अमेरिका, ईरान, इज़राइल युद्ध के बारे में विश्व जनमत का यदि कोई सर्वेक्षण करे, तो उसका एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि यह युद्ध तुरंत रोका जाना चाहिए। एक सामान्य इंसान, चाहे वह किसी भी देश का हो, किसी भी धर्म का हो, वह युद्ध नहीं चाहता, लेकिन विडंबना यह है कि सामान्य लोगों की संख्या सबसे अधिक होने के बाद भी सामान्य इंसान के पास युद्ध रोकने की शक्ति नहीं होती। इसलिए हम जैसे सामान्य लोग युद्ध के परिणाम भोगते रहते हैं।

दुनिया में युद्ध नहीं, शांति चाहिए, इसलिए 1945 में यू.एन.ओ. यानी संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। सन् 1939 से 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध का कालखंड था। इस महायुद्ध में यूरोप के कई देश झुलस गए। लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। संपत्ति का कितना नुकसान हुआ, इसकी गणना करना भी मुश्किल है। 1945 में अमेरिका ने जापान पर दो परमाणु बम गिराए और उसके बाद युद्ध समाप्त हुआ।
दुनिया तीसरे विश्व युद्ध का अनुभव न ले, इसलिए अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि देशों की पहल पर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। इसका मुख्यालय न्यूयॉर्क में है। इस संयुक्त राष्ट्र संघ के 192 देश सदस्य हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ का एक संविधान है, जिसे ‘चार्टर’ कहते हैं। इस चार्टर यानी संविधान में 111 अनुच्छेद हैं और चार्टर की एक प्रस्तावना भी है।

यह प्रस्तावना कहती है, “हम संयुक्त राष्ट्र के लोग निश्चय करते हैं कि….” आगे यह कहा गया है कि:
• आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की भयावहता से बचाना है।
• इससे पहले दो बार (प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध) भयंकर युद्ध का अनुभव हमने लिया है। इन महायुद्धों ने अपार दुख पैदा किए हैं।
• मानव अधिकारों के प्रति अत्यंत आस्था रखते हुए, व्यक्ति की प्रतिष्ठा और मूल्य तथा स्त्री और पुरुष को समान अधिकार तथा सभी राष्ट्रों को समान अधिकार हम स्वीकार करते हैं।
• अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार विभिन्न देशों के बीच जो संधियाँ होती हैं, उनके माध्यम से न्याय और उत्तरदायित्व का पालन करेंगे।
• यह हासिल करने के लिए सहिष्णुता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को अपनाएंगे।
• अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करेंगे।
• आपसी संघर्षों को सुलझाने के लिए सेना का उपयोग नहीं किया जाएगा।
• साथ ही सभी लोगों की आर्थिक और सामाजिक उन्नति के लिए अंतरराष्ट्रीय कार्यप्रणाली बनाई जाएगी।
(यह प्रस्तावना का भावानुवाद है।)
इस प्रस्तावना के आदर्शों पर यदि दृष्टिपात किया जाए तो किसी का भी यही मत होगा कि कितने उदात्त आदर्श रखकर संयुक्त राष्ट्र संघ का निर्माण किया गया है, लेकिन दुर्भाग्य से यह उदात्त आदर्श केवल लिखित चार्टर में ही रह गया है। मानव जाति का इतिहास यही बताता है कि उदात्त मूल्य सभी को पता होते हैं और विसंगति यह है कि उनके अनुसार कोई आचरण नहीं करता।
