स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण आज रील (Reels) संवाद, मनोरंजन और प्रसिद्धि का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया है। ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी इलाकों तक सभी आयु वर्ग के लोग रील के पीछे मानो दीवाने होकर रील बनाते दिखाई देते हैं।
घर के छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, परिवार के सभी सदस्यों को इस प्रक्रिया में शामिल करने का चलन वर्तमान में अधिक दिखाई देता है। इस माध्यम ने अनेक लोगों को अपनी कला, विचार और स्थानीय संस्कृति को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर दिया है। लेकिन इस सकारात्मक पक्ष के साथ कुछ गंभीर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्न भी खड़े हुए हैं।
विशेष रूप से स्थानीय बोलियों के उपयोग, उनके विकृत स्वरूप और भाषाई संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभावों को गंभीरता से देखने की आवश्यकता है, जिसका विचार शायद ही कोई करता दिखाई देता है।
भारत विभिन्न भाषाओं और बोलियों का देश है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग भाषाई पहचान है। इनमें उस क्षेत्र का इतिहास, संस्कृति, परंपराएं, जीवनशैली और लोकभावनाएं प्रतिबिंबित होती हैं। इन बोलियों के शब्द, कहावतें, मुहावरे और उच्चारण उस-उस क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान माने जाते हैं।
लेकिन वर्तमान में रील संस्कृति के कारण इन बोलियों का उपयोग कई बार केवल मनोरंजन या प्रसिद्धि प्राप्त करने के साधन के रूप में किया जा रहा है। कुछ रील निर्माता स्थानीय बोली के विशेष शब्दों या वाक्यों को अतिरंजित तरीके से प्रस्तुत करते हैं। इससे उस भाषा की स्वाभाविक मिठास, भावनात्मकता और अभिव्यक्ति की शक्ति कम होती हुई दिखाई देती है।
जब किसी शब्द या वाक्य का उपयोग केवल हंसी-मजाक के लिए होने लगता है, तो उसका मूल संदर्भ और अर्थ धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। परिणामस्वरूप उस बोली की पहचान कुछ विशेष हास्यपूर्ण शब्दों तक सीमित होकर रह जाती है। किसी शब्द, कहावत या अभिव्यक्ति की पहचान उस क्षेत्र की बोली और संस्कृति को प्रस्तुत करती है। इसलिए प्रत्येक शब्द का उपयोग करते समय यह समझ होना आवश्यक है कि हम अपनी संस्कृति और परंपराओं को किस दिशा में ले जा रहे हैं।
इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि अनेक रीलों में स्थानीय भाषा का उपहास किया जाता है। गांवों की बोलचाल की शैली, उच्चारण या जीवनशैली को हास्य का विषय बना दिया जाता है। कई बार ऐसी रीलों के कारण उस भाषा और समाज के बारे में गलत धारणाएं भी बन जाती हैं। बोली किसी भी समाज की सांस्कृतिक संपत्ति होती है। उसका मजाक उड़ाना उस समाज की अस्मिता पर अप्रत्यक्ष रूप से आघात करने के समान है।
रील संस्कृति के कारण अश्लीलता और सतही मनोरंजन को भी बढ़ावा मिल रहा है। अधिक से अधिक व्यूज़ और लाइक्स प्राप्त करने के लिए कुछ लोग द्विअर्थी संवाद, अश्लील हावभाव या भड़काऊ सामग्री का उपयोग करते हैं। इसके लिए स्थानीय भाषाओं के शब्दों का भी बड़े पैमाने पर सहारा लिया जाता है।
परिणामस्वरूप उस भाषा का सम्मान बढ़ने के बजाय उसकी छवि धूमिल होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। विशेष रूप से छोटे बच्चे और युवा ऐसे कंटेंट का अनुकरण करते हैं, जिससे भाषा के प्रयोग में भी असभ्यता बढ़ने की चिंता व्यक्त की जा रही है।
दूसरी ओर, यह भी नहीं कहा जा सकता कि रील पूरी तरह नकारात्मक माध्यम है। यदि इसका सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह स्थानीय बोलियों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार का एक प्रभावी साधन बन सकता है। अनेक लोककलाकार, कवि, कथाकार और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी बोली में गुणवत्तापूर्ण सामग्री तैयार कर लाखों लोगों तक पहुंच रहे हैं।
लोकगीत, लोककथाएं, पारंपरिक कहावतें, ग्रामीण जीवनशैली और स्थानीय इतिहास का प्रस्तुतीकरण रील के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से किया जा रहा है। इसलिए समस्या माध्यम में नहीं, बल्कि उसके उपयोग में है।
आज आवश्यकता भाषाई जिम्मेदारी की है। रील बनाने वाले लोगों को अपनी बोली का सम्मान बनाए रखना चाहिए। केवल प्रसिद्धि या मनोरंजन के लिए भाषा का विकृतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
हमें यह भी समझना होगा कि कहीं हम स्वयं ही अपनी संस्कृति को अभद्र रूप में सार्वजनिक तो नहीं कर रहे हैं। स्थानीय शब्द-संपदा, कहावतों और परंपराओं का संरक्षण करने वाली सामग्री का निर्माण समय की आवश्यकता है।
अभिभावकों को भी बच्चों को सोशल मीडिया के विवेकपूर्ण उपयोग के बारे में मार्गदर्शन देना चाहिए। शैक्षणिक संस्थाओं, साहित्यिक संगठनों और सांस्कृतिक मंचों को भी डिजिटल माध्यमों के सकारात्मक उपयोग के माध्यम से बोलियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
रील स्टार तो अब रिश्तों की मिठास को भी समाप्त करने पर उतारू दिखाई दे रहे हैं। अधिक प्रसिद्धि की चाह में क्या हम रिश्तों में सम्मान और आदर का ध्यान रख रहे हैं? मां-बेटे, भाई-बहन, दादा-दादी और नाना-नानी जैसे रिश्ते कहीं न कहीं इस प्रवृत्ति में भटकते हुए दिखाई देते हैं। इन रिश्तों की वास्तविक पहचान करना भी कठिन होता जा रहा है।
अधिक व्यूज़ प्राप्त करने के लिए रिश्तों की मर्यादा को तोड़कर संवाद कौशल दिखाने का एक अप्रामाणिक प्रयास किया जा रहा है। यह पीढ़ियों से चले आ रहे रिश्तों की मधुरