मनुष्य का इतिहास युद्ध की ध्वनि-प्रतिध्वनि से सदैव आक्रांत रहा है। यह केवल रणभूमि में टकराते अस्त्रों की झंकार नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले अदृश्य द्वंद्व का भी उद्घोष है। हाइडेस्पीज़ से लेकर हस्तिनापुर तक, युद्ध बाह्य घटना भर नहीं; यह मनुष्य के चित्त में उठती उन तरंगों का परिणाम है, जिनमें स्वार्थ, अस्मिता, धर्म, अहं और अस्तित्व— सब एक साथ उलझ जाते हैं।
विशेषतः जातीय अस्मिता? ‘जाति’ जन्म से संबंधित! यह कभी सौख्य भाव की निर्मिति के लिए आविष्कार किया गया होगा। इसके मूल में सह-अस्तित्व और भ्रातृत्व ही रहे होंगे। पर हा हन्त!
युद्ध की जड़ें धरती पर कम, मनुष्य के मन में अधिक होती हैं। जब मनुष्य ‘मैं’ और ‘मेरा’ के घेरे को इतना सघन कर लेता है कि उसमें दूसरे के लिए स्थान नहीं बचता, तब युद्ध अनिवार्य हो उठता है। इस अर्थ में युद्ध एक दार्शनिक समस्या है— क्योंकि यह प्रश्न उठाता है कि मनुष्य की प्रकृति क्या है? क्या वह मूलतः हिंसक है या सह-अस्तित्व का इच्छुक?
भारतीय चिंतन ने इस प्रश्न को बहुत गहराई से देखा है।
यहाँ युद्ध को केवल विनाश का उपकरण नहीं माना गया, बल्कि धर्म की रक्षा का साधन भी समझा गया। परंतु यह भी कहा गया कि युद्ध अंतिम उपाय होना चाहिए, प्रारंभिक नहीं। जब संवाद के सारे द्वार बंद हो जाएँ, जब अन्याय अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाए, तब ही शस्त्र उठाने की अनुमति है। इसीलिए हमारे ग्रंथों में युद्ध से पहले शांति-प्रयासों का विस्तृत वर्णन मिलता है— मानो मनुष्य स्वयं से कह रहा हो, “क्या सचमुच अब कोई और मार्ग शेष नहीं?”
युद्ध का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वह शांति के नाम पर लड़ा जाता है। हर पक्ष अपने को न्यायसंगत ठहराता है, हर योद्धा अपने संघर्ष को धर्मयुद्ध कहता है। परंतु जब धूल बैठती है, तो दोनों ओर केवल श्मशान की निस्तब्धता बचती है।
तब यह प्रश्न उठता है— क्या यह सब अपरिहार्य था? क्या मनुष्य अपनी बुद्धि और संवेदना के सहारे इस विनाश को टाल नहीं सकता था? महाभारत जैसे युद्धों का भी निष्कर्ष यही दो प्रश्न ही तो हैं।
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दार्शनिक दृष्टि से युद्ध मनुष्य की सीमाओं का उद्घाटन करता है। यह बताता है कि ज्ञान और विज्ञान के उत्कर्ष के बावजूद मनुष्य अपने भीतर के अंधकार से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। सभ्यता जितनी विकसित होती है, युद्ध उतना ही परिष्कृत और भयानक होता जाता है। तीर-तलवारों से लेकर परमाणु बमों-मिसाइलों तक की यात्रा केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी हिंसा की भी यात्रा है।
परंतु यही युद्ध मनुष्य को आत्मावलोकन के लिए भी विवश करता है। हर युद्ध के बाद एक प्रश्न शेष रह जाता है— “अब आगे क्या?” और इसी प्रश्न से शांति की आकांक्षा जन्म लेती है। शायद इसीलिए इतिहास में युद्धों के बाद ही महान शांति-आंदोलनों और मानवीय मूल्यों का पुनर्जागरण हुआ है।
युद्ध एक त्रासदी तो है, परंतु उसमें करुणा का एक सूक्ष्म बीज भी छिपा होता है। रणभूमि में जब दो शत्रु आमने-सामने होते हैं, तब वे केवल विरोधी नहीं रहते— वे दो मनुष्य होते हैं, जिनकी पीड़ा, आशाएँ और भय एक-दूसरे से भिन्न नहीं होते। यही बोध युद्ध को दार्शनिक समस्या बना देता है— क्योंकि वह हमें यह समझने पर विवश करता है कि हम किससे लड़ रहे हैं— दूसरे से या अपने ही भीतर के अंधकार से?
