हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
सामाजिक मर्यादाओं के संस्थापक राम

सामाजिक मर्यादाओं के संस्थापक राम

by हिंदी विवेक
in संस्कृति
0

भारतीय पुरुष अनंतकाल से अवतारों और महानायकों के रूप में शिलालेख रचता रहा है। इनके चरित्र की जीवनशैली इतनी अद्वितीय रही कि इनकी दिनचर्या से प्रस्फुटित सभ्यतागत सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य हजारों वर्ष से अनेक झंझावतों से संघर्षरत रहते रहने के तत्पश्चात भी करोड़ों लोगों के जीवनादर्श की थाती बने हुए हैं।

सूर्यवंश की शास्वत चरित्रगाथा वैवस्त सूर्य के पुत्र मनु और उनकी पत्नी कामगोत्रजा श्रद्धा के पुत्र इक्ष्वाकु के अयोध्या के सम्राट बनने से आरम्भ होती है और उनकी छत्तीसवीं पीढ़ी में जन्म लेते हैं राजा दशरथ! इनकी तीन पत्नियां थीं, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। कौशल्या पुत्र राम सबसे बड़े थे। लक्ष्मण और शत्रुधन सुमित्रा के और कैकेयी के पुत्र थे भरत। इन चारों भ्राताओं के विवाह जनकपुर के राजा जनक की पुत्रियों और भतीजियों से हुए थे। राम का सीता से, लक्ष्मण का सीता की बहन उर्मिला से, भारत का मांडवी से और शत्रुघ्न का पाणिग्रहण श्रुतिकीर्ति से हुआ था। चारों भाइयों की दो-दो संतानें थीं। त्रेताकाल राज-तंत्र का युग था। परंतु यही वह राज-तंत्र था, जिसने स्थापित जड़-मूल्यों में परिवर्तन की शुरूआत की। ये बदलाव राज-तंत्र के संचालन की विधियों से लेकर सनातन-सांस्कृतिक संरचना तक में किए गए।

रामराज्य की परिकल्पना के आधार-सूत्र राजा दशरथ के व्यवहार से स्थापित होने लग गए थे। राजा दशरथ कोई भी महत्वपूर्ण कार्य गुरु वशिष्ट का निर्देश मिले बिना क्रियान्वित नहीं करते थे। वे चक्रवर्ती सम्राट हैं, परंतु गुरु की आज्ञा के लिए, उनके आश्रम पहुंचकर आदर्श स्थापित करते हैं। उनके चारों पुत्र विद्यार्जन के लिए गुरु के आश्रम में जाते हैं। जबकि वे गुरु को राजभवन बुलाकर शिक्षा दिला सकते थे।

This may contain: the lord and his attendants are standing in front of candles

विद्यार्थी चाहे राजकुमार हों या श्रेष्ठि-सुत उन्हें पढ़ने के लिए गुरू के आश्रम या पाठशाला जाकर ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। इस आदर्श की परम्परा दशरथ डालते हैं। आज देश की शिक्षा-व्यवस्था का इसे दुर्भाग्य व दुर्गुण ही कहा जाएगा कि सत्ता-संचालक अपनी संतानों को देश तो छोड़िए विदेशी शिक्षा संस्थानों में पढ़ा रहे हैं।

ऋषि विश्वामित्र यज्ञ-विध्वंसक राक्षसों से मुक्ति के लिए राजा दशरथ से राम एवं लक्ष्मण को मांगते हैं। दशरथ अबोध पुत्रों को संकट में डालने वाली इस मांग से विचलित व व्यथित हो पड़ते हैं। उनकी इस पीड़ा से परिचित होने के उपरांत ऋषि ने उन्हें धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए सम्राटों के त्याग व बलिदान के उपदेश दिए। राजा के देश के प्रति दायित्वों के दृष्टांत सुनाए, किंतु दशरथ सहमत नहीं हुए। बाद में ऋषि वशिष्ठ के समझाने पर तैयार हुए और राम-लक्ष्मण को ऋषि के साथ जाने की आज्ञा दी। यह स्थिति आदर्श अनुशासन की प्रतीक तो है ही, राष्ट्र की सुरक्षा के लिए पुत्रों को संकट में डाल देने की द्योतक भी है। आज कितने मंत्री हैं, जिनके पुत्र सेना में हैं?

