बुद्ध
आसान नहीं है, बुद्ध बन पाना।
आसान नहीं है, बुद्ध हो जाना ।
बुद्ध, जिसमें थी परम बुद्धिमत्ता।
बुद्ध, जिनकी असीमित थी क्षमता।
बुद्ध में नहीं थी, सामान्य भौतिकता।
बुद्ध का मन, गृहस्थी में नहीं था रमता।
सामान्य जिम्मेवारियों का नहीं कर पाए, निर्वहन।
उन्हें छू भी नहीं पाया, संसारिक व्यसन।
यशोधरा के भींगे नयन, सदैव करते रहे प्रश्न।
राहुल के नन्हें हाथ, खोजते रहे पिता का साथ।
वो जो बन गये महात्मा,
जिनके अंदर बसी थी दिव्यात्मा।
अपने पीछे छोड़ गये एक मौन,
उनके अधूरेपन का जिम्मेवार आखिर कौन?
संसार को मिला, बुद्ध से ज्ञान।
संसार में बुद्ध सा नहीं होगा, कोई महान।
देने को नश्वरता का ज्ञान, उन्होने ठाना महाप्रयाण।
क्या उन्हे नहीं था, यशोधरा की पीड़ा का भा ।
कर्मफल के होते, कई प्रभाव।
कर्मफल के भी होते, कई दुष्प्रभाव।
कभी-कभी बनने को समंदर,
विष समेटना होता है,
अपने अंदर ।
-परिणीता सिन्हा ‘स्वयंसिद्धा’

