अपनी कुशल रणनीति से जीत को अपने पक्ष में खींच लाने की विशेष क्षमता के लिए महेंद्र सिंह धोनी का नाम लिया जाता है। भारत के “कैप्टन कूल” के रूप में प्रसिद्ध धोनी अपने पूरे करियर में हमेशा शांत, संयमी और जीत के लिए भूखे खिलाड़ी के रूप में नजर आए हैं। उन्होंने अनेक मुकाबले अपनी सूझबूझ भरी रणनीति और प्रभावी बल्लेबाजी के दम पर लगभग अकेले ही जीत में बदले हैं। दबाव को नज़रअंदाज़ करते हुए लगातार शानदार प्रदर्शन करना धोनी की पहचान रही है।


धोनी के करियर का स्वर्णिम क्षण वह रहा, जब उन्होंने 2 अप्रैल 2011 को श्रीलंका के खिलाफ नुवान कुलशेखरा की गेंद पर वह विजयी छक्का जड़ा, जो आज भी हर भारतीय के दिल में उत्सव की तरह गूंजता है। उस समय सचिन तेंदुलकर को कंधों पर उठाकर मैदान का चक्कर लगाना, गैरी कर्स्टन को दी गई सम्मानपूर्ण विदाई और धोनी का भाषण— ये सभी पल आज भी उस ऐतिहासिक जीत की यादों को जीवंत कर देते हैं।

धोनी की अगुवाई में भारतीय टीम ने इस दिन विश्व कप जीतकर पूरे देश को मानो खुशी का अमृत दे दिया। 2 अप्रैल 2011 भारतीय क्रिकेट इतिहास का एक स्वर्णिम दिन बन गया, जब 28 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद भारत ने एक बार फिर विश्व कप पर अपना नाम अंकित किया।