Story pin image

राजा जनक द्वारा पुत्री सीता के स्वयंवर की सूचना मिलने पर विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को लेकर जनकपुरी पहुंचते हैं। विश्वामित्र की आज्ञा और आशीर्वाद पाकर राम उस शिव-धनुष को तोड़ देते हैं, जिसे अन्य राजा नहीं तोड़ पाते। सीता राम के गले में जयमाला डालकर स्वयंवर सम्पन्न करती हैं। जनक इस उपलब्धि की सूचना-पत्र के साथ दूत के माध्यम से राजा दशरथ को अयोध्या भेजते हैं।

इस संदेश में आमंत्रण की विनम्र प्रार्थना भी है। दशरथ इस शुभ समाचार को देने वाले दूत को भेंट देते हैं, किंतु दूत किसी भी प्रकार का उपहार स्वीकार नहीं करता है। वह विनम्र भाव से कहता है, ‘यह नैतिकता के विरुद्ध है।’ यानी उस युग में एक दूत का आचरण भी नैतिकता से परिपूर्ण हैं। आज दूत मध्यस्थता के बहाने लालच और बिचौलिया (दलाल) का काम कर रहे हैं।

दशरथ चारों पुत्रों के स्वयंवर के बाद पुत्र-बंधुओं को लेकर अयोध्या के मार्ग पर लौट रहे हैं। इस मार्ग में धनुर्भंग की घटना से क्रोधित परशुराम मिल गए। उन्होंने गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र का अभिवादन किया। दशरथ ने रथ से उतरकर परशुराम के चरण छुए और परशुराम के उपासक होने की बात कही तथा राम-लक्ष्मण के लिए आशीर्वाद मांगा। परशुराम ने राम के अंगों में प्रकट लक्षणों को जाना और आश्वस्त होकर भुजाएं फैलाकर उन्हें आगोश में ले लिया। यहीं परशुराम अपने वृद्ध होने और दक्षिण से पैर पसार रहे आतंक की चिंताओं से राम को अवगत कराते हैं तथा राम को शक्ति-सम्पन्न बनाने की दृष्टि से वैष्णवी धनुष भेंट करते हैं। राम सहित सभी भाइयों ने पत्नियों समेत परशुराम के चरण छूकर आशीर्वाद लिया। दशरथ और उनके मर्यादित स्वभाव से यहां अयोध्या की यौद्धिक शक्ति में वृद्धि होती है।

अयोध्या पहुंचने के बाद दशरथ ने राम को युवराज बना देने के प्रसंग पर विचार किया। गुरु वशिष्ठ से अनुमति ली और राम को युवराज बना देने की घोषणा कर दी। किंतु होनी तो कुछ और होनी थी। कैकेयी की दासी मंथरा ने उन्हें भड़का दिया। मानव-मनोविज्ञान की स्वभावगत लाचारी है कि मनुष्य रक्त-सम्बंधों की ओर झुकता है। सो कैकेयी दशरथ से भरत को अयोध्या का राजा बना देने के हठ के साथ राम को 14 वर्ष का वनवास देने के वचन के संकल्प के साथ कोप-भवन में रुठकर बैठ गईं। राजा से वरदान देने के हठ की यह सूचना राम को मिली तो राम अधिकार-बहिष्कार से असहिष्णु आचरण करने के वनस्वित माता कैकेयी से वन गमन की आज्ञा और आशीर्वाद के लिए उनके निकट पहुंचते हैं। सत्ता का यह त्याग राम के आदर्श आचरण की पराकाष्ठा है।

Story pin image

वनगमन के समय रावण द्वारा छल से सीता के अपहरण के बाद उनकी खोज में राम की मुलाकात हनुमान और सुग्रीव से होती है। राम अतिचारी सुग्रीव के अग्रज बालि का वध करते हैं और सुग्रीव का राज्याभिषेक लक्ष्मण को किष्किंधा भेजकर कराते हैं। राम किष्किंधा में प्रवेश नहीं करते हैं, क्योंकि उन्हें साधु वेश में रहते हुए किसी राज्य की सीमा में प्रवेश की अनुमति नहीं है। यही उदाहरण राम लंकापति रावण के वध और लंका पर विजय के उपरांत प्रस्तुत करते हैं। वे रावण के अनुज विभीषण का राजतिलक लक्ष्मण, सुग्रीव हनुमान और ऋषियों को भेजकर कराते हैं।

ये वे मर्यादित आचरण हैं, जो राम को महान नायक के साथ ईशवरत्व प्रदान करते हैं। लेकिन जब राम सीता को लेकर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं तो सुग्रीव और हनुमान को आदेश देते हैं कि जिस सेतु का लंका पहुंचने के लिए निर्माण किया गया है, उसे लंका की ओर से तोड़ दें। क्योंकि जो देशद्रोही विभीषण अपने कुल और राष्ट्र का नहीं हुआ, उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। राम की मर्यादा और उनके सहिष्णु आचरण की परछाई में इस संदेश को एक सबक के रूप में देखने की आवश्यकता है, क्योंकि भारत लगातार ऐसे ही राष्ट्रद्रोहियों से जूझता रहा है और वर्तमान में भी जूझ रहा हैं।

–प्रमोद भार्गव

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: #ShriRam #RamNavami #HinduMythology #LordRam #Ramayana #DivineGrace #SpiritualJourney #IndianCulture #FaithAndDevotion #RamBhakti

हिंदी विवेक

Next Post
Trump on iran

अमेरिकी साम्राज्य के पतन की नींव रख रहे ट्रंप ?

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0