भारत में इस समय जो वैचारिक संघर्ष चल रहा है, उसे केवल राजनीति, चुनाव या सोशल मीडिया की बहस समझना बहुत बड़ी भूल होगी। यह संघर्ष समाज की मानसिक संरचना बदलने का है। यह संघर्ष भारत को उसकी सभ्यतागत चेतना से काटने का है। पिछले कुछ वर्षों में “सामाजिक न्याय”, “प्रतिनिधित्व”, “बहुजन विमर्श”, “इक्विटी”, “डीईआई”, “विविधता”, “संरचनात्मक उत्पीड़न”, “ब्राह्मणवाद”, “सवर्ण प्रिविलेज” जैसी शब्दावली जिस तरह संस्थागत रूप से स्थापित की गई है, वह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं है। इसके पीछे एक लंबी वैचारिक परियोजना काम कर रही है, जिसकी जड़ें यूरोप के कल्चरल मार्क्सवाद, फ्रैंकफर्ट स्कूल, क्रिटिकल थ्योरी और बाद में विकसित हुई क्रिटिकल रेस थ्योरी में हैं। आज उसी मॉडल को भारत में “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” के रूप में लागू किया जा रहा है।
जब पारंपरिक मार्क्सवाद आर्थिक क्रांति कराने में असफल हो गया और मजदूर वर्ग कम्युनिस्ट क्रांति के लिए तैयार नहीं हुआ, तब पश्चिमी वामपंथ ने रणनीति बदली। 1923 में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट स्कूल से निकली “क्रिटिकल थ्योरी” ने कहा कि यदि समाज को बदलना है, तो उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, उसकी संस्कृति तोड़ो। धर्म तोड़ो, परिवार तोड़ो, परंपरा तोड़ो, इतिहास तोड़ो, समाज की सामूहिक स्मृति तोड़ो। यहीं से “कल्चरल मार्क्सवाद” पैदा हुआ।
इसके बाद 1970 के दशक में अमेरिका में “क्रिटिकल रेस थ्योरी” विकसित हुई। इसमें समाज को दो स्थायी वर्गों में बाँटा गया शोषक और शोषित। श्वेत जन्मजात अपराधी घोषित हुए और अश्वेत जन्मजात पीड़ित। व्यक्ति क्या है, उसका चरित्र क्या है, उसने जीवन में क्या कियाइसका कोई महत्व नहीं। उसकी पहचान केवल उसकी नस्ल से तय होगी। यदि वह श्वेत है, तो वह “प्रिविलेज्ड ओप्रेसर” है।
यही विचार आगे चलकर “वोकिज़्म”, “डीईआई” और “ब्लैक लाइव्स मैटर” जैसे आंदोलनों में दिखाई दिया। अमेरिका में विश्वविद्यालयों से लेकर मीडिया और कॉरपोरेट संस्थानों तक लोगों को अपराधबोध में धकेला गया। इतिहास को नस्लीय अपराधबोध के चश्मे से पढ़ाया गया। युवाओं को “सामाजिक न्याय एक्टिविस्ट” बनाया गया। परिणाम क्या हुआ? समाज और अधिक विभाजित हो गया।
अब यही मॉडल भारत में लागू किया जा रहा है।
यहाँ “व्हाइट” की जगह “सवर्ण” और “अनारक्षित हिन्दू” को खड़ा किया गया है। पश्चिम में “व्हाइट प्रिविलेज” था, भारत में “सवर्ण प्रिविलेज” बना दिया गया। वहाँ श्वेत जन्मजात शोषक थे, यहाँ “ब्राह्मण”, “वैश्य” और “अनारक्षित हिन्दू” जन्मजात अपराधी बनाए जा रहे हैं। दूसरी ओर एससी, एसटी और ओबीसी को स्थायी पीड़ित वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
यही “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” है।
इसका उद्देश्य सामाजिक सुधार नहीं है। इसका उद्देश्य हिन्दू समाज को स्थायी वर्ग संघर्ष में धकेलना है। समाज को यह समझाना कि तुम्हारी गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ापन और जीवन की हर समस्या का कारण “अनारक्षित हिन्दू” है। तुम्हारे साथ जो कुछ भी गलत हुआ, उसका जिम्मेदार “सवर्ण हिन्दू” है। यही पूरी राजनीति का आधार है।
पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम आने के बाद यह बात और स्पष्ट हो गई। भाजपा 294 में से 207 सीटें जीतती है और टीएमसी की ऐतिहासिक हार होती है। अगले ही दिन केंद्रीय सूचना मंत्रालय से जुड़े वरिष्ठ सूचना सलाहकार दिलीप मंडल लिखते हैं — West Bengal was last bastion of Muslim-Savarna Nehruvian coalition. Now done and dusted. Khatam. TATA. Bye-Bye. यह केवल एक एक्स पोस्ट नहीं थी । यह संदेश था कि अब हिन्दू समाज को “सवर्ण बनाम बहुजन” संघर्ष में बदलो। बंगाल की जीत को हिन्दू एकता मत बनने दो। इसे जातीय युद्ध बना दो।
जबकि वास्तविकता क्या थी?
