| आयु के आठवें दशक में भी उनकी सक्रियता आश्चर्यचकित करती थी। वे निरंतर लेखन, चिंतन और विमर्श में सक्रिय रहे। अनेक व्हाट्सएप समूहों पर वे न केवल अपने लेख साझा करते थे, बल्कि दूसरों के लेखों और टिप्पणियों को भी ध्यानपूर्वक पढ़कर उन पर सारगर्भित प्रतिक्रिया देते थे। कभी-कभी वे अन्य महत्त्वपूर्ण लेख साझा कर सभी को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। |
प्रख्यात चिंतक, लेखक, स्तंभकार और पूर्व राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज नहीं रहे। मस्तिष्क इसे मान भी ले तो हृदय मानने को तैयार नहीं होता। क्या लिखा जाए, कैसे लिखा जाए, कहाँ से शुरुआत की जाए और कहाँ समाप्त, यह तय कर पाना अत्यंत कठिन हो रहा है। कभी-कभी किसी विराट व्यक्तित्व के जाने से ऐसी रिक्तता उत्पन्न होती है, जिसे भर पाना कदाचित संभव नहीं होता; बलबीर पुंज जी का जाना ऐसी ही रिक्तता का बोध कराता है।
वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जो सदैव लिखने-पढ़ने वाले लोगों को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहते थे। राष्ट्रीय धारा के लेखकों, स्तंभकारों और पत्रकारों के किसी अच्छे लेख पर वे अपनी टिप्पणी देते, उसे पढ़ने के लिए अपने परिचितों के साथ साझा करते और प्रायः स्वयं फोन कर लेखक को बताते कि उसके लेख में क्या खूबियाँ हैं, कहाँ सुधार की आवश्यकता है, तथा विषय को और गहराई से समझने के लिए किन-किन लेखकों को पढ़ना चाहिए। यह वास्तव में एक दुर्लभ गुण था, विशेषतः ऐसे व्यक्ति में – जो स्वयं एक स्थापित चिंतक, दो बार राज्यसभा सदस्य, भाजपा के बौद्धिक रणनीतिकारों में प्रमुख और संगठन के उच्च पदों पर रहा हो। उनकी सादगी, सहजता, सर्वसुलभता और निरहंकारिता केवल प्रभावित ही नहीं करती थी, बल्कि कई बार अविश्वसनीय भी लगती थी। यदि कोई लेखक, पत्रकार या स्तंभकार स्वास्थ्य संबंधी या अन्य किसी समस्या से गुजर रहा हो, तो वे उसका कुशल-क्षेम लेना कभी नहीं भूलते थे। संपर्क-सूत्र उपलब्ध न होने पर भी वे किसी परिचित से उसका नंबर लेकर उससे संवाद स्थापित करते और उसके दुःख-दर्द में सहभागी बनते। आज के समय में, जब संबंधों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है, ऐसी आत्मीयता अत्यंत दुर्लभ है।
आयु के आठवें दशक में भी उनकी सक्रियता आश्चर्यचकित करती थी। वे निरंतर लेखन, चिंतन और विमर्श में सक्रिय रहे। अनेक व्हाट्सएप समूहों पर वे न केवल अपने लेख साझा करते थे, बल्कि दूसरों के लेखों और टिप्पणियों को भी ध्यानपूर्वक पढ़कर उन पर सारगर्भित प्रतिक्रिया देते थे। कभी-कभी वे अन्य महत्त्वपूर्ण लेख साझा कर सभी को उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। अपने देहावसान से तीन-चार दिन पूर्व तक उनका लेखन जारी रहा, यह उनकी साधना और प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनके लिए लेखन केवल विचारों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि एक साधना थी। वे कहा करते थे कि यदि “राम जी” ने लेखनी का सामर्थ्य दिया है, तो उसका उपयोग देश, धर्म और संस्कृति के लिए होना चाहिए। इसी में जीवन की धन्यता और सार्थकता है। वे लेखकों, पत्रकारों और संपादकों को यह प्रेरणा देते थे कि वे लेखन को ही अपना सबसे सशक्त उपकरण बनाएं। कार्यक्रमों और आयोजनों की अपेक्षा लेखन अधिक स्थायी प्रभाव छोड़ता है। सधी हुई लेखनी ही समय के शिलालेख पर अपनी अमिट छाप छोड़ती है। इस संदर्भ में वे सीताराम गोयल, राम स्वरूप और धर्मपाल जैसे चिंतकों से प्रेरणा लेने की बात करते थे। उनका कहना था कि उनके जाने के बाद दुनिया ने उनकी लेखनी के तत्त्व व महत्त्व को समझा।
किसी भी विषय पर उनकी समझ अत्यंत गहरी और व्यापक थी। वे केवल घटनाओं की सतह पर नहीं रुकते थे, बल्कि उनके मूल तक जाकर विश्लेषण करते थे। भारतीय विमर्श (नैरेटिव्स) की उनकी समझ विलक्षण थी। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित उनकी पुस्तक “नैरेटिव्स का मायाजाल” इस संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनके लेखों में लिजलिजी-पिलपिली भावुकता के लिए कोई स्थान नहीं होता था; वे तर्कों को स्पष्टता और तथ्यों को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते थे। यही कारण था कि उनके विचारों का खंडन करना उनके विरोधियों के लिए भी सहज नहीं होता था।
उन्होंने भारतीय सभ्यता, सनातन संस्कृति और उसके इतिहास का गहन अध्ययन किया था। साथ ही उन्होंने अब्राहमिक सभ्यताओं का भी सूक्ष्म विश्लेषण किया था। इस कारण वे वैश्विक स्तर पर चल रहे सभ्यतागत संघर्ष का यथार्थ चित्र प्रस्तुत कर पाते थे। वे हिंदुत्व की उदारता, बहुलता और सह-अस्तित्व की भावना को पहचानते थे, परंतु इसके समक्ष उपस्थित वर्तमान और संभावित संकटों के प्रति भी उतने ही सजग थे। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से समाज को बार-बार इन चुनौतियों व संभावित संकटों के प्रति सचेत किया। वे मानते थे कि खंडित समाज किसी भी वैचारिक या सामाजिक चुनौती का सामना नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने संगठित समाज के महत्त्व को जीवनभर रेखांकित किया। वे जानते थे कि वामी-जिहादी-यूरोपंथी गठजोड़ के समक्ष असंगठित हिंदू-समाज टिक नहीं सकता। अतः उन्होंने अपना लेखकीय-जीवन समाज को संगठित करने की आवश्यकता समझाने में समर्पित किया।

व्यक्तिगत बातचीत में वे संगठनात्मक सुधार के बिंदुओं का उल्लेख अवश्य करते थे, परंतु सार्वजनिक रूप से उन्होंने सदैव संगठन की मर्यादा को सर्वोपरि रखा। वे इस बात के प्रति सजग थे कि किसी भी बड़े ध्येय की प्राप्ति के लिए ध्येयनिष्ठा, अनुशासन और व्यक्तिगत आकांक्षाओं का त्याग आवश्यक होता है। वे संघ विचारों के निकट थे और स्वयंसेवकों को साधक के रूप में देखते थे। उनका विश्वास था कि स्वयंसेवकों की साधना से ही समाज में अनुकूल परिवर्तन संभव हुआ है और राष्ट्र, धर्म व संस्कृति के प्रति गौरव-बोध जागृत हुआ है। फिर भी वे इस बात से चिंतित थे कि बौद्धिक और शैक्षिक क्षेत्रों में वामपंथ का प्रभाव अब भी बना हुआ है। उनका मानना था कि 2014 के बाद राजनीतिक और हिंदी मीडिया जगत में परिवर्तन अवश्य आया है, परंतु अंग्रेजी मीडिया, शैक्षिक संस्थानों व सत्ता-प्रतिष्ठानों में वैचारिक असंतुलन अभी भी विद्यमान है। वहाँ अभी भी वामपंथ व औपनिवेशिक मानसिकता हावी है। वे बार-बार कहते थे कि इक्कीसवीं सदी की मुख्य लड़ाई ‘नैरेटिव्स’ के स्तर पर ही लड़ी जाएगी, जो इस लड़ाई को जीतेगा, वही अंततः समाज की दिशा तय करेगा। इसलिए वे युवाओं और कार्यकर्ताओं को पढ़ने-लिखने की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे।
जनसंख्या के बदलते स्वरूप और उसके सामाजिक प्रभावों को लेकर भी वे अत्यंत गंभीर थे। इस विषय पर वे एक विस्तृत पुस्तक लिख रहे थे और इसके लिए उन्होंने सैकड़ों ग्रंथों का अध्ययन किया था। उनका चिंतन वायवीय नहीं, बल्कि यथार्थपरक और तथ्याधारित होता था। भारत के विभाजन की पीड़ा उनके लेखन और चिंतन में बार-बार प्रकट होती थी। वे इस बात से व्यथित थे कि समाज उस ऐतिहासिक एवं पीड़ादायक अनुभव एवं त्रासदी से अपेक्षित शिक्षाएँ नहीं ले पाया है। वे कहते थे कि यदि समाज अपने अतीत से सबक नहीं लेगा, तो भविष्य में भी वही गलतियाँ दोहराएगा। बदलती जनसंख्या संरचना, मतांतरण, घुसपैठ और जनसंख्या के आनुपातिक असंतुलन को वे गंभीर समस्या मानते थे और समाज को इसके प्रति जागरूक रहने का आग्रह करते थे। उनके अनुसार, आत्ममुग्धता या वास्तविकता से विमुख होना समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। इसलिए वे चाहते थे कि हिंदू-समाज सद्गुण-विकृति का शिकार न हो, बल्कि उससे यथाशीघ्र मुक्त हो।
आज जब बलबीर पुंज जी हमारे बीच नहीं हैं, तब यह अनुभूति और भी तीव्र हो उठती है कि राष्ट्र ने एक सजग, निर्भीक, सत्यदर्शी एवं राष्ट्रनिष्ठ वैचारिक प्रहरी खो दिया है। उनका जीवन हमें यह स्मरण कराता रहेगा कि ध्येय के प्रति अटूट निष्ठा और धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सच्ची सार्थकता प्रदान करते हैं। जिस दौर में हिंदुत्व, राष्ट्रीय विचारों और सनातन संस्कृति के अनुकूल लेखन करना सहज स्वीकार्य नहीं था, उस दौर में भी उन्होंने ध्येयनिष्ठा का मार्ग चुना, राष्ट्र का पक्ष चुना और जीवन-पर्यंत उसी पर अडिग रहे। निःसंदेह, उनकी स्मृतियाँ और उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों को ध्येयनिष्ठा, साहस और राष्ट्रनिष्ठ चिंतन की प्रेरणा देता रहेगा।

