| अमेरिका की सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग वैश्विक अस्थिरता का प्रमुख कारण बन चुका है- वेनेजुएला के बाद ईरान और अब इसके बाद अगला कौन? अमेरिका की दादागिरी विश्व के लिए संकट है। यह एकाधिकारवादी वर्चस्व तब तक नहीं रुकेगा जब तक बहुध्रुवीय व्यवस्था की नींव नहीं रखी जाती, जहां संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं वास्तविक सर्वसमावेशिता से कार्य करें। |
आज जब विश्व के समाचार माध्यमों पर मध्य-पूर्व में मंडराते युद्ध के बादलों की चर्चा हो रही है, तब चर्चा प्रायः मिसाइलों, सैन्य शक्ति और सामरिक गठबंधनों तक सीमित रह जाती है, परंतु यदि इस परत के नीचे झांककर देखा जाए तो प्रश्न कहीं अधिक गहरा है- युद्ध आखिर होता क्यों है और इससे सबसे अधिक लाभ किसे मिलता है?
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में युद्ध केवल सीमाओं या विचारधाराओं की लड़ाई नहीं रह गया है। इसके पीछे आर्थिक हित, सामरिक वर्चस्व और वैश्विक शक्ति संतुलन की जटिल गणित काम करती है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव भी इसी व्यापक परिदृश्य का हिस्सा है।
युद्ध: लाभ-हानि का सुनियोजित खेल
कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मत है कि आधुनिक युद्धों के पीछे एक विशाल वॉर इकोनॉमी काम करती है। रक्षा उद्योग, हथियार निर्माण, सैन्य ठेके और युद्धोत्तर पुनर्निर्माण- ये सब मिलकर एक ऐसा आर्थिक तंत्र बनाते हैं जिसमें युद्ध स्वयं एक उद्योग बन जाता है।
दुनिया की बड़ी हथियार कम्पनियां- जैसे ङेलज्ञहशशव चरीींळप, इेशळपस और ठरूींहशेप ढशलहपेश्रेसळशी- हर वर्ष अरबों डॉलर के रक्षा सौदे करती हैं। युद्ध की स्थिति में इन कम्पनियों के उत्पादों की मांग अचानक बढ़ जाती है। यही कारण है कि कई बार यह आरोप लगाया जाता है कि वैश्विक राजनीति में हथियार उद्योग का प्रभाव अत्यंत गहरा है।
जब किसी क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है तो हथियारों की आपूर्ति, सैन्य प्रशिक्षण, सुरक्षा अनुबंध और तकनीकी सहयोग के नाम पर भारी आर्थिक गतिविधि शुरू हो जाती है। इसलिए कुछ आलोचक इसे युद्ध का व्यापार भी कहते हैं।

‘डीप स्टेट’ की अवधारणा
अमेरिकी राजनीति में प्राय: डीप स्टेट शब्द का उल्लेख किया जाता है। इससे आशय उन प्रभावशाली संस्थानों और नेटवर्क से लगाया जाता है जिनमें खुफिया एजेंसियां, सैन्य प्रतिष्ठान, बड़े कॉर्पोरेट समूह और नीति-निर्माण पर प्रभाव रखने वाले थिंक टैंक शामिल होते हैं।
आलोचकों का तर्क है कि यह नेटवर्क अमेरिकी विदेश नीति को इस प्रकार प्रभावित करता है कि अमेरिका का वैश्विक वर्चस्व बना रहे। यदि विश्व में स्थायी शांति स्थापित हो जाए तो हथियार उद्योग और सैन्य बजट का बड़ा हिस्सा अप्रासंगिक हो सकता है। इसलिए कई बार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तनाव की स्थिति बनी रहती है।
इतिहास के आईने में अमेरिकी हस्तक्षेप
पिछली एक सदी के इतिहास पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वैश्विक राजनीति में अमेरिका ने कई बार लोकतंत्र की रक्षा, मानवाधिकार या सुरक्षा के नाम पर सैन्य हस्तक्षेप किए। इन हस्तक्षेपों के पीछे कई बार रणनीतिक और आर्थिक हित भी जुड़े रहे। कुल मिलाकर अमेरिकी दादागिरी के कुछ उदाहरण जिन पर हमारी दृष्टि रहनी चाहिए, वे कुछ इस तरह है –

कोरिया युद्ध (1950-1953)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोरियाई प्रायद्वीप उत्तर और दक्षिण कोरिया में विभाजित हो गया। इस संघर्ष में अमेरिका ने दक्षिण कोरिया का समर्थन करते हुए व्यापक सैन्य हस्तक्षेप किया। युद्ध समाप्त होने के बाद भी कोरिया आज तक स्थाई शांति नहीं देख पाया।

वियतनाम युद्ध (1955-1975)
शीत युद्ध के दौर में साम्यवाद को रोकने के उद्देश्य से अमेरिका ने वियतनाम में हस्तक्षेप किया। यह युद्ध लगभग दो दशक तक चला और लाखों लोगों की जान चली गई। अंततः अमेरिका को सैन्य और राजनीतिक रूप से पीछे हटना पड़ा।

लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप (1970 का दशक)
1973 में चिली में सैन्य सत्तापरिवर्तन के दौरान अमेरिका की भूमिका को लेकर व्यापक चर्चा हुई। इसी तरह निकारागुआ और एल सल्वाडोर जैसे देशों में भी अमेरिकी हस्तक्षेप के आरोप लगे।