यू.एन.ओ. की आज क्या स्थिति है? कई साल पहले गोपुरी के सांड की कहानी सुनी थी, यह कहानी सच है। आश्रम के निदेशक ने गायों की अच्छी नस्ल के लिए अच्छे पैसे देकर एक सांड खरीदा था। एक-दो साल में उन्होंने देखा कि सांड बहुत दमदार है, शक्तिशाली है, सब कुछ है, लेकिन इसमें बछड़ों को जन्म देने की शक्ति नहीं है। पंचतंत्र की एक कहानी का श्लोक भी ऐसा ही है। शेर के बच्चे के संग पले लोमड़ी के बच्चे से शेरनी कहती है, तुम दिखने में अच्छे हो, विद्वान हो, लेकिन तुम्हारे जिस कुल में जन्म हुआ है, उसमें कोई हाथी का शिकार नहीं करता। आज का यू.एन.ओ. ऐसा ही है, दांत और नाखून रहित शेर की तरह। रूप आदर पैदा करने वाला, लेकिन शक्ति शून्य।
यू.एन.ओ. को अमेरिका, इज़राइल, ईरान का युद्ध रोकना चाहिए, क्योंकि युद्ध रोकने के लिए ही उसका जन्म हुआ है। चार्टर की प्रस्तावना में भी यही कहा गया है। ईरान, अमेरिका, इज़राइल का युद्ध तो छोड़िए, इसके पूर्व यू.एन.ओ. 1967 का अरब-इज़राइल युद्ध भी नहीं रोक सका। अमेरिका-इराक युद्ध नहीं रोक सका। अमेरिका-वियतनाम युद्ध नहीं रोक सका। रूस-यूक्रेन युद्ध नहीं रोक सका। भारत-पाकिस्तान युद्ध भी नहीं रोक सका। जिस कारण के लिए यू.एन.ओ. बनाया गया, वह कारण ही वह भूल गई है या उस कारण को लागू करने की शक्ति उसमें नहीं है, यह सच है।
यू.एन.ओ. के अत्यंत महत्वपूर्ण 6 अंग हैं, उनमें से 2 सदन हैं – 1) जनरल असेंबली (आम सभा) और 2) सिक्योरिटी काउंसिल (सुरक्षा परिषद)। इस सुरक्षा परिषद में 5 स्थायी सदस्य हैं: ब्रिटेन, अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन। आम सभा सभी सदस्य राष्ट्रों की है। इस सभा में विश्व परिस्थिति पर चर्चा होती है, प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। विश्व नेता अपनी यात्राओं में यहाँ आकर भाषण देते हैं। हमारे देश के पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, नरेंद्र मोदी आदि प्रधानमंत्रियों के भाषण आम सभा में हुए हैं।
आम सभा द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव अलमारियों में पड़े रह जाते हैं। उन्हें लागू करने की शक्ति आम सभा के पास नहीं है। यानी ये ऐसे प्रस्ताव होते हैं जैसे कोई शैक्षणिक संस्था या वकीलों की संस्था अपनी सभा में पारित कर सकती है, जिससे प्रसिद्धि मिलेगी, लेकिन क्रियान्वयन शून्य। आम सभा में विभिन्न राष्ट्रों के प्रमुख जो भाषण देते हैं, वे विषय और आशय की दृष्टि से गहन होते हैं, लेकिन उनका मूल्य प्रवचन से अधिक नहीं होता। उनमें से कुछ भी व्यवहार में नहीं आता।
सुरक्षा परिषद के कुछ अन्य सदस्य भी हैं, लेकिन 5 स्थायी सदस्यों को नकारात्मक अधिकार (वीटो पावर) प्राप्त है। इस नकारात्मक अधिकार का उपयोग करके ये 5 महाशक्तियाँ आम सभा के प्रस्तावों को अर्थहीन कर देती हैं। उदाहरण के लिए, रूस ने यूक्रेन के क्रीमिया पर आक्रमण करके कब्जा कर लिया। यू.एन.ओ. ने प्रस्ताव पारित किया, रूस ने वीटो का उपयोग करके उसे अस्वीकार कर दिया। फिलिस्तीन मुद्दे पर प्रस्ताव आया, अमेरिका ने वीटो का उपयोग करके उसे अस्वीकार कर दिया। पिछले 80 साल में ये केवल दो उदाहरण नहीं हैं, उनकी संख्या 100 से अधिक हो जाएगी। इसका क्या अर्थ हुआ?
