अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी जंग से पश्चिमी एशिया और खाड़ी क्षेत्र युद्धभूमि में परिवर्तित हो चुका है। पिछली एक सदी में यह पहली बार है, जब भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान किंकर्तव्यविमूढ़ है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अबतक इस्लाम को किससे तथाकथित “खतरा” है, इसे लेकर उनकी एक स्पष्ट धारणा थी। विश्व के इस भूखंड पर अधिकांश मुस्लिमों की सहानुभूति ईरान के साथ है। परंतु वे इस युद्ध का खुलकर समर्थन इसलिए नहीं कर पा रहे है, क्योंकि ईरान प्रतिक्रियास्वरूप अपने सैंकड़ो हवाई हमलों से मध्यपूर्व-खाड़ी के घोषित इस्लामी देशों को भी जख्मी कर रहा है। अब जाए, तो किधर जाए?
ईरानी कोप का शिकार खाड़ी देशों में यूएई, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन, इराक, सीरिया और जॉर्डन के साथ वह सऊदी अरब भी शामिल है, जहां सदियों पहले हजरत मोहम्मद साहब का जन्म हुआ, इस्लाम ने मजहबी आकार लिया, कुरान का अवतरण हुआ और मुसलमानों के लिए पवित्र मक्का-मदीना वही स्थित है। क्यों भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश मुसलमान सऊदी अरब और अन्य मुस्लिम देशों पर ईरानी आक्रामकता को ‘इस्लाम पर हमला’ नहीं बता पा रहा है? इस प्रश्न का उत्तर खाड़ी देशों की वर्तमान राजनीतिक दिशा और नेतृत्व में निहित है।

वर्ष 2017 से सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और वास्तविक शासक मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस), जिनका परिवार मक्का-मदीना का संरक्षक है— वे लगातार ईरान की नीतियों और उसकी इस्लामी क्रांति (1979) को इस्लामी दुनिया में बढ़ती असहिष्णुता के लिए जिम्मेदार ठहराते रहे है। विडंबना यह है कि जिस बात के लिए एमबीएस ईरान को कोस रहे है, उसका अपराधी सऊदी अरब भी रहा है, क्योंकि लंबे समय तक सऊदी शासन कट्टरपंथी वहाबी-सलाफी विचारधारा से प्रभावित है, जो ‘तौहीद’ (एकेश्वरवाद) की कठोर व्याख्या करते हुए सूफीवाद, शिया परंपराओं और मजार-दरगाह परंपरा का विरोध करता है। 18वीं सदी में मोहम्मद बिन सऊद और मुहम्मद इब्न अब्द अल-वहाब के बीच हुए समझौते ने इस चिंतन को संस्थागत रूप दिया।

कालांतर में विशेषकर 1970 के दशक से पेट्रो-डॉलर से सुसज्जित सऊदी अरब ने इसके प्रसार अभियान के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर मस्जिदों, मदरसों और इस्लामी संस्थानों में भारी वित्तपोषण किया। 1980 के दौर में अमेरिका ने सऊदी अरब और पाकिस्तान के समर्थन से सोवियत संघ के खिलाफ अफगानिस्तान में जिहाद को बढ़ावा दिया। अल-कायदा और इस्लामी स्टेट जैसे जिहादी संगठन वहाबी-सलाफी की वैचारिक घुट्टी से ही प्रेरणा पाते है, जिसने रक्तपिपासु ‘काफिर-कुफ्र’ अवधारणा को पहले से अधिक सुदृढ़ किया है।
किंतु 21वीं सदी के बदलते वैश्विक परिदृश्य, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के उदय, ई-वाहनों के प्रसार और वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के चलते में खाड़ी देश— विशेषकर सऊदी अरब स्वयं को मध्यकालीन मानसिकता से बाहर निकलकर व्यावहारिक, उदार और सह-अस्तित्व आधारित समाज बनाना चाहता है।
एमबीएस के नेतृत्व में सऊदी अरब पूर्णतः शरीयत-आधारित इस्लामी देश नहीं रह गया है। सत्ता संभालते ही उनका घोषित लक्ष्य था, “सऊदी अरब की 70% आबादी युवा 30 वर्ष से कम उम्र की है। हम अपनी जिंदगी के अगले 30 वर्ष विनाशकारी विचारों से जूझने में नहीं बिताएंगे।

हम उन्हें आज ही, तुरंत समाप्त कर देंगे।” इसी उपक्रम के अंतर्गत बीते एक दशक से सऊदी अरब में वह स्वागतयोग्य सामाजिक सुधार हो रहे है, जो विशुद्ध इस्लामी दृष्टिकोण में वर्जित (हराम) है। इसमें मनोरंजन-पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ महिलाओं को बिना पुरुष संरक्षक के वाहन चलाने की अनुमति, कामकाज में उनकी भागीदारी बढ़ाने सहित श्रमिक कानून में सुधार किया जा रहा है।

