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प. बंगाल विजय: देश की राजनीतिक दिशा करेगा तय

प. बंगाल विजय: देश की राजनीतिक दिशा करेगा तय

by अमोल पेडणेकर
in देश-विदेश, राजनीति, विशेष
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पश्चिम बंगाल का यह ऐतिहासिक विजय इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च होती है। जब जनता ठान लेती है, तो वह न केवल सरकार बदलती है, बल्कि राजनीति की दिशा भी बदल देती है। इसी कारण यह संकेत मिल रहा है कि पश्चिम बंगाल के इस चुनाव से राष्ट्रवाद की तरंगे संपूर्ण देश में उठनी शुरू हो सकती है।

पश्चिम बंगाल में यह आलेख लिखते समय तक 192 सीटों पर बीजेपी को बढ़त मिली है। विक्रमी जन आधार के साथ पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बना रही है। यह एक ऐतिहासिक और अद्भुत घटना है। संपूर्ण देश में राष्ट्रवाद की तरंगे निर्माण करने वाला यह विजय है। इस अद्भुत एवं ऐतिहासिक विजय का विश्लेषण करते समय पश्चिम बंगाल की राजनीति को समझना केवल चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे समाज की मानसिकता, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक अनुभवों जैसा है, जिसने समय-समय पर पश्चिम बंगाल के राजनीति में पैर जमाने वाले सत्ता को चुनौती दी है, उसे बदला है और फिर लंबे समय तक उसी सत्ता को स्वीकार भी किया है। यही विरोधाभास पश्चिम बंगाल की राजनीति को विशिष्ट बनाता है। एक ओर यह प्रदेश देश की राजनीति करते समय संसद भवन में प्रायः सत्ता विरोधी रुख के लिए जाना जाता है, वहीं दूसरी ओर राज्य स्तर पर लंबे समय तक एक ही दल या नेतृत्व को सत्ता में बनाए रखने का इतिहास भी रखता है।

इस बार के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने इस विरोधाभास को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। कई बरसों से पश्चिम बंगाल की सत्ता पर जमकर बैठे हुए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने भारतीय जनता पार्टी ने निर्णायक बढ़त लेकर विजय प्राप्त किया है। यह केवल सरकार बदलने की घटना नहीं होगी, बल्कि यह पश्चिम बंगाल की राजनीतिक सांस्कृतिक क्षेत्र में परिवर्तन का गहरा संकेत है।

इस चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता रही रिकॉर्ड तोड़ मतदान। 90 प्रतिशत से अधिक मतदान होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पश्चिम बंगाल में जनता केवल दर्शक नहीं रहना चाहती, बल्कि सक्रिय सामुहिक भागीदारी के माध्यम से भ्रष्ट एवं दमनकारी व्यवस्था को समाप्त करना चाहती थी। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहां चुनावी हिंसा, बूथ कब्जा और राजनीतिक दबाव की परंपरा रही है, वहां इस तरह का भारी मतदान होना, यही एक प्रकार से “डर पर लोकतंत्र की जीत” के रूप में देखा जा सकता है। लोग यह ठानकर घरों से निकले कि चाहे परिस्थितियां कैसी भी हों, मतदान अवश्य करेंगे। यह मतदान केवल संख्या नहीं है, बल्कि यह जनता के मन में ममता बनर्जी के तूणमूल कांग्रेस को लेकर जमा असंतोष, अपेक्षाओं और बदलाव की इच्छा का सामूहिक प्रदर्शन है।