बंगाल का चुनाव हिन्दुत्व, अवैध घुसपैठ, तुष्टिकरण, राष्ट्रीय सुरक्षा, हिन्दू पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व के प्रश्न पर लड़ा गया था। मतुआ समाज ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के कारण भाजपा का समर्थन किया। सीमावर्ती हिन्दुओं ने सुरक्षा के प्रश्न पर मतदान किया। बंगाल के हिन्दुओं ने पहली बार बड़े स्तर पर जाति से ऊपर उठकर मतदान किया।
आँकड़े स्पष्ट हैं।
2021 में भाजपा के पास 77 सीटें थीं—SC 29, ST 6 और UR 42।
2026 में भाजपा 207 सीटों तक पहुँची—SC 51, ST 16 और UR 140।
SC सीटों में लगभग 75 प्रतिशत वृद्धि हुई। ST सीटों में लगभग 166 प्रतिशत वृद्धि हुई। लेकिन UR सीटों में लगभग 233 प्रतिशत वृद्धि हुई। स्पष्ट है कि सबसे बड़ी बढ़त सामान्य सीटों में हुई। फिर भी नैरेटिव यह बनाया गया कि भाजपा केवल “दलित राजनीति” के कारण जीती।
क्यों?
क्योंकि यदि हिन्दू समाज की एकता स्वीकार कर ली गई, तो “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” की पूरी राजनीति ध्वस्त हो जाएगी।
यहाँ सबसे खतरनाक खेल “सामाजिक न्याय” के नाम पर खेला जाता है। जब कोई पूछता है कि आरक्षण का लाभ कुछ जातियों तक ही क्यों सीमित हो गया? हजारों जातियों को उसका लाभ क्यों नहीं मिला? आईएएस अधिकारियों के बच्चों को आरक्षण क्यों मिले? मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, करोड़पति नेताओं के बच्चे रिजर्व सीटों से चुनाव क्यों लड़ें? पीढ़ियों से लाभ उठा रहे परिवारों को लगातार आरक्षण क्यों मिलता रहे? तब तुरंत उत्तर आता है “आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, यह सामाजिक न्याय देने का माध्यम है।”
फिर तर्क दिया जाता है पाँच हजार वर्षों तक ब्राह्मणों ने पानी नहीं पीने दिया, इसलिए पाँच हजार वर्ष तक आरक्षण चलना चाहिए।”
यही “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” है।
अर्थात वर्तमान पीढ़ियों को अतीत के कथित अपराधों के लिए दोषी ठहराना। व्यक्ति क्या है, उसका जीवन कैसा है, उसका संघर्ष क्या है इसका कोई महत्व नहीं। यदि वह “अनारक्षित हिन्दू” है, तो वह स्वतः अपराधी है।
लेकिन भारतीय दर्शन इस विचार को कभी स्वीकार नहीं करता।
महर्षि वाल्मीकि की कथा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब वे डाकू रत्नाकर थे, तब नारद मुनि ने उनसे पूछा कि जिन पापों के लिए तुम यह सब कर रहे हो, क्या तुम्हारा परिवार उन पापों में सहभागी बनेगा? रत्नाकर को विश्वास था कि परिवार साथ देगा। लेकिन जब उन्होंने परिवार से पूछा, तो सबने मना कर दिया। सबने कहा — “भोजन में सहभागी हैं, पाप में नहीं।”
यही भारतीय दर्शन है। कर्म व्यक्ति का होता है, उसका फल भी वही भोगता है। पिता के पाप का दंड पुत्र को नहीं दिया जाता। परंतु आज “सामाजिक न्याय” के नाम पर यही किया जा रहा है। पाँच सौ वर्ष पहले किसने क्या किया, हजार वर्ष पहले किसने क्या किया—उसका अपराधबोध आज जन्मे व्यक्ति पर थोपा जा रहा है।
यह न्याय नहीं, वैचारिक प्रतिशोध है।
यही कारण है कि आज “अनारक्षित हिन्दू” को नया “मुस्लिम” बनाया जा रहा है। अर्थात ऐसा वर्ग, जिसे हर समस्या का कारण बताओ, जिसे सार्वजनिक रूप से अपराधबोध में रखो, जिसके विरुद्ध स्थायी राजनीतिक लामबंदी करो और जिसे “विलेन क्लास” बना दो।