The recent airstrikes conducted by the United States and Israel against Iranian targets have raised significant concerns regarding the stability of the Strait of Hormuz, a vital passageway for global oil shipments. As tensions escalate in the region, experts warn that any disruption could have far-reaching implications for international trade and energy security. Governments worldwide are closely monitoring the situation, emphasizing the need for diplomatic solutions to avert further conflict. The potential for heightened military engagement necessitates a collective response to ensure peace and stability in this critical geopolitical area.
अंततः युद्ध का समाधान शस्त्रों में नहीं, दृष्टि में है। जब मनुष्य अपने ‘अहं’ से ऊपर उठकर ‘समष्टि’ की अनुभूति करेगा, तब युद्ध की आवश्यकता स्वयं समाप्त हो जाएगी। तब विजय का अर्थ पराजय नहीं होगा, बल्कि समन्वय होगा। परन्तु संसार, वह कभी युद्ध से मुक्त न था, न रहेगा। युद्ध होते रहेंगे। योद्धा बदल जाएंगे, मैदान बदल जाएगा, पर युद्ध रहेगा।
कारण कि सृष्टि ने युद्ध बुना है मानव मन के भीतर। जब तक एक भी भयभीत जीवित है, जब तक एक भी अहंकारी जीवित है, युद्ध की संभावना रहेगी। और हो सकता है कि पूरे संसार में शान्ति कभी आ भी जाए, पर मिडिल ईस्ट में नहीं।
मध्य पूर्व युद्ध को देखें। यह केवल एक राजनीतिक घटना या सैन्य भागीदारी नहीं है। सैन्य इतिहास का अध्येता जब नैतिकता, तत्वमीमांसा और राजनीतिक सिद्धांत के चौराहे पर खड़ा होता है तो वहां कोई भी उत्तर कभी भी पूरी तरह से संतोषजनक नहीं होता है और हर निष्कर्ष संदेह से घिरा रहता है।
मध्य पूर्व को मोटा-मोटा रेखांकित किया जाए –
१) वहां अस्थिरता है क्योंकि वहां तेल है और इस तेल पर नियंत्रण बदलता रहता है।
२) धार्मिक भावनाओं का कुछ अति सयाने लोगों द्वारा निजी हित के लिए इस्तेमाल कर लिया जाना, वैसे तो पूरी दुनिया में होता है, पर मिडल ईस्ट इसकी सबसे बड़ी प्रयोगशाला।
३) मध्य पूर्व को देखकर यह स्पष्ट होता है कि ‘हिंसा’ कोई मानवी अस्तित्व के लिए आवश्यक तत्व हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं बल्कि हिंसा केवल और केवल कुछ अति महत्वाकांक्षी
लोगों द्वारा थोपी गयी चीज है।
४) धर्म और जाति इन दो सुंदर व्यवस्थाओं का पाशविक अति महत्वाकांक्षी लोगों के हाथों में लग जाने के बाद क्या हश्र होगा, यह यहां से समझा जा सकता है।
५) युद्ध नीतिज्ञ लोग ऐसा समझा जाता है कि बहुत कैलकुलेटेड तरीके से युद्ध में उतरने का फ़ैसला करते हैं। पर नहीं, सच यह है कि युद्ध मिस-कैलकुलेशन से उपजते हैं। क्योंकि
इस इंटर-डिपेंडेंट विश्व में शक्तिशाली तो छोड़िए, हम बराबरी वाले से भी नहीं लड़ना चाहेंगे।
खैर, तनिक सरल ज्योतिषीय और मेदिनी के तौर तरीकों से देखा जाए-
१) नील नदी, यूफ्रेट्स, शत-अल-अरब, टाइग्रिस और जॉर्डन नदी के इलाके मंगल की दोनों राशियों मेष और वृश्चिक के अधीन आते हैं।
२) प्राकृतिक तेल गैस और खनिज निकलने वाली जगहों पर वृष राशि में शनि तथा राहु का प्रभाव समझा जाता है।
३) जब जब शनि अथवा बृहस्पति मकर तथा कुम्भ से निकल कर मीन मेष की तरफ जाते हैं, मध्य पूर्व अशान्त हो जाता है।
४) इस तरह के गोचर वाले शनि तथा गुरु को जब राहु या मंगल का प्रकोप साथ मिल जाता है मिडिल ईस्ट जल उठता है। सूर्य या चंद्र ग्रहण के ठीक अगले दिन तलवारें खिंच जाने का इतिहास है।
पिछले 100 बरस का गोचर यही कहता है।
अब लाख टके का सवाल कि यह सब कब तक चलेगा?
उत्तर है कि अप्रैल में ही अस्थाई शान्ति आ जाएगी।
पर ध्यान रहे कि हर युद्ध के बाद दुनिया थोड़ी तो बदल ही जाती है।
– मधुसूदन उपाध्याय