2011 से 2026 तक लगातार 15 वर्ष सत्ता में रहने के कारण ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी का माहौल बनना स्वाभाविक था। प्रारंभ में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के वामपंथी शासन के खिलाफ जनआक्रोश को अपने पक्ष में संगठित किया था, लेकिन समय के साथ वही असंतोष अब उनकी सरकार के खिलाफ भी उभरने लगा। भ्रष्टाचार के आरोप, शारदा चिटफंड घोटाला, सिंडिकेट राज की शिकायतें, स्थानीय स्तर पर दलालों का वर्चस्व और भ्रष्ट कानून-व्यवस्था से जुड़े प्रश्न इन सभी ने जनता के मन में धीरे-धीरे असंतोष को जन्म दिया। इसके अलावा महिला सुरक्षा से जुड़े मुद्दे, संदेशखाली जैसे प्रकरण और अन्य घटनाओं ने भी ममता बनर्जी के सरकार की छवि को धूमिल किया। जनता को यह महसूस होने लगा कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस जो वामपंथी व्यवस्था बदलाव के नाम पर पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई थी, वह भी उसी भ्रष्ट, मुस्लिम तुष्टिकरण और दमनकारी रास्ते पर चल पड़ी है, जिस पर पहले की वामपंथी सरकार थीं।
West Bengal Lok Sabha Election Phase 2: Key constituencies and candidates
पश्चिम बंगाल के चुनाव में भद्रलोक बनाम सामाजिक राजनीति का मुद्दा बहुत चला था और चुनाव प्रचार में महसूस भी हुआ। पश्चिम बंगाल की सामाजिक संरचना में “भद्रलोक” का विशेष स्थान रहा है। यह शिक्षित, मध्यमवर्गीय, सांस्कृतिक रूप से सजग वर्ग है। लंबे समय तक राज्य की राजनीति और विचारधारा को दिशा देता रहा है। ममता बनर्जी ने जब सत्ता में प्रवेश किया, तो उन्होंने पारंपरिक भद्रलोक राजनीति के बाहर जाकर ग्रामीण, पिछड़े और हाशिए के वर्गों को जोड़कर अपनी ताकत बनाई, लेकिन इस चुनाव में स्थिति बदलती दिखाई दे रही थी। भाजपा ने एक ओर भद्रलोक वर्ग में अपनी पैठ बनाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर उसने व्यापक स्तर पर हिंदू पहचान के आधार पर सामाजिक समर्थन जुटाने की रणनीति अपनाई। इस प्रकार पश्चिम बंगाल में सामाजिक समीकरणों का पुनर्गठन होता हुआ दिखाई दिया- जहां वर्ग, जाति और पहचान की नई परतें राजनीति को प्रभावित करती रही।

पश्चिम बंगाल के इस चुनाव में हिंदुत्व एवं राष्ट्रीय पहचान की राजनीति का उदय दिखाई दिया है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार पूरी ताकत के साथ हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को पश्चिम बंगाल में स्थापित किया। यह मुद्दा अचानक नहीं उभरा बल्कि इसके पीछे कई कारण रहे हैं, जैसे मुस्लिम तुष्टीकरण, बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा और जनसंख्या संतुलन को लेकर चिंता यह और अन्य कई बातें इसके लिए जिम्मेदार है। पश्चिम बंगाल राज्य में लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी होने के कारण मुस्लिम वर्ग को खुश करने के लिए ममता बनर्जी की राजनीतिक नीतियां बनती रही। इस धारणा ने हिंदू मतदाताओं के बीच असुरक्षा और असंतुलन की भावना को जन्म दिया, जिसका राजनीतिक लाभ इस चुनाव में भाजपा को मिला है। इस कारण यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इस चुनाव में हिंदुत्व की पहचान ने चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई।

