| डॉ. मोहनजी भागवत ने अपने प्रेरणादाई उद्बोधनों से संघ के भविष्य की दिशा स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ का उद्देश्य समाज के हर वर्ग को जोड़ते हुए एक समरस, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है। संघ के स्वयंसेवकों के प्रयासों से यह लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा। |
संघ की स्थापना को 100 वर्ष पूरे हो गए हैं और इस दौरान संघ ने समाज के प्रबुद्ध लोगों के साथ बातचीत के लिए कुछ व्याख्यानमाला कार्यक्रमों का आयोजन किया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने पिछले एक वर्ष के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित इन कार्यक्रमों में कई महत्वपूर्ण विचार रखे। इन उद्बोधनों में जहां समाज के प्रबुद्ध लोगों के साथ राष्ट्र निर्माण, सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पहचान, परिवार व्यवस्था, युवाओं की भूमिका और विकसित भारत जैसे विषयों पर बातचीत हुई। जिसका सार यह है कि भारत का भविष्य समाज की एकता, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक मूल्यों की मजबूती पर निर्भर करता है।
मुंबई में आयोजित व्याख्यानमाला (2026) में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर खुलकर अपने विचार रखे, जिसमें उन्होंने कहा कि संघ में किसी भी जाति का व्यक्ति सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है और ब्राह्मण होना कोई विशेष योग्यता नहीं है। उन्होंने साफ किया कि संघ सभी वर्गों के लिए काम करता है। यानी कई बार जातियों को लेकर जो टिप्पणी संघ पर होती है, उन्होंने उसको लेकर अपना स्टैंड साफ कर दिया। इसी कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि संघ स्वयंसेवकों के सहयोग से चलता है और यात्रा के दौरान संघ के अधिकारी कार्यकर्ता स्वयंसेवकों के घर रुकते हैं, यानी संगठन का मॉडल समाज आधारित है। भारत की पहचान ‘हिंदू’ अवधारणा है, यहीं भारत में विविधता के बाद भी एक साझा पहचान है, हम उसे हिंदू कहते हैं। हम लोग एक दूसरे के हैं, हम सौदे के हिसाब से नहीं चलते, आप मेरे अपने हो तो मैं आपका भला ही करुंगा, यही भारत है। हमारा एक सनातन स्वभाव है। कई परम्पराएं, भाषाएं और रीति-रिवाज होने के बाद भी एकता सम्भव है। पूरे देश में विचरण करते हुए हमारे ॠषियों ने सभी को दीक्षित किया और समाज को सभी तरह की बातें सिखाने की बात करते रहे। भारत ‘विश्व गुरु’ कैसे बनेगा, भारत भाषण से नहीं, उदाहरण से विश्व गुरु बनेगा।
जयपुर में उद्मियों के साथ बातचीत
पू. सरसंघचालक डॉ. मोहनजी भागवत ने संघ शताब्दी वर्ष के अवसर पर ‘100 वर्ष की संघ यात्रा श्रृंखला’ के अंतर्गत कॉन्स्टीट्यूशन क्लब, जयपुर के पृथ्वीराज चौहान सभागार में ‘उद्यमी संवाद-नए क्षितिज की ओर’ कार्यक्रम में राजस्थान के प्रमुख उद्यमियों को भी सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि संघ को प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना संघ के बारे में राय मत बनाइए। संघ से जुड़ने के लिए शाखा में आइए, जो आपको अनुकूल लगे वह काम आप कर सकते हैं। संघ पूरे समाज को ही संगठित करना चाहता है। पूरा समाज संघ बन जाए यानी प्रमाणिकता से, निःस्वार्थ बुद्धि से सब लोग देश के लिए जिएं।
राष्ट्र को विश्वगुरू बनाने के लिए सबका साथ आवश्यक
उन्होंने कहा कि संघ के 100 वर्ष की यात्रा पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम कोई सेलिब्रेशन नहीं है बल्कि आगे के चरण की दृष्टि से अपने कार्य की वृद्धि का विचार करने के लिए कार्यक्रम किए जा रहे हैं। राष्ट्र को परम वैभव सम्पन्न और विश्वगुरु बनाना किसी एक व्यक्ति के वश में नहीं है। यह सबका काम है और इसके लिए सबको साथ लेकर चलना है।

संघ स्थापना की यात्रा
पू. सरसंघचालकजी ने कहा कि संघ की स्थापना किसी एक विषय को लेकर नहीं हुई। संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारी थे। वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के बहुत सक्रिय कार्यकर्ता थे। उसके आंदोलनों में संघ स्थापना के पहले और एक बार स्थापना के बाद, दो बार जेल गए। जो देश हित और समाज हित में चल रहा था, उसमें वह सक्रिय रहे। आंदोलन में उन पर राजद्रोह का अभियोग लगा। उन्होंने बचाव में स्वयं अपना पक्ष रखना चुना क्योंकि इससे दोबारा बोलने का मौका मिला। उनके बचाव भाषण को सुनकर जज को कहना पड़ा कि उनका बचाव वक्तव्य पहले भाषण से भी अधिक राजद्रोही है। डॉ. हेडगेवार ने अनुभव किया कि समाज में डेढ़ हजार वर्ष से जो दुर्गुण आ रहे थे, उन्हें दूर करना आवश्यक है। उन्हें महसूस हुआ कि सम्पूर्ण हिंदू समाज को संगठित किए बिना भारत इस पुरानी बीमारी से मुक्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने एक दशक तक विचार और प्रयोगों के बाद संघ की स्थापना की।
हमारी पहचान है हिंदू
पू. सरसंघचालकजी ने कहा कि संघ किसी को नष्ट करने के लिए नहीं बना है। भारत वर्ष में हमारी पहचान हिंदू है। हिंदू शब्द सबको एक करने वाला है। हमारा राष्ट्र संस्कृति के आधार पर एक है, न कि राज्य के आधार पर। पुराने समय में जब राज्य अनेक थे तब भी हम एक देश थे, पराधीन थे तब भी एक देश थे। उन्होंने कहा कि समाज की स्वस्थ अवस्था का नाम समाज का संगठन है। संघ व्यक्ति निर्माण का काम करता है। संघ स्वयंसेवक तैयार करता है, स्वयंसेवक बाकी सब काम करते हैं।
सारा समाज देश हित में जिए
उन्होंने संघ कार्य के आगामी चरण के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि सारा समाज देश हित में जिए, ये संघ का आगे का काम है। समाज की सज्जन शक्ति जागृत हो, सामाजिक समरसता का वातावरण बने और मंदिर, पानी, शमशान सबके लिए खुले होने चाहिए। परिवार के सभी सदस्य सप्ताह में कम से कम एक बार एकत्र आएं और अपना भोजन एवं भजन, अपनी भाषा और अपनी परम्परा के अनुसार करें। पानी बचाने, पेड़ लगाने और प्लास्टिक हटाने जैसे पर्यावरण संरक्षण के कार्यों के लिए भी हमें आगे आना चाहिए। स्व का बोध और स्वदेशी का भाव सबके मन में जागृत हो, देश स्वनिर्भर बने। नागरिक कर्तव्य और नागरिक अनुशासन के प्रति हम सजग बनें और नियम, कानून, संविधान का पालन करें। सारा समाज एक बनकर अपना-अपना काम अपनी-अपनी पद्धति से करे ताकि हम सभी एक दूसरे के बाधक नहीं बल्कि पूरक बनें।

असम में 100 वर्ष की यात्रा पर सम्बोधन
डॉ. मोहनजी भागवत ने असम की राजधानी गुवाहाटी में संगठन की विचारधारा, समाज के प्रति दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण भाषण माना जा रहा है। इस अवसर पर उन्होंने संघ की शताब्दी यात्रा को केवल एक संगठनात्मक उपलब्धि नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की निरंतर साधना बताया। उन्होंने कहा कि संघ ने अपने 100 वर्षों के दौरान कभी भी सत्ता को लक्ष्य नहीं बनाया बल्कि समाज को संगठित करने को प्राथमिकता दी। उनके अनुसार संघ का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण है। यह यात्रा त्याग, अनुशासन और निरंतर सेवा की भावना से प्रेरित रही है। संघ का कार्य किसी एक वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूरे समाज को साथ लेकर चलने का प्रयास करता है। यही कारण है कि आज संघ देश के हर कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है।
उत्तर-पूर्व भारत, विशेष रूप से असम की अहमियत को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकता का प्रतीक है। यहां की विभिन्न जनजातियां, भाषाएं, परम्पराएं और जीवन शैली भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती हैं। लम्बे समय तक उत्तर-पूर्व को मुख्यधारा से अलग समझा गया, पर संघ ने इस दूरी को कम करने का प्रयास किया है। संघ के स्वयंसेवक इस क्षेत्र में शिक्षा, सेवा और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहे हैं।
समरसता और सामाजिक एकता पर जोर
डॉ. मोहनजी भागवत के उद्बोधनों का एक प्रमुख केंद्र बिंदु सामाजिक समरसता रहा। उन्होंने कहा कि जाति, भाषा, क्षेत्र और पंथ के आधार पर समाज में विभाजन पैदा करना राष्ट्र की प्रगति में बाधा बनता है। इन संकीर्णताओं से ऊपर उठकर एकजुट समाज के निर्माण का आह्वान किया। भारत की पहचान उसकी विविधता में एकता है। इस विविधता को स्वीकार करते हुए ही हम एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं। उन्होंने हर नागरिक को यह जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित किया कि वह समाज में एकता और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दे।
युवाओं के लिए संदेश
डॉ. मोहनजी भागवत ने अपने उद्बोधन में युवाओं को विशेष रूप से सम्बोधित किया। उन्होंने कहा कि देश का भविष्य युवाओं के हाथ में है और उन्हें अपने कर्तव्यों को समझते हुए समाज और राष्ट्र के लिए काम करना चाहिए। युवा आत्मनिर्भरता, अनुशासन और सेवा भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। केवल व्यक्तिगत सफलता ही पर्याप्त नहीं है बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी निभाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वे अपने कार्यों के माध्यम से देश को आगे बढ़ाने में योगदान दें।
आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की परिकल्पना
डॉ. भागवत ने आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा पर भी जोर दिया और कहा कि एक मजबूत राष्ट्र वही होता है जो अपने संसाधनों, संस्कृति और समाज पर विश्वास करता है। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है बल्कि यह मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी आवश्यक है। जब समाज संगठित और समरस होगा, तभी देश सशक्त बन सकेगा। संघ का लक्ष्य इसी दिशा में कार्य करना है।
– दीपक उपाध्याय
