माता सीता के जीवन और उनके जीवन में घटी घटनाओं को हजारों वर्ष बीत गये हैं, लेकिन भारतीय जनमानस की स्मृति में वे आज भी जीवन्त हैं। उनका व्यक्तित्व त्याग, तपस्यामय जीवन, संकल्पशीलता, दायित्वबोध, कुटुम्ब समन्वय, पर्यावरण संरक्षण, संस्कारित संतान का निर्माण, सतत ज्ञानार्जन, श्रमशीलता के साथ समय एवं परिस्थिति के अनुरूप उचित निर्णय लेने का अद्भुत संदेश है, जो आज भी प्रासंगिक प्रासंगिक है।
महर्षि बाल्मीकि द्वारा रचित “रामायण” को यदि “सीतायण” कहा जाय तो अनुचित न होगा। इस ग्रंथ में सर्वाधिक विस्तार सीताजी के व्यापक व्यक्तित्व पर ही है। ऐसी विलक्षण व्यक्ति की धनी माता सीता का अवतरण वैशाख माह शुक्लपक्ष नवमी को माना जाता है, जो इस वर्ष 24 अप्रैल को आ रही है।
भारतीय वाड्मय में रामायण काल के घटनाक्रम पर सर्वाधिक ग्रथों की रचना हुई है।

हर कालखंड में और हर भाषा में हुई है। सभी रचनाकारों ने माता सीता के व्यक्तित्व को मर्यादा के पालन, कर्त्तव्यनिष्ठता, श्रम और ज्ञान की साधना के साथ त्यागमयी जीवनशैली की पराकाष्ठा माना है। पौराणिक संदर्भ में उन्हें माता लक्ष्मी का अवतार माना है। यदि अवधारणना को हटा दिया जाय तब भी उनका सांसारिक जीवन की शैली उच्चता की पराकाष्ठा है, जो उन्हें पूज्य स्थान पर प्रतिष्ठित करती है।
बाबा तुलसी ने रामचरितमानस की रचना मंगलाचरण में विभिन्न देवों की वंदना के साथ आरंभ की है। मंगलाचरण का पाँचवाँ श्लोक माता सीता की वंदना के लिये है-
उद्भवस्थित संहारकारिणी क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करी सीतां नतोऽम् रामवल्लभात्।।
अर्थात:- उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार करने वाली, समस्त क्लेश दूर करने वाली और सब प्रकार से श्रेष्ठ कार्य करने वाली भगवान श्रीराम की प्रिय माता सीता को मैं नमन् करता हूँ। इस श्लोक उपयोग किये शब्दों में माता सीता का संपूर्ण विराट व्यक्तित्व समाया है। श्लोक की उपमाएँ में उनके लौकिक और अलौकिक दोनों स्वरूप का संकेत करती है। उनके अलौकिक स्वरूप को बाबा तुलसी ने बालकाँड में सत्रहवें दोहे के बाद चौथी चौपाई में और स्पष्ट किया है
“जनकसुता जगजननि जानकी…
जासु कृपा निरमल मति पावउँ”।
यदि हम माता सीता के जीवन की घटनाओं और उनके अनुरूप स्वयं को ढालकर चलने की शैली को समझें तो हर युग में प्रत्येक नारी की मार्गदर्शक हैं। वे बल और बुद्धि की निधान हैं। उन्होंने बालपन में शारीरिक साधना के साथ धनुष बाण चलाने का अभ्यास भी किया होगा, तभी तो महर्षि बाल्मीकि आश्रम में अपने पुत्र लव और कुश को धनुष बाण चलाने की प्रारंभिक शिक्षा उन्हीं ने दी थी। उनमें शारीरिक बल और सामर्थ्य इतना था कि जिस शिव धनुष को अच्छे अच्छे बलवान राजा नहीं उठा पाये, उन्होंने उसे उठाकर रख दिया था।
आत्मबल इतना कि बलशाली रावण के सामने भी नहीं घबराई। रावण ने उनका छलपूर्वक अपहरण किया था। असुर शक्तियों के बीच लंका में उन्होंने एक लंबा समय बिताया। माता सीता को अपने अपहरण और रामजी से बिछड़ने की वेदना तो रही, लेकिन मन में भय का भाव कभी नहीं आया। रावण की धमकियों और मारने के लिये तलवार निकालने के बाद भी वे किंचित भयभीत नहीं हुईं। यह शक्ति की साधना के बिना संभव नहीं था।

विपरीत परिस्थिति में भी सामान्य रहना और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालने का उनमें अद्भुत कौशल था। अपने वनवास काल, रावण के अपहरण और महर्षि बाल्मीकि आश्रम जाने की परिस्थितियाँ सामान्य नहीं थीं, लेकिन वे स्थिर रहीं। परिस्थिति के अनुरूप ही उनकी दिनचर्या रही। यह ज्ञान की साधना और उनकी उच्चतम मानसिक बौद्धिक क्षमता का संदेश है। उनकी जीवन शैली में यह स्पष्ट भी है कि जीवन के हर मोढ़ पर उन्होंने ज्ञानार्जन का अभ्यास कभी न छोड़ा।
पिता राजा जनक के यहाँ ऋषियों और विद्वानों का आवागमन सतत होता था। माता सीता उन अतिथि विद्वानों का सत्कार करतीं थीं और ज्ञानोपदेश भी सुनती थीं। वनवास काल में रामजी अनेक ऋषियों के आश्रम गये। प्रत्येक ऋषि सत्संग में माता सीता उनके साथ रहीं। ऐसा नहीं था माता सीता अपनी कूटिया में रहें और रामजी ऋषिजनों से मिलकर आ जायें। ऋषियों के प्रवचन सुनने के बाद माता सीता ऋषि माताओं से भी सत्संग करती थीं। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में देवी अनुसुइया से उनका संवाद इसका उदाहरण है।

परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को ढालने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। वे राजकुमारी थीं और राजरानी थीं, लेकिन वनवास काल में सहज जीवनचर्या, स्वयं भोजन बनाना, वनवासियों के बीच घुल मिलकर रहने का जो उदाहरण माता सीता ने प्रस्तुत किया है, ऐसा इतिहास अथवा किसी पौराणिक चरित्र में नहीं मिलता।
अयोध्या त्यागने के बाद महर्षि बाल्मीकि आश्रम में वे वर्षों रहीं, लेकिन किसी को आभास तक न हुआ कि वे जनक कुमारी और अयोध्या साम्राज्य की राजरानी हैं। गौसेवा करती थीं, जंगल में लकड़ी बीनने जाती थीं और स्वयं अपना भोजन तैयार करतीं थीं। संध्याकाल के प्रवचनों में भी नियमित रहतीं थीं। अपने वनवास काल में वे जिस प्रकार समूची वनवासी स्त्रियों के साथ और बाल्मीकि आश्रम में सभी से घुलमिल कर रहतीं थीं, यह सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण है। उनके व्यवहार से किसी को यह भान तक न हुआ कि वे राजरानी हैं। संतान होने के बाद अपने दोनों पुत्रों को भी प्रवचन में बैठातीं थीं। संतान को संस्कार देने के लिये प्रवचन, शास्त्र का ज्ञान, सत्संग आवश्यक होते हैं और साहसी बनाने के लिये शस्त्र शिक्षा आवश्यक होती है। इसीलिए माता सीता ने पहले दोनों पुत्रों को धनुषबाण चलाना स्वयं सिखाया, फिर महर्षि बाल्मीकि के पास भेजा।

शास्त्र और शस्त्र साधना के साथ संतान में श्रमशीलता भी होनी चाहिये। इसलिये वे जंगल में लकड़ी एकत्र करने के लिये दोनों पुत्रों को अपने साथ लेकर जातीं थीं। यहाँ वे केवल लकड़ी बीनने के लिये कहती थीं, पेड़ से शाखा तोड़ने को रोकती थीं। इसके साथ चलते समय छोटे-छोटे वन्यजीवों की सुरक्षा का भी ध्यान रखने की शिक्षा पुत्रों को देतीं थीं। यह संतान को संस्कारवान, साहसी और श्रमशील बनाने के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश है।
माता सीता की कार्यशैली समूचे कुटुम्ब के साथ समन्वय बनाकर चलने की रही है। अपनी इस विशेषता के कारण ही वे जनकपुरी में भी पूरे परिवार का केन्द्र रहीं और अयोध्या में भी सबकी प्रिय। पिता महाराज जनक का परिवार एक बड़े कुटुम्ब का स्वरूप था। माता सीता इस परिवार की ज्येष्ठ संतान थीं। उनकी कई बहने थीं। इनमें से तीन छोटी बहनें तो उनकी देवरानियाँ बनकर अयोध्या भी आईं। उन्होंने जनकपुरी में अपनी सभी छोटी बहनों को सदैव स्नेह दिया, इसका प्रतिसाद अयोध्या में देखने को मिलता है।
माता सीता के वनवास जाने पर उनकी बहनों को हुये दुख का वर्णन सभी रामायणों में है। सभी ने उन्हें अश्रुपूर्ण नेत्र से विदा किया था। अयोध्या के संपूर्ण परिवार में समन्वय बनाकर चलने का भी उन्होंने आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया। माता कैकयी के कारण उन्हें वन जाना पड़ा था, लेकिन उन्होंने माता कैकयी से कभी दुराव नहीं किया। सदैव आदर और सम्मान का व्यवहार किया।
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वनवास काल में अयोध्या का पूरा परिवार चित्रकूट आया, तब भी माता सीता ने माता कैकयी को उतना ही सम्मान किया जितना पहले करतीं थीं। माता सीता के व्यक्तित्व में पति के प्रति भी दायित्वबोध और कर्त्तव्य पालन की स्पष्ट झलक है। वनवास के लिये केवल रामजी को जाना था। सीताजी को तो सबने रोका था। वे चाहतीं तो अयोध्या में ही रह सकती थीं, अपने मायके जनकपुरी भी जा सकतीं थीं, लेकिन उन्होंने पति के साथ ही वन जाने का निर्णय लिया। पति जिस परिस्थिति में हो, अर्धांगिनी के रूप में पत्नि को भी रहना चाहिये। माता सीता ने यही उदाहरण प्रस्तुत किया।
आज देश में जो परिस्थितियाँ हैं, वे साधारण नहीं हैं। परिवार टूट रहे हैं कुटुम्ब बिखर रहे हैं, संतान में संस्कार घट रहे हैं, पर्यावरण का निरंतर ह्रास हो रहा है और कूटरचित विमर्श तैयार करके सामाजिक विद्वेष पैदा किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में माता सीता का अवतरण दिवस केवल उत्सव के रूप में हो अपितु आदर्श परिवार, समाज निर्माण के साथ पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता का संकल्प भी लाया जाना चाहिए।
– रमेश शर्मा