ममता बनर्जी ने भाजपा को “बाहरी पार्टी” के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया और बंगाली अस्मिता को केंद्र में रखकर चुनावी रणनीति बनाई, लेकिन इस बार मतदाताओं ने इस विमर्श को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। उन्होंने यह संकेत दिया कि केवल क्षेत्रीय पहचान के आधार पर निर्णय नहीं लिया जाएगा बल्कि शासन, विकास और सुरक्षा जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। यह भाजपा के लिए एक बड़ी उपलब्धि रही कि उसे सांस्कृतिक रूप से आंशिक स्वीकृति मिली, जबकि पहले उसे “हिंदी पट्टी की पार्टी” मानकर खारिज कर दिया जाता था।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों तक वामपंथियों का वर्चस्व रहा, लेकिन इस चुनाव में वामपंथ और कांग्रेस लगभग अप्रासंगिक हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि चुनाव सीधा तृणमूल कांग्रेस बनाम भारतीय जनता पार्टी के बीच का मुकाबला बन गया, विरोधी मतों का विभाजन समाप्त हो गया और अधिकांश एंटी-इनकंबेंसी वोट भाजपा के पक्ष में एकत्रित हो गए। यह परिवर्तन पश्चिम बंगाल की राजनीति को द्विपक्षीय राजनीति की दिशा में ले जाने का संकेत देता है।

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार भी हिंसा, लाठीचार्ज और अन्य घटनाओं ने लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़े किए। इसके बावजूद भारी संख्या में मतदान होना इस बात का संकेत है कि जनता अब भय के माहौल को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। यह एक सकारात्मक संकेत है कि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हो रही हैं और लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हो रहे हैं।

मतदाता सूची विवाद (SIR) और असंतोष

मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का मुद्दा इस चुनाव में एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभरा है। लाखों परिवार इससे प्रभावित हुए, जिससे व्यापक असंतोष पैदा हुआ। हालांकि यह असंतोष सभी दलों के खिलाफ था, लेकिन सत्ता विरोधी माहौल के कारण इसका लाभ मुख्य रूप से भाजपा को मिला।
बंगाल में SIR विवाद: 91 लाख वोटर नहीं डाल पाएंगे वोट, चुनावी सूची से नाम  गायब - The CSR Journal
“बदलाव और बदला” इन भावनाओं का संगम इस चुनाव की प्रक्रिया में महसूस हो रहे हैं। इस चुनाव में एक दिलचस्प पहलू यह रहा कि “बदलाव” और “बदला” दोनों भावनाएं साथ-साथ काम कर रही थीं। पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा किए गए इस बदलाव का अर्थ है बेहतर शासन, विकास और सुरक्षा की बढ़ती उम्मीदे। बदला का अर्थ था पिछले अनुभवों और शिकायतों का जवाब देना। इन दोनों भावनाओं के मिश्रण ने चुनाव को केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी अत्यंत तीव्र बना दिया था।

जनता यदि भ्रष्टाचारी, दमनकारी सरकार ममता बनर्जी सरकार को बदलकर पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक विजय के साथ सत्ता में लाती है, तो अब भारतीय जनता पार्टी के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं, बंगाली सांस्कृतिक अस्मिता को सम्मान देना, राजनीतिक हिंसा को नियंत्रित करना, विकास और रोजगार के वादों को पूरा करना, सामाजिक और धार्मिक संतुलन बनाए रखना, स्थानीय नेतृत्व को विकसित करना आदि। सत्ता प्राप्त करना एक उपलब्धि है, लेकिन उसे स्थायी बनाना उससे कहीं अधिक कठिन कार्य होता है।

पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल ममता बनर्जी की दमनकारी सरकार बदलने का अवसर नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीतिक चेतना में परिवर्तन का प्रतीक है। जनता ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि यह एक नए युग की शुरुआत है। वह अब केवल परंपरा या भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि शासन, विकास और सुरक्षा जैसे ठोस मुद्दों के आधार पर भी निर्णय लेना चाहती है।

भाजपा इस चुनाव में सफल हुई है, यह पश्चिम बंगाल में एक नई राजनीतिक धुरी के उदय का संकेत है- जहां वामपंथ की विरासत, क्षेत्रीय राजनीति और राष्ट्रीय विचारधारा के बीच एक नया संतुलन स्थापित होगा।

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Tags: #BengalElectionResults #WestBengalPolitics #Election2023 #BengalVotes #PoliticalAnalysis

अमोल पेडणेकर

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