सबसे दुखद बात यह है कि इस पूरी राजनीति में सबसे अधिक नुकसान गरीब एससी, एसटी और ओबीसी युवाओं का होता है। बड़े-बड़े वैचारिक नेता, एक्टिविस्ट, प्रोफेसर, एनजीओ संचालक और राजनीतिक ठेकेदार बड़े घरों में रहते हैं, वातानुकूलित सभागारों में “सामाजिक न्याय” पर भाषण देते हैं, विदेशी फंडिंग लेते हैं और सत्ता के गलियारों में घूमते हैं। लेकिन सड़क पर आग कौन लगाता है? हिंसा कौन करता है? जेल कौन जाता है? गरीब युवक।
उसे “क्रांति” के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। उसे “सामाजिक न्याय योद्धा” बनाया जाता है। उसकी पढ़ाई छूटती है, उसका भविष्य बर्बाद होता है, वह हिंसा और घृणा की राजनीति में फँस जाता है। लेकिन जिन लोगों ने उसे उकसाया होता है, उनका कुछ नहीं बिगड़ता।
इसीलिए इस देश में जब भी आरक्षण समीक्षा की बात होती है, सबसे पहले देश को आग के हवाले करने का प्रयास शुरू हो जाता है। क्योंकि यदि समीक्षा हुई, तो यह प्रश्न उठेगा कि आरक्षण का लाभ किन लोगों तक सीमित हो गया है। यह प्रश्न उठेगा कि हजारों जातियाँ आज भी लाभ से वंचित क्यों हैं। यह प्रश्न उठेगा कि पीढ़ियों से लाभ उठा रहे प्रभावशाली परिवारों को कब तक विशेषाधिकार मिलता रहेगा।
भारत में सरकारी नौकरियाँ कुल रोजगार का लगभग 3 प्रतिशत हैं। लेकिन उसी 3 प्रतिशत के लिए पूरे समाज को स्थायी जातीय संघर्ष में धकेल दिया गया। अब निजी क्षेत्र में आरक्षण की माँग हो रही है। कॉरपोरेट संस्थानों में “डीईआई” एजेंडा लाया जा रहा है। विश्वविद्यालयों में “वोक” संस्कृति विकसित की जा रही है। नई पीढ़ी को यह सिखाया जा रहा है कि समाज को व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि “शोषक” और “शोषित” वर्गों में देखो।
यही कल्चरल मार्क्सवाद का अंतिम लक्ष्य है।
समाज को इतना विभाजित कर दो कि वह अपने वास्तविक प्रश्न भूल जाए। अवैध घुसपैठ, जनसंख्या असंतुलन, इस्लामिक कट्टरता, औपनिवेशिक मानसिकता, शिक्षा का पतन, आर्थिक असमानता, सांस्कृतिक संकट इन सब पर चर्चा बंद हो जाए। लोग आपस में ही लड़ते रहें।
क्योंकि यदि वास्तव में इतिहास को न्याय के आधार पर देखने की शुरुआत हुई, तो पूरा वैचारिक ढाँचा बदल जाएगा। तब प्रश्न केवल “सवर्ण बनाम बहुजन” तक सीमित नहीं रहेंगे। तब समाज पूछेगा कि भारत की सबसे बड़ी सभ्यतागत, आर्थिक और सांस्कृतिक तबाही का कारण कौन था। तब यह भी पूछना पड़ेगा कि जिन आक्रमणों और औपनिवेशिक नीतियों ने करोड़ों लोगों को निर्धन, अशिक्षित और विस्थापित बनाया, उनके लिए “स्ट्रक्चरल जस्टिस” की माँग क्यों नहीं उठती।
यही कारण है कि जब इस्लामिक आक्रमणों, मंदिर विध्वंस, औपनिवेशिक लूट, कृत्रिम अकालों या अंग्रेजों द्वारा भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करने की बात की जाती है, तब तुरंत कहा जाता है“इतिहास की बातें क्यों करते हो?”, “भूतकाल में मत जाइए”, “उससे नफरत बढ़ेगी”, “आज विकास की बात होनी चाहिए”, “पुरानी बातें भूलकर आगे बढ़ना चाहिए।” कहा जाता है कि अतीत की घटनाओं को बार-बार उठाने से समाज में वैमनस्य पैदा होगा। यह भी कहा जाता है कि आज की पीढ़ियों को अतीत के आक्रमणों के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