इस उपक्रम में उन नियमों में सुधार किया जा रहा है, जो इस्लामी मान्यताओं की जकड़ में है और सह-अस्तित्व में बड़ी बाधा है। इसी कड़ी में दो वर्ष पहले यूएई में स्वामीनारायण मंदिर का भव्य दिव्य निर्माण हुआ। बहरीन भी हिंदू मंदिर हेतु जमीन आवंटित कर चुका है। अर्थात्— सदियों बाद खाड़ी देश कट्टरवादी इस्लामी बेड़ियों को काट रहे हैं।
यह रोचक है कि जैसे-जैसे अरब देश स्वयं को उदार, सहिष्णु और आधुनिक बना रहे है, वैसे-वैसे भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों का एक वर्ग इन देशों से निराश है। इसका ऐतिहासिक संदर्भ समझना आवश्यक है। पहले विश्वयुद्ध में जब ब्रिटेन ने तुर्की पर हमला किया, जिसके शासक को इस्लामी जगत में खलीफा की पदवी हासिल थी— तब दुनिया में केवल अविभाजित भारत के मुसलमान तुर्की के खलीफा पद को बहाल करने हेतु आंदोलित हो उठे, जिसे हम खूनी ‘खिलाफत आंदोलन’ के नाम से जानते है। यह भी विचारणीय है, तब दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया-मलेशिया सहित) खिलाफत आंदोलन से अप्रभावित रहा, जहां मुसलमानों की बड़ी संख्या बसती थी। इसके कारण स्पष्ट है।

भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का विस्तार मुख्यतः बाहरी आक्रांताओं के माध्यम से हुआ, जिससे यहां के मुसलमानों में राजनीतिक-साम्राज्यवादी चेतना प्रबल रही; जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया में यह प्रक्रिया अधिक शांतिपूर्ण, व्यापारिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से विकसित हुई। भारतीय उपमहाद्वीप के अधिकांश मुसलमान न केवल अपनी पूर्व-इस्लामी जड़ों से कट चुके है, बल्कि उससे घृणा भी करते हैं, जबकि दक्षिण-पूर्व एशिया के ज्यादातर मुस्लिमों में स्थानीय सांस्कृतिक निरंतरता अब भी स्पष्ट रूप से झलकती है।
इसके अतिरिक्त, तत्कालीन भारत के मुसलमानों ने उस्मानी खिलाफत को वैश्विक इस्लामी सत्ता के रूप में देखा। तब मुस्लिम समाज के अभिजात वर्ग की धारणा बन गई कि खिलाफत की रक्षा वस्तुतः भारत में इस्लामी परचम को फिर से लहराने का उपक्रम है, इसलिए तब देश के कई हिस्सों (मालाबार सहित) में सदियों से जारी हिंदुओं का नरसंहार दोहराया गया। इसके विपरीत, दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम समाजों के लिए तुर्की का प्रश्न दूरस्थ था। साथ ही, भारत में खिलाफत आंदोलन ब्रिटिश विरोधी राजनीति से जुड़ गया, जबकि इंडोनेशिया में डच औपनिवेशिक सत्ता प्रथम विश्वयुद्ध में तटस्थ रही। इस प्रकार, भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम का स्वरूप उग्र, हिंसक और अलगाववादी चिंतन में विकसित हुआ।
इस पृष्ठभूमि में आज जैसा खाड़ी देशों का स्वरूप दिखता है, वैसा 100 साल पहले नहीं था। 1916 में अरब मुस्लिमों द्वारा ओटोमन (तुर्की) साम्राज्य के खिलाफ किया गया सैन्य विद्रोह, प्रथम विश्वयुद्ध से तुर्की के क्रमिक पतन और पश्चिमी शक्तियों के हस्तक्षेप से मध्यपूर्व का राजनीतिक भूगोल पुनर्गठित हुआ। इराक (1921), सीरिया, लेबनान (1920), जॉर्डन (1921) सऊदी अरब (1932), संयुक्त अरब अमीरात और ओमान (1971) में राष्ट्र के तौर पर अस्तित्व में आए।
दूसरे विश्वयुद्ध (1939-45) के बाद अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ ‘सुरक्षा के बदले तेल’ का समझौता किया और उसके लगभग सभी खाड़ी देशों के साथ रणनीतिक संबंध है।

यही समूचा परिदृश्य भारतीय उपमहाद्वीप के मुसमलानों में व्याप्त गहरे अंतर्द्वंद को उजागर करता है। जो मुस्लिम वर्ग, गाजा प्रकरण या ईरान में अमेरिका-इजराइल की बमवर्षा पर तीखी प्रतिक्रिया देता है, वही पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में किए गए हवाई हमलों में मारे गए सैकड़ों मुसलमानों पर चुप्पी साध लेता है। क्या उनका यह कशमकश भविष्य में और गहराएगा या बदलते वैश्विक यथार्थ के साथ एक नई करवट लेगा?
एक सदी पहले मुस्तफा कमाल पाशा अतातुर्क के उदार दृष्टिकोण ने इस्लामी तुर्की को सेकुलर स्वरूप दिया था, उसे बीते 20 वर्षों से घोर मजहबी वर्तमान राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन से चुनौती मिल रही है। इसी तरह ईरान को आधुनिक बनाने हेतु शाह मोहम्मद रजा पहलवी ने अपने दौर (1941-1979) में अभियान छेड़ा, परंतु आयतुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी ने हिंसा के बल पर पहलवी को अपदस्थ करके ईरान को शरीयत के अधीन कर दिया। इस पृष्ठभूमि में क्या सुधारवादी उपक्रम चलाने वाले एमबीएस नीत सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश अतातुर्क या पहलवी की परंपरा को निर्णायक मोड़ पर ले पाएंगे?
– बलबीर पुंज

