हमारे मस्तिष्क में एक बहुत छोटा सा हिस्सा होता है जिसे हाइपोथैलेमस कहा जाता है। यही हिस्सा यह देखता रहता है कि शरीर में ऊर्जा ठीक मात्रा में है या नहीं। जब रक्त में ग्लूकोज़ कम होने लगता है, तो हाइपोथैलेमस को संकेत मिलता है कि अब शरीर को दोबारा ऊर्जा की ज़रूरत है।
हाइपोथैलेमस के दो मुख्य हिस्से माने जाते हैं: लैटरल हाइपोथैलेमस और वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस। लैटरल हाइपोथैलेमस भूख की भावना बढ़ाने में मदद करता है और लैटरल हाइपोथैलेमस तृप्ति यानी पेट भरने का संदेश देता है।

जब इन दोनों के संदेश संतुलित होते हैं, तो हम न ज़्यादा खाते हैं, न बहुत कम। तनाव, नींद की कमी और हार्मोन में गड़बड़ी यह संतुलन बिगाड़ सकती है, जिससे कोई बहुत ज़्यादा खाने लगता है या किसी को भूख ही नहीं लगती।
घ्रेलिन और लेप्टिन भूख और तृप्ति से जुड़े दो मुख्य हार्मोन हैं।
घ्रेलिन (हंगर हार्मोन) ज़्यादातर पेट की दीवार से निकलता है। जब पेट खाली होता है या शरीर को ऊर्जा चाहिए होती है, तो घ्रेलिन बढ़ता है और हाइपोथैलेमस तक यह संदेश भेजता है कि “अब खाने का समय है।”
लेप्टिन (तृप्ति हार्मोन) वसा कोशिकाओं (फ़ैट सेल्स) से निकलता है और दिमाग को बताता है कि शरीर में पर्याप्त ऊर्जा जमा है। साधारण तौर पर खाना खाने के बाद घ्रेलिन कम हो जाता है और लेप्टिन का असर बढ़ता है, जिससे भूख शांत हो जाती है।
जब शरीर लेप्टिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाता है, तो इसे लेप्टिन रेज़िस्टेंस कहा जाता है। इसमें फ़ैट पहले से ज़्यादा होने पर भी दिमाग को यह ठीक से पता नहीं चल पाता कि ऊर्जा पर्याप्त है और व्यक्ति को बार बार भूख लग सकती है; यह मोटापे और ओवरईटिंग से जुड़ा पाया गया है।
हमारे शरीर का लगभग हर अंग ग्लूकोज़ को मुख्य ऊर्जा स्रोत की तरह इस्तेमाल करता है। जब ब्लड ग्लूकोज़ गिरता है, तो दिमाग शरीर को संकेत देता है कि अब ऊर्जा फिर से भरनी है, इसलिए भूख की भावना बढ़ जाती है।
इंसुलिन और ग्लूकागन, ये दो हार्मोन इस संतुलन से सीधा जुड़े हैं। इंसुलिन ग्लूकोज़ को कोशिकाओं के भीतर ले जाकर उसे ऊर्जा की तरह इस्तेमाल या स्टोर होने में मदद करता है। जब ब्लड ग्लूकोज़ कम होने लगता है, तो ग्लूकागन हार्मोन लीवर से जमा ग्लूकोज़ को बाहर निकालकर रक्त में भेजने में मदद करता है। इंसुलिन और ग्लूकागन के बीच यह नाज़ुक संतुलन ही हमें लगातार ऊर्जा देता है और भूख तृप्ति को प्रभावित करता है।
भूख हमेशा पेट से नहीं आती, कई बार यह भावनाओं से भी पैदा होती है। जब हम उदास, परेशान या अकेला महसूस करते हैं, तो दिमाग में डोपामिन और सेरोटोनिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर बदलने लगता है। इसी वजह से तनाव में या मूड खराब होने पर बहुत से लोग मीठा या ज़्यादा कार्बोहाइड्रेट वाला खाना खाने की तरफ़ खिंचते हैं। इसे इमोशनल हंगर कहा जा सकता है; ऐसी भूख जिसमें असली कमी ऊर्जा की नहीं बल्कि भावनात्मक संतुष्टि की होती है। यह असली शारीरिक भूख से अलग होती है, क्योंकि इसमें अक्सर पेट भरा होने पर भी मन ख़ासकर “कम्फ़र्ट फ़ूड” की तरफ आकर्षित होता है।
आज की जीवनशैली ( लाइफ़स्टाइल) में हम अक्सर समय देखकर खाते हैं — जैसे “अब लंच टाइम है, कुछ खा लेते हैं।” यह घड़ी की भूख या क्लॉक हंगर कही जा सकती है, जिसमें हम शरीर की मांग से ज़्यादा, समय और आदत के हिसाब से खाते हैं। इसके उलट असली भूख (ट्रू हंगर) वे शारीरिक संकेत हैं जो बताते हैं कि शरीर को सच में ऊर्जा की ज़रूरत है, जैसे पेट में हल्का खालीपन या हल्की कसाव की भावना, ध्यान में कमी या हल्की चिड़चिड़ाहट या शरीर में हल्की थकान सी लगना। अपने शरीर के इन संकेतों को पहचान पाना और समझ पाना भोजन के प्रति समझदार व्यवहार का हिस्सा है।