इसका अर्थ है कि सुरक्षा परिषद महाशक्तियों के राजनीतिक डावपेचों का अड्डा बन गई है। प्रत्येक महाशक्ति अपने भू-राजनीतिक हितों को आँखों में तेल डालकर बचाती है। यदि कोई प्रस्ताव किसी महाशक्ति के हितों को बाधा पहुँचाने वाला होता है, तो वीटो का उपयोग किया जाता है। सुरक्षा परिषद ने पिछले 80 साल में जितने भी युद्ध हुए, उन्हें रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाए हैं। प्रत्येक युद्ध में कोई न कोई महाशक्ति शामिल होती है और वे इतने निर्दयी होते हैं कि उसमें यू.एन.ओ. के महासचिव को भी अपनी जान गंवानी पड़ती है।
डैग हैमरर्स्क्जोंल्ड (Dag Hammarskjöld) संयुक्त राष्ट्र के दूसरे महासचिव थे। सन् 1953 से 1961 तक उनका कार्यकाल था। मरणोपरांत नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं। उनके काल में कांगो का युद्ध चल रहा था। कांगो में प्रचुर मात्रा में तांबा और यूरेनियम है, जिस पर सभी महाशक्तियों की नज़र थी। इस गृहयुद्ध को समाप्त करने के लिए तब कांगो में यू.एन.ओ. ने शांति सेना भेजी, जिसमें भारतीय सेना भी थी। अंतिम चरण में मुद्दा सुलझाने के लिए डैग हैमरर्स्क्जोंल्ड हवाई जहाज से जा रहे थे। उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया (अर्थात विमान को गिरा दिया गया), जिसमें उनके साथ अन्य 15 लोग मारे गए। यह विमान किसने गिराया? केजीबी ने या सीआईए ने? इस पर इंटरनेट पर सिर चकरा देने वाली जानकारी है।

डैग हैमरर्स्क्जोंल्ड की हत्या क्यों की गई? क्योंकि वे महाशक्तियों को अप्रिय लगने लगे थे। यही बात कोफी अन्नान के बारे में भी है। वे भी कर्तव्यनिष्ठ महासचिव थे। उन्हें भी शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। 80 साल के कालखंड में जो अन्य महासचिव हुए हैं, वे कुछ खास नहीं कर सके। पिछले 8-10 साल से वर्तमान महासचिव कौन हैं, यह रोजाना अखबार पढ़ने वाले को भी पता नहीं होगा, इतना उनका कौशल अद्भुत है। उनका नाम है एंटोनियो गुटेरेस (António Guterres)। क्या उनके पास अमेरिका, ईरान, इज़राइल का युद्ध रोकने की शक्ति है?
यू.एन.ओ. एक शक्तिहीन संगठन है। आर्थिक दृष्टि से वह स्वतंत्र नहीं है। कुल खर्च का 22% हिस्सा अमेरिका उठाता है, अन्य सदस्य देश अपना योगदान देते हैं। 40 से अधिक ऐसे देश हैं जिनका भारी बकाया है। मराठी में एक कहावत है- ज्याची खावी पोळी त्याची वाजवावी टाळी (जिसकी रोटी खाओ, उसकी तारीफ करो) वाली कहावत है। अमेरिका के खिलाफ रुख अपनाया तो स्टाफ की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी।

सन् 1782 में ब्रिटिशों (अंग्रेजों) ने अमेरिका छोड़ा। स्वतंत्रता संग्राम के बाद 13 राज्य एक साथ आए। उन्होंने एक संघ बनाया, जिसे ‘कॉन्फेडेरेसी’ कहते हैं। यह संघ एक शक्तिहीन संघ था। उसके पास सेना नहीं थी, कर लगाने की शक्ति नहीं थी, कानून लागू करने की शक्ति नहीं थी। अमेरिका की चिंता करने वालों को यह खतरनाक लगा और उन्होंने 1789 में अपना संविधान बनाकर शक्तिशाली अमेरिका का निर्माण किया।
संयुक्त राष्ट्र संघ अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पा रहा है, इसलिए नई संरचना की आवश्यकता है। विश्व शांति, विश्व पर्यावरण के मुद्दे, विश्व गरीबी, विश्व पेयजल के मुद्दे, विश्व स्वास्थ्य के मुद्दे- ऐसे मानव जाति के असंख्य प्रश्न हैं। कोई भी एक देश ये प्रश्न हल नहीं कर सकता। सबको मिलकर ‘सर्वजनहिताय’ कुछ नीतियाँ निर्धारित करना आवश्यक है। एक शक्तिशाली मंच का निर्माण करना आवश्यक है। ऐसा मंच जिसके पास प्रस्तावों को लागू करने की शक्ति हो और जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो, यह समय की आवश्यकता है।
भारत के वैश्विक लक्ष्य को देखते हुए, भारत को दुनिया के समान विचारधारा वाले राष्ट्र नेताओं, धार्मिक नेताओं, सामाजिक नेताओं, वैश्विक विचारकों, अर्थशास्त्रियों, मानवतावादियों, वैज्ञानिकों- ऐसे सभी का एक संघ बनाना चाहिए। मनुष्य जाति की यात्रा खानाबदोश जीवन से शुरू हुई और मोड़ लेते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ तक पहुँची, अब उससे भी आगे जाने का समय आ गया है, क्योंकि यदि मनुष्य जाति द्वारा बनाए गए उपकरण में ही अपूर्णता है, तो उससे बेहतर उपकरण बनाने में ही समझदारी है। इसलिए वर्तमान और आने वाली पीढ़ी को पहल करनी चाहिए।
– रमेश पतंगे