लेकिन यही लोग जब “सामाजिक न्याय” और “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी” की बात करते हैं, तब अचानक पाँच हजार वर्षों का इतिहास याद आने लगता है। तब कहा जाता है कि “पाँच हजार वर्षों तक पानी नहीं पीने दिया गया”, “सदियों तक शोषण हुआ”, “हजारों वर्षों तक दमन हुआ”, “ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने अवसर नहीं दिए।” सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन दावों के समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाणों पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती है, फिर भी उन्हें निर्विवाद सत्य की तरह दोहराया जाता है।
यहीं इस पूरे विमर्श का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। एक ओर कहा जाता है कि इतिहास की बात करने से नफरत बढ़ती है, इसलिए इस्लामिक आक्रमणों या औपनिवेशिक अत्याचारों की चर्चा नहीं होनी चाहिए; दूसरी ओर पाँच हजार वर्षों के कथित सामाजिक उत्पीड़न को वर्तमान राजनीति, शिक्षा और नीतियों का आधार बनाया जाता है। यदि अतीत की घटनाओं के आधार पर वर्तमान समाज को अपराधबोध में नहीं धकेलना चाहिए, तो फिर यह सिद्धांत हर जगह समान रूप से लागू क्यों नहीं होता? और यदि ऐतिहासिक अन्यायों की चर्चा आवश्यक है, तो फिर भारत की सभ्यता पर हुए बाहरी आक्रमणों और औपनिवेशिक विनाश की चर्चा से परहेज़ क्यों?
विडम्बना यह है कि भारत में “सामाजिक न्याय” का सबसे ऊँचा स्वर उन्हीं विषयों पर सुनाई देता है, जहाँ हिन्दू समाज को कटघरे में खड़ा किया जा सके; लेकिन जैसे ही इस्लामिक आक्रमणों, औपनिवेशिक लूट, कृत्रिम अकालों, सांस्कृतिक विनाश और भारत की सभ्यतागत क्षति की बात आती है, वही पूरा विमर्श अचानक मौन हो जाता है।
लगभग एक हजार वर्षों तक भारत इस्लामिक आक्रमणों का सामना करता रहा। अरब आक्रमणों से लेकर तुर्क, अफगान और मुगल काल तक भारत केवल राजनीतिक पराधीनता का शिकार नहीं हुआ, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और धार्मिक संरचना पर भी संगठित प्रहार हुए। मंदिरों का विध्वंस केवल मजहबी कट्टरता नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक स्मृति और आत्मविश्वास को तोड़ने का माध्यम था। सोमनाथ से लेकर काशी और मथुरा तक हजारों मंदिर तोड़े गए। असंख्य लोगों की हत्या हुई, महिलाओं को दास बनाया गया, जबरन मतांतरण हुए। मध्यकालीन विवरणों और अनेक इतिहासकारों ने बड़े पैमाने पर दास व्यापार, धार्मिक उत्पीड़न और हिंसा का उल्लेख किया है। लेकिन आधुनिक “सामाजिक न्याय” विमर्श इन प्रश्नों को लगभग छूता तक नहीं।
इसी प्रकार अंग्रेजों का शासन केवल राजनीतिक उपनिवेशवाद नहीं था; वह आर्थिक, शैक्षिक और मानसिक दासता की सबसे बड़ी परियोजनाओं में से एक था। 18वीं शताब्दी तक भारत विश्व अर्थव्यवस्था का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा माना जाता था। भारतीय वस्त्र उद्योग, इस्पात, जहाज निर्माण, कृषि और स्थानीय व्यापारिक संरचनाएँ अत्यंत विकसित थीं। लेकिन अंग्रेजों की नीतियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को योजनाबद्ध तरीके से तोड़ा। भारतीय उद्योगों को समाप्त किया गया, कुटीर उद्योग तबाह हुए, किसानों पर असहनीय कर लगाए गए और भारत को केवल कच्चा माल आपूर्ति करने वाला उपनिवेश बना दिया गया। स्वतंत्रता के समय भारत की वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी घटकर लगभग 1-2 प्रतिशत रह गई थी।
