| यह लेख ईरान-इजराइल युद्ध के संदर्भ में इस्लामिक देशों के बंटवारे, ईरान के आंतरिक विरोधाभास और भारतीय मुसलमानों की प्रतिक्रिया के सामाजिक-सांस्कृतिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है। साथ ही कट्टरपंथी इस्लाम के अतिरेक से सावधान भी करता है। |
ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव और युद्ध केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं है बल्कि यह एक ऐसा भू-राजनीतिक भूचाल है जिसके झटके पूरे इस्लामिक जगत और उससे परे भारत जैसे देशों में महसूस किए जा रहे हैं। यह संकट इस्लामी दुनिया के भीतर उपस्थित गहरे साम्प्रदायिक विभाजन (शिया-सुन्नी), विभिन्न देशों की राष्ट्रीय अस्मिता की चेतना और धर्म की राजनीतिक व्याख्या (इस्लामिक क्रांति) के व्यावहारिक परिणामों को एक साथ सामने लाता है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रियाएं, विशेष रूप से जब वे घरेलू अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा पर मौन रहकर अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक मुद्दों पर भावुक हो जाते हैं, एक जटिल मानसिकता और पहचान के संकट को उजागर करती हैं।
ईरान-इजराइल युद्ध: इस्लामी एकता का मिथक
ईरान और इजराइल के बीच सीधे टकराव ने इस्लामी दुनिया के भीतर की दरार को और गहरा कर दिया है। सैद्धांतिक रूप से फिलिस्तीन का मुद्दा इस्लामिक देशों को एकजुट करने वाला रहा है, किंतु वास्तविकता यह है कि यह एकता केवल दिखावे तक सीमित है। ईरान के विरुद्ध किसी भी बड़े इजराइली हमले पर सुन्नी बहुल देशों (जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र) की प्रतिक्रिया बेहद सतर्क और संतुलित रही। इसका कारण ईरान द्वारा फैलाई जा रही शिया क्रांति का संकट और क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई है।
अब्राहम एकॉर्ड्स के अंतर्गत इजराइल के साथ सामान्यीकरण की ओर बढ़ रहे सुन्नी देश ईरान को इजराइल से बड़ा संकट मानते हैं। उनके लिए ईरान का परमाणु कार्यक्रम और उसके प्रॉक्सी (हिज़्बुल्लाह, हूती) उनकी आंतरिक सुरक्षा के लिए अधिक बड़ा संकट हैं।
इसलिए युद्ध के समय में इस्लामिक देश शिया-सुन्नी गुटों में बंट गए हैं। ईरान और उसके सहयोगी (सीरिया, इराक के कुछ हिस्से) एक ओर हैं, जबकि खाड़ी देश और पश्चिम एशिया के अधिकांश सुन्नी देश या तो तटस्थ हैं या परोक्ष रूप से इजराइल-अमेरिकी गठबंधन का लाभ उठाने का प्रयास कर रहे हैं। पाकिस्तान जैसे देश, जो स्वयं सुन्नी-शिया हिंसा से ग्रस्त हैं, के लिए यह स्थिति और भी पेचीदा है। उसे अपनी सुन्नी पहचान और ईरान से सटी सीमा तथा शिया जनसंख्या के दबाव के बीच संतुलन बनाना होगा।
ईरान का विरोधाभास: प्रगतिशील समाज बनाम क्रांतिकारी राज्य
ईरान का समाज अपने आप में एक गहरे विरोधाभास से जूझ रहा है। एक ओर ईरान की सड़कों पर, विशेषकर तेहरान जैसे शहरों में एक प्रगतिशील, शिक्षित और जागरूक युवा वर्ग है, जो महिलाओं के अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक खुलापन चाहता है। ’महसा अमिनी’ के बाद शुरू हुए ’महिला, जीवन, स्वतंत्रता’ आंदोलन ने दिखा दिया कि ईरान का युवा इस्लामिक क्रांति की कठोरता से कितना ऊब चुका है। ईरानी महिलाएं, जो इस्लामिक गणराज्य की सख्त हिजाब नीतियों के विरुद्ध लगातार विरोध प्रदर्शन करती रहीं, यह सिद्ध करती हैं कि शासन की विचारधारा और जनता की आकांक्षाओं में जमीन-आसमान का अंतर है।

वास्तविकता यह है कि यही वह ईरान है जो इस्लामिक क्रांति के नाम पर क्षेत्र में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। यहां पर एक बड़ा सबक छिपा है: जब इस्लाम का एक कट्टरपंथी (अतिरेकी) स्वरूप राज्य की संरचना पर हावी हो जाता है तो वह समाज के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को चरमरा देता है। ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सामाजिक दमन ने जनता को राज्य से अलग कर दिया है।
यह स्थिति पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों के लिए एक सबक है, जहां मजहबी कट्टरता के नाम पर राजनीति ने अलगाववाद, आर्थिक बर्बादी और साम्प्रदायिक हिंसा को जन्म दिया है। इस्लामिक क्रांति का यह आत्मघाती मॉडल, जो अंतरराष्ट्रीय अलगाव और आंतरिक असंतोष पर टिका है, किसी भी राष्ट्र के लिए दीर्घकालिक विकास का मार्ग नहीं हो सकता।
भारतीय मुसलमानों की दोहरी मानसिकता: एक पहचान का संकट
उपरोक्त वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत में एक विचित्र स्थिति देखने को मिलती है। जहां ईरान का प्रगतिशील समाज और महिलाएं स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही हैं, वहीं भारत के कुछ मुस्लिम वर्ग ईरान पर किसी भी हमले पर छाती कूटने लगते हैं। यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक प्रश्न खड़ा करती है कि आखिर भारतीय मुसलमानों की वफादारी कहां है?