इराक युद्ध (1991 और 2003)
1991 में कुवैत संकट के बाद अमेरिका के नेतृत्व में गठबंधन सेनाओं ने इराक पर हमला किया। 2003 में फिर से अमेरिका ने ‘विनाशकारी हथियारों’ के आरोप के आधार पर इराक पर आक्रमण किया, परंतु बाद में ऐसे हथियारों का कोई प्रमाण नहीं मिला।
अफगानिस्तान युद्ध (2001-2021)
11 सितम्बर 2001 के आतंकी हमलों के बाद शुरू हुआ अफगानिस्तान युद्ध दो दशकों तक चला। अंततः 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद देश फिर से राजनीतिक अस्थिरता में घिर गया।

लीबिया हस्तक्षेप (2011)
अरब स्प्रिंग के दौरान अमेरिका और नाटो देशों की सैन्य कार्रवाई के बाद लीबिया में शासन परिवर्तन हुआ, परंतु उसके बाद देश लम्बे समय तक गृहयुद्ध और अराजकता से जूझता रहा।
सीरिया संकट
सीरिया के गृहयुद्ध में कई वैश्विक शक्तियां प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शामिल रहीं। इस संघर्ष ने मध्य-पूर्व की राजनीतिक स्थिरता को गहराई से प्रभावित किया।

यूक्रेन संकट
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी वैश्विक शक्ति संघर्ष का एक बड़ा उदाहरण है। पश्चिमी देशों द्वारा यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सहायता ने इस संघर्ष को अंतरराष्ट्रीय आयाम दे दिया है।
वेनेजुएला पर दबाव
तेल सम्पदा से समृद्ध वेनेजुएला लम्बे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव का सामना कर रहा है। आलोचकों का मानना है कि यह संसाधनों और राजनीतिक प्रभाव की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है।

ईरान के बाद अगला कौन?
आज जब ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ रहा है तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि यह संघर्ष और गहरा हुआ तो उसका अगला चरण क्या होगा? कई विश्लेषक मानते हैं कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र, विशेषकर ताइवान और दक्षिण चीन सागर, भविष्य के सम्भावित तनाव क्षेत्रों में शामिल हैं। चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा इस क्षेत्र को संवेदनशील बना रही है। इसी तरह ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध लैटिन अमेरिका और अफ्रीका भी वैश्विक शक्ति संघर्ष के नए केंद्र बन सकते हैं।
भारत की नीति: संतुलन और स्वायत्तता
भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने किसी भी सैन्य गुट का हिस्सा बनने के बजाए स्वतंत्र नीति अपनाई। आज भारत अमेरिका, रूस, यूरोप, मध्य-पूर्व और एशिया-प्रशांत सभी क्षेत्रों के साथ सम्बंध बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। यह संतुलन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत की ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा आवश्यकताएं कई क्षेत्रों से जुड़ी हुई हैं।
भारत के लिए पांच रणनीतिक प्राथमिकताएं
यदि विश्व राजनीति में अस्थिरता बढ़ती है तो भारत को कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा।
रक्षा आत्मनिर्भरता
स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूत करना ताकि विदेशी निर्भरता कम हो।
आर्थिक शक्ति
वैश्विक व्यापार में भारत की भूमिका बढ़ाना और नई आर्थिक साझेदारियां विकसित करना।
ऊर्जा सुरक्षा
रणनीतिक तेल भंडार और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देना।
सूचना सुरक्षा
डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा और सूचना युद्ध से निपटने की क्षमता बढ़ाना।
बहुपक्षीय कूटनीति
भारत को वैश्विक दक्षिण की आवाज बनकर संतुलित विश्व व्यवस्था की वकालत करनी चाहिए।
नया विश्व संतुलन क्यों आवश्यक है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक संस्थाएं आज भी विश्व राजनीति को प्रभावित करती हैं, परंतु वर्तमान समय में शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों की भूमिका बढ़ रही है। ऐसे में अधिक लोकतांत्रिक और समावेशी वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जिसमें निर्णय प्रक्रिया में सभी क्षेत्रों की उचित भागीदारी हो।
आधुनिक विश्व में युद्ध केवल सैनिकों की लड़ाई नहीं बल्कि आर्थिक और राजनीतिक हितों का जटिल तंत्र बन चुका है। यदि मानवता को स्थायी शांति की दिशा में बढ़ना है तो वैश्विक शक्ति-राजनीति को संतुलित करना होगा। किसी एक देश का एकाधिकार या वर्चस्व लम्बे समय तक टिकाऊ नहीं हो सकता।
भारत के सामने चुनौती भी है और अवसर भी। यदि भारत अपनी आर्थिक शक्ति, सैन्य क्षमता और कूटनीतिक संतुलन को मजबूत करता है तो वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकेगा बल्कि विश्व में शांति और संतुलन का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ भी बन सकता है। भारतीय चिंतन में कहा गया है- शक्ति और नीति का संतुलन ही स्थायी शांति की आधारशिला है। आज की विश्व व्यवस्था को भी इसी सिद्धांत की आवश्यकता है।
-मनमोहन पुरोहित