दादाभाई नौरोजी ने “ड्रेन ऑफ वेल्थ” सिद्धांत के माध्यम से बताया था कि भारत की संपत्ति किस प्रकार व्यवस्थित रूप से ब्रिटेन भेजी जा रही थी। ब्रिटिश नीतियों के कारण भारत में बार-बार कृत्रिम अकाल उत्पन्न हुए। 1770 का बंगाल अकाल, 1876-78 का मद्रास अकाल और 1943 का बंगाल अकाल केवल प्राकृतिक आपदाएँ नहीं थे; वे औपनिवेशिक नीतियों की क्रूरता के परिणाम थे। लाखों लोग भूख से मरते रहे, जबकि अनाज का निर्यात जारी रहा। चर्चिल के समय बंगाल अकाल में लाखों लोग मर गए, परंतु ब्रिटिश शासन ने राहत देने के बजाय भारतीयों को ही दोषी ठहराया।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था का विनाश भी उतना ही गंभीर विषय है। धर्मपाल जैसे शोधकर्ताओं ने बताया कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत में गाँव-गाँव में स्थानीय शिक्षा संस्थाएँ थीं। लेकिन मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान परंपरा को “पिछड़ा” घोषित कर अंग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ सिद्ध किया। उद्देश्य केवल शिक्षा देना नहीं था; उद्देश्य ऐसी मानसिकता तैयार करना था जो भारतीय होकर भी मानसिक रूप से अंग्रेज बने।
लेकिन जब “सामाजिक न्याय” की चर्चा होती है, तब इन विषयों पर लगभग पूर्ण मौन दिखाई देता है। न इस्लामिक आक्रमणों पर “ऐतिहासिक न्याय” की माँग उठती है, न औपनिवेशिक लूट पर, न भारतीय सभ्यता के सांस्कृतिक विनाश पर। क्योंकि यदि भारतीय समाज ने यह समझना शुरू कर दिया कि उसने एक साथ मिलकर बाहरी आक्रमणों, औपनिवेशिक शोषण और सभ्यतागत संकटों का सामना किया था, तो “स्थायी शोषक बनाम स्थायी पीड़ित” का पूरा ढाँचा कमजोर पड़ जाएगा।
यही कारण है कि इतिहास का उपयोग सिद्धांत के रूप में नहीं, हथियार के रूप में किया जाता है। जहाँ हिन्दू समाज को अपराधबोध में धकेलना हो, वहाँ हजारों वर्षों की बातें याद रखी जाती हैं; लेकिन जहाँ भारतीय सभ्यता की साझा पीड़ा और बाहरी आक्रमणों का प्रश्न उठता है, वहाँ अचानक “भविष्य की ओर देखो” और “इतिहास छोड़ो” का उपदेश शुरू हो जाता है।
क्यों? क्योंकि उद्देश्य न्याय नहीं, हिन्दू समाज को भीतर से तोड़ना है।
आज स्थिति यह है कि हिन्दू समाज अपने वास्तविक प्रश्न भूलता जा रहा है। अवैध घुसपैठ, जनसंख्या असंतुलन, औपनिवेशिक मानसिकता, सांस्कृतिक सुरक्षा, शिक्षा और आर्थिक असमानता जैसे विषय पीछे धकेल दिए गए हैं। पूरा विमर्श जातीय संघर्ष में बदल दिया गया है।
कम्युनिस्ट और कल्चरल मार्क्सवादी हमेशा समस्याएँ गिनाते हैं, समाधान नहीं देते। क्योंकि समाधान आ गया तो संघर्ष समाप्त हो जाएगा और संघर्ष समाप्त हुआ तो उनकी राजनीति समाप्त हो जाएगी।
भारत के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस वैचारिक युद्ध को पहचाने। यदि समय रहते “क्रिटिकल कास्ट थ्योरी”, “वोकिज़्म” और कल्चरल मार्क्सवाद की इस परियोजना को नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में समाज का विखंडन और गहरा होगा। लोग अपने वास्तविक सभ्यतागत प्रश्नों पर चर्चा करने के बजाय आपस में लड़ते रहेंगे। और यही इस पूरी वैचारिक परियोजना का अंतिम उद्देश्य है।
-दीपक कुमार द्विवेदी