खाने का दिखना, उसकी खुशबू और स्वाद भी भूख को तुरंत जगा सकते हैं। दिमाग का लिम्बिक सिस्टम, जो भावनाओं से जुड़ा होता है और ओल्फ़ैक्टरी बल्ब, जो सूंघने से जुड़े संकेत संभालता है, आपस में गहराई से जुड़े हैं।
इसीलिए ताज़ा बेक्ड ब्रेड या मसालों की तेज़ खुशबू पेट भरा होने पर भी खाने का मन करा सकती है। भोजन का रंग और उसकी सजावट भी भूख पर असर डालते हैं। लाल रंग को अक्सर भूख बढ़ाने वाला माना जाता है, इसलिए बहुत से रेस्टोरेंट और फ़ूड ब्रांड अपने बोर्ड और इंटीरियर में लाल रंग का उपयोग करते हैं।

इंसान का शरीर समय समय पर भोजन की कमी को झेलने के लिए बना है। जब हम लंबे समय के लिए नहीं खाते, जैसे इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग या नियमित उपवास में, तो ब्लड ग्लूकोज़ कम हो जाता है और इंसुलिन का स्तर घटता है।
ऐसी स्थिति में लीवर फ़ैट से कीटोन बॉडीज बनाना शुरू करता है, जो दिमाग और शरीर के लिए एक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत बन जाती हैं।
लंबे या दोहराए गए उपवास की अवस्थाओं में शरीर में ऑटोफ़ैजी जैसी प्रक्रियाएँ सक्रिय हो सकती हैं, जिसमें कोशिकाएँ अपने अंदर की खराब या अनावश्यक चीज़ों की सफ़ाई और मरम्मत करती हैं। रिसर्च से यह भी दिखा है कि कुछ तरह के इंटरमिटेंट फ़ास्टिंग पैटर्न इंसुलिन सेंसिटिविटी को सुधार सकते हैं, यानी शरीर इंसुलिन को ज़्यादा अच्छे से पहचानने और इस्तेमाल करने लगता है।
अगर हम बहुत पुरानी इंसानी इतिहास की तरफ़ देखें, तो अधिकांश समय इंसान को भोजन पाने के लिए मेहनत और संघर्ष करना पड़ता था। तब शरीर के लिए ऊर्जा बचाना और अतिरिक्त ऊर्जा को फ़ैट के रूप में स्टोर करना ज़रूरी था,
ताकि भविष्य की कमी के समय काम आए। घ्रेलिन जैसे हार्मोन तब जीवन बचाने में मददगार थे, क्योंकि वे भूख बढ़ाकर इंसान को भोजन ढूँढने के लिए प्रेरित करते थे। आज के दौर में, जहां अधिकांश लोगों के आसपास खाना आसानी से उपलब्ध है, यही प्रणाली कई बार ज़्यादा खाने और अतिरिक्त वजन को बढ़ावा दे देती है।
आज साइंस ऐसी दवाओं और तकनीकों पर काम कर रही है जो भूख को और बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकें। इन में एक अहम समूह है जी एल पी वन (GLP 1) रिसेप्टर एगोनिस्ट दवाएँ, जिन्हें डायबिटीज़ और मोटापे के इलाज में इस्तेमाल किया जा रहा है।
ये दवाएं अधोलिखित तरीक़ों से काम करती पाई गई हैं:
1. पेट से खाना आंतों में जाने की गति को धीमा कर देती हैं, जिससे देर तक पेट भरा महसूस होता है।
2. दिमाग के ऐपेटाइट सेंटर्स पर असर डालकर भूख और स्नैकिंग की इच्छा को कम करती हैं।
3. इंसुलिन स्राव को सुधारती हैं और ब्लड ग्लूकोज़ कंट्रोल में भी मदद करती हैं।
इसके साथ साथ शोधकर्ता दिमाग के उन सर्किट्स का भी अध्ययन कर रहे हैं जो “अब खाओ” और “अब बस, पेट भर गया” जैसे संकेतों को नियंत्रित करते हैं।
दरअसल, “भूख” केवल एक साधारण शारीरिक अवस्था नहीं, बल्कि कई परतों वाला अनुभव है जिसमें शरीर का विज्ञान, मनोविज्ञान और समाज-संस्कृति, तीनों की भूमिका होती है। जब हम अपने शरीर के संकेत, अपनी भावनाओं और अपनी आदतों, तीनों को समझकर खाना चुनते हैं, तो खाना केवल पेट भरने का साधन नहीं रहता, बल्कि सचेत और संतुलित जीवन जीने की एक कला बन जाता है।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा

