुए कहा था कि भारत को सिर्फ बाजार बनकर नहीं रहना है बल्कि दुनिया के लिए उत्पादन करना है।
आज मोबाइल निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटोमोबाइल क्षेत्र में भारत की बढ़ती भूमिका यह दर्शाती है कि यह सोच केवल नारा नहीं रही बल्कि धरातल पर उतर रही है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी का महत्व और भी अधिक है। लम्बे समय तक रक्षा आयात पर निर्भरता भारत की रणनीतिक कमजोरी मानी जाती रही। प्रधान मंत्री मोदी ने इस संदर्भ में अपने 15 अगस्त 2017 के लालकिले पर दिए अभिभाषण स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो देश अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, वह अपने भविष्य के साथ समझौता करता है। स्वदेशी लड़ाकू विमान, युद्धपोत, रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी और रक्षा निर्यात में वृद्धि केवल सैन्य उपलब्धियां नहीं हैं बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति है। रक्षा स्वदेशीकरण भारत को केवल सुरक्षित नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भी बनाता है।
डिजिटल क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां स्वदेशी सोच का आधुनिक रूप प्रस्तुत करती हैं। आधार, यूपीआई, डिजिलॉकर और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने यह सिद्ध किया है कि स्वदेशी तकनीक वैश्विक स्तर पर भी प्रभावी हो सकती है। वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान का मानना है कि तकनीक का उद्देश्य सत्ता नहीं, सेवा होना चाहिए। यह दृष्टि तकनीक को मानवीय सरोकारों से जोड़ती है और स्वदेशी नवाचार को जनकल्याण का माध्यम बनाती है।
स्वदेशी का एक महत्वपूर्ण आयाम कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा है। प्रधान मंत्री मोदी बार-बार कहते हैं, जब किसान सशक्त होगा, तभी भारत सशक्त होगा। प्राकृतिक खेती, जैविक उत्पाद, स्थानीय बीज और स्वयं सहायता समूहों को प्रोत्साहन देकर सरकार ने यह संकेत दिया है कि आत्मनिर्भर भारत की नींव गांवों में ही रखी जाएगी। यह सोच गांधीवादी ग्राम-स्वराज और आधुनिक आर्थिक संरचना के बीच सेतु का काम करती है।
सांस्कृतिक स्तर पर भी स्वदेशी का पुनर्जागरण स्पष्ट दिखाई देता है। योग, आयुर्वेद, भारतीय भाषाएं, विरासत स्थल और परम्पराएं आज भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ का हिस्सा बन रही है। प्रधान मंत्री मोदी सांस्कृतिक स्वदेशी को विकास के विरुद्ध नहीं बल्कि विकास का पूरक मानते हैं। जब कोई राष्ट्र अपनी संस्कृति को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करता है, तभी वह वैश्विक संवाद में सम्मान प्राप्त करता है।
स्वदेशी की आलोचनाएं भी सामने आती रही हैं। कुछ लोग इसे संरक्षणवाद से जोड़कर देखते हैं और आशंका जताते हैं कि यह प्रतिस्पर्धा को सीमित कर सकता है, परंतु सरकारी नीति और प्रधान मंत्री के वक्तव्यों से यह स्पष्ट होता है कि स्वदेशी का आग्रह गुणवत्ता और नवाचार के साथ जुड़ा है। स्वयं प्रधान मंत्री ने कहा है, लोकल को इसलिए नहीं अपनाइए कि वह लोकल है बल्कि इसलिए अपनाइए क्योंकि वह श्रेष्ठ है।
अंततः प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की स्वदेशी संकल्पना भारत को पीछे लौटने का नहीं बल्कि आगे बढ़ने का रास्ता दिखाती है। यह भारत को आत्मनिर्भर ही नहीं बल्कि आत्मविश्वासी बनाने का प्रयास है। उनके शब्दों में यह समय भारत के सामर्थ्य को पहचानने और उस पर विश्वास करने का है। वास्तव में स्वदेशी इसी विश्वास की अभिव्यक्ति है। यदि इसे निरंतरता, गुणवत्ता और समावेशिता के साथ आगे बढ़ाया गया तो यह भारत को 21वीं सदी के वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाने वाला आधार बन सकता है।
सचिन तिवारी