यह दोहरा मापदंड और भी स्पष्ट हो जाता है जब हम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं पर प्रतिक्रियाओं की तुलना करते हैं।

जम्मू-कश्मीर में पहलगाम हमले या बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले हमलों के समय, जहां अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर अत्याचार हो रहे थे, वहां भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग की ओर से या तो मौन रखा गया, उदासीनता देखी गई या कहीं-कहीं तो अस्वाभाविक खुशी भी देखी गई, परंतु जैसे ही कोई इस्लामिक देश (ईरान, फिलिस्तीन, या तुर्की) पर संकट आता है, वही लोग सड़कों पर उतर आते हैं, प्रदर्शन करते हैं और भावनात्मक रूप से बह जाते हैं।
यह स्थिति भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग के ’पहचान संकट’ को दर्शाती है। उनके पूर्वज हिंदू थे, उनकी संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन और भाषा भारतीय है, फिर भी उनकी भावनात्मक और वैचारिक निष्ठा प्राय: अरब, ईरान या पाकिस्तान से जुड़ी हुई प्रतीत होती है। यह मानसिकता कि उनकी धार्मिक पहचान उनकी राष्ट्रीय पहचान से अधिक सशक्त है, उन्हें एक ऐसी ’उम्मा’ (वैश्विक इस्लामी समुदाय) से जोड़ती है, जो वास्तविकता में शिया-सुन्नी संघर्षों, जातीय विभाजनों और राष्ट्रीय स्वार्थों में बंटी हुई है। पाकिस्तान में शिया-सुन्नी दंगे इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि इस्लामी एकता महज एक राजनीतिक नारा है, वास्तविकता नहीं।
आत्मचिंतन और भविष्य का मार्ग
ईरान-इजराइल युद्ध ने एक बार फिर इस्लामिक दुनिया के धार्मिक उन्माद और राजनीतिक यथार्थ के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। यह युद्ध पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित अन्य इस्लामिक देशों के लिए एक सबक है कि धर्म के नाम पर कट्टरता और साम्प्रदायिकता देश की प्रगति का असली शत्रु है।
ईरान का उदाहरण बताता है कि यदि ’इस्लामिक क्रांति’ का अतिरेक जारी रहा, तो अंततः वह अपने ही नागरिकों के लिए जेल बन जाती है, जहां से स्वतंत्रता की मांग लगातार उठती रहती है।
भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में रहने वाले मुसलमानों के लिए यह आत्मचिंतन का समय है। उन्हें यह समझना होगा कि ईरान की महिलाएं जिस स्वतंत्रता के लिए लड़ रही हैं, वही स्वतंत्रता भारतीय संविधान उन्हें पहले से ही देता है। बांग्लादेश या पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों पर मौन रहना और हजारों मील दूर किसी इस्लामिक देश पर संकट पर विलाप करना, निकटदृष्टिता और दोहरे चरित्र को दर्शाता है।
उनकी वास्तविक लड़ाई अरब या ईरान की नहीं बल्कि भारत में सामाजिक-आर्थिक न्याय, शिक्षा और समान अधिकारों की होनी चाहिए। उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि उनकी असली विरासत अरब या तुर्क नहीं बल्कि भारत की समृद्ध, सहिष्णु और विविधतापूर्ण सभ्यता है। इस वास्तविकता को स्वीकार किए बिना, वह न तो भारत में पूरी तरह समाहित हो सकते हैं और न ही वैश्विक इस्लामी राजनीति के उतार-चढ़ाव से स्वयं को मुक्त कर सकते हैं।
– मुकेश गुप्ता
