विश्व अर्थव्यवस्था इन दिनों एक से अधिक मोर्चों पर संकट का सामना कर रही है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने ऊर्जा बाजारों को हिलाकर रख दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न संकट ने भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों से विदेशी मुद्रा बचाने, सोने की खरीद कम करने, अनावश्यक विदेश यात्राओं से बचने, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करने और स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की अपील की है। यह लेख होर्मुज संकट की गंभीरता, भारत पर उसके आर्थिक प्रभाव, बढ़ती महंगाई के दबाव और प्रधानमंत्री मोदी की अपील की प्रभावशीलता का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
होर्मुज संकट: भारत की ऊर्जा असुरक्षा का केंद्र
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी है। यह प्रतिदिन 20 मिलियन बैरल से अधिक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का परिवहन करता है, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत है। प्राकृतिक गैस के लिए भी यह मार्ग उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि कतर और यूएई मिलकर वैश्विक एलएनजी निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा प्रस्तुत करते हैं, जिसमें से अधिकांश होर्मुज से होकर गुजरता है।

भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर है क्योंकि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, जिसकी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता लगभग 88 प्रतिशत है। स्थिति और भी जटिल हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि भारत के एलएनजी आयात का लगभग 60 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 90 प्रतिशत तक होर्मुज से होकर आता है। कतर अकेले भारत की कुल एलएनजी आवश्यकताओं का लगभग 40 प्रतिशत पूर्ति करता है।
CRISIL रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभावी बंद होना “अब तक का सबसे बड़ा ऊर्जा झटका” है, जिसके कारण वैश्विक तेल और डेरिवेटिव उत्पादन में कम से कम 10 प्रतिशत की आपूर्ति हानि हुई है। क्रूड तेल की कीमतें मार्च के मध्य से 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं और अप्रैल में 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी प्रभाव
होर्मुज संकट का प्रभाव केवल ऊर्जा की कीमतों तक सीमित नहीं है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रभावित कर रहा है:
मुद्रास्फीति का दबाव: CRISIL के अनुसार वित्त वर्ष 2027 में खुदरा मुद्रास्फीति के औसतन 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2026 के 2 प्रतिशत से काफी अधिक है। उच्च ऊर्जा कीमतों का प्रभाव परिवहन लागत, खाद्य पदार्थों और अन्य वस्तुओं के दामों पर सीधा पड़ता है, जिससे आम नागरिक का जेब पर बोझ बढ़ जाता है।
चालू खाता घाटा (CAD): उच्च तेल आयात बिल के कारण भारत का चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2027 में GDP के 2.2 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2026 के अनुमानित 0.8 प्रतिशत से काफी अधिक है। यह स्थिति रुपये पर दबाव बनाती है और विदेशी मुद्रा भंडार को कम कर सकती है।

आर्थिक वृद्धि में मंदी: CRISIL को उम्मीद है कि वित्त वर्ष 2027 में भारत की वास्तविक GDP वृद्धि दर घटकर 6.6 प्रतिशत रह जाएगी, जो वित्त वर्ष 2026 के 7.6 प्रतिशत से कम है। उच्च कमोडिटी कीमतें, कमजोर वैश्विक मांग और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान इस मंदी के प्रमुख कारण हैं।
निर्यात पर प्रभाव: वैश्विक विकास दर में कमी का सीधा असर भारत के निर्यात पर पड़ रहा है। मार्च में (संघर्ष के बढ़ने के बाद पहला पूरा महीना) भारत के निर्यात में सालाना आधार पर 7.4 प्रतिशत की गिरावट आई। सऊदी अरब और यूएई को निर्यात में क्रमशः 45.7 प्रतिशत और 61.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
सरकार की तत्काल प्रतिक्रिया: पर्याप्त आपूर्ति और मूल्य स्थिरता
संकट के बावजूद भारत सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने में सराहनीय कार्य किया है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस सचिव नीरज मित्तल ने स्पष्ट किया है कि देश में पर्याप्त भंडार मौजूद हैं:
• कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का 60 दिनों का भंडार
• एलपीजी का 45 दिनों से अधिक का भंडार
“हमने पिछले 67 दिनों में होर्मुज जलडमरूमध्य से ऊर्जा जहाजों की सबसे अधिक संख्या में निकासी सुनिश्चित की है,” मित्तल ने बताया। सरकार ने घरेलू एलपीजी उत्पादन को 30,000 टन से बढ़ाकर 50,000 टन कर दिया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार ने देश में ईंधन राशनिंग लागू नहीं करने का निर्णय लिया है। पेट्रोल और डीजल के दाम स्थिर रखे गए हैं। मार्च 2026 में सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क लगभग 10 रुपये प्रति लीटर कम कर दिया था ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।
हालांकि यह मूल्य स्थिरता बिना लागत के नहीं आई है। डेली पायोनियर के एक विश्लेषण के अनुसार सरकार वास्तव में इस संकट की लागत को कोषागार द्वारा अवशोषित कर रही है। तेल विपणन कंपनियों के बैलेंस शीट पर दबाव बढ़ रहा है और अनदेखी (under-recoveries) बढ़ रही हैं। यह एक अस्थायी समाधान हो सकता है, लेकिन यदि संकट लंबा खिंचता है तो यह टिकाऊ नहीं है।
| प्रधानमंत्री मोदी की अपील: विदेशी मुद्रा बचाने की राष्ट्रीय पहल
इस चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता से सात प्रमुख अपीलें की हैं: |
एसबीआई के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के अनुसार, प्रधानमंत्री की यह अपील “राशनिंग नहीं, बल्कि सावधानी” है। उनका कहना है कि सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने को “अंतिम विकल्प” के रूप में देखती है।
क्या प्रधानमंत्री की अपील कारगर है?
प्रधानमंत्री मोदी की अपील की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करते समय कई पहलुओं पर विचार करना आवश्यक है:
मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक प्रभाव
इस प्रकार की राष्ट्रीय अपीलें नागरिकों में एक साझा जिम्मेदारी की भावना पैदा करती हैं। जब करोड़ों लोग छोटे-छोटे बदलाव करते हैं (जैसे कि लाइट बंद करना, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना), तो इसका सामूहिक प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। यह “बॉटम-अप” दृष्टिकोण महंगाई और विदेशी मुद्रा के दबाव को कम करने में सहायक होता है।
मांग-पक्ष प्रबंधन
भारत की प्रतिक्रिया का एक महत्वपूर्ण घटक “मांग-पक्ष प्रबंधन” रहा है। औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को कटौती का सामना करना पड़ सकता है, जबकि घरेलू खाना पकाने के ईंधन और प्रमुख परिवहन को प्राथमिकता दी गई है। प्रधानमंत्री की अपील इसी मांग-पक्ष प्रबंधन को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास है।
दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन
हालांकि यह मानना भी महत्वपूर्ण है कि केवल अपीलों से तात्कालिक रूप से विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ा अंतर नहीं आएगा। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए ठोस नीतिगत हस्तक्षेप और दीर्घकालिक संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं। जैसा कि पेट्रोलियम सचिव ने संकेत दिया है, 90 दिनों का रणनीतिक भंडार बनाने के लिए भारी पूंजी की आवश्यकता होगी, जिसे सरकार वर्तमान में वाणिज्यिक साझेदारी मॉडल के माध्यम से देख रही है।
त्वरित सरकारी कार्रवाइयाँ
अकेले जनता से अपील करने के अलावा सरकार ने समुद्र मंथन कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह गहरे समुद्र में तेल, गैस और खनिज भंडारों की खोज का महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है, जिससे आयात निर्भरता कम होने की उम्मीद है। सरकार ने रूस से छूट वाला तेल खरीदना जारी रखा है और 40 से अधिक देशों से कच्चा तेल आयात करने के लिए अपने स्रोतों में विविधता लाई है।
चुनौतियाँ और आगे का रास्ता
प्रधानमंत्री मोदी की अपील सराहनीय है, लेकिन कुछ बुनियादी चुनौतियाँ भी हैं:
“डिफर्ड पेमेंट” का जोखिम: डेली पायोनियर के संपादकीय के अनुसार पेट्रोल-डीजल के दाम कृत्रिम रूप से स्थिर रखना कोई मुफ्त नीति नहीं है। यह “आस्थगित भुगतान” (deferred payment) है, जो देर-सबेर राजकोषीय घाटे या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के बैलेंस शीट पर बोझ के रूप में प्रकट होगा।
व्यवहार में बदलाव की गति: भारतीय समाज की आदतों और उपभोग पैटर्न में बदलाव लाना एक लंबी प्रक्रिया है। हो सकता है कि यह बदलाव उतनी तेजी से न हो जितनी तेजी से संकट बढ़ रहा है।
भू-राजनीतिक जोखिम का अनुमान लगाना: मानस मजूमदार (पीडब्ल्यूसी) अपने विश्लेषण में सुझाव देते हैं कि भारत को इस संकट को “एक बार की आपात स्थिति” के बजाय “भविष्य के झटकों का पूर्वावलोकन” मानना चाहिए। वास्तविक लचीलापन उस समय आएगा जब भारत के पास तेल के लिए भंडारण, विकल्प बनाने के लिए लचीले अनुबंध और जोखिम कम करने के लिए ऊर्जा संक्रमण होगा।
होर्मुज संकट, महंगाई और प्रधानमंत्री मोदी की विदेशी मुद्रा बचाने की अपील अंततः लचीलापन बनाम तात्कालिक राहत के संतुलन का प्रश्न है।
भारत सरकार ने अब तक प्रभावशाली ढंग से काम किया है। उसने आपूर्ति बनाए रखी है, कीमतों को स्थिर रखा है, राशनिंग से परहेज किया है और रणनीतिक भंडार बढ़ाने की योजना बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी की अपील इस दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो “जन भागीदारी” को “जिम्मेदारी” में बदलने का प्रयास करती है।
हालांकि यह अपील एक मध्यम अवधि का समाधान है। यह तात्कालिक संकट को हल नहीं कर सकती, बल्कि दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक रणनीतिक बदलाव को इंगित करती है। वास्तविक परीक्षण तब होगा जब यह संकट लंबा खिंचेगा और सरकार के सामने विकल्प होगा: या तो कीमतें बढ़ाना, या सब्सिडी का बोझ बढ़ाना या और अधिक कटौती करना।
वैश्विक मंदी जैसे अन्य जोखिम इस समीकरण को और जटिल बनाते हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री की अपील एक जागरूकता पैदा करने और सामूहिक प्रयास को दिशा देने में सफल होगी, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब जनता इसे एक “राष्ट्रीय मिशन” के रूप में अपनाएगी और सरकार इसे ठोस नीतियों, बेहतर बुनियादी ढांचे और दीर्घकालिक ऊर्जा योजना के साथ पूरक बनाएगी।
– रविकांत कोल्हे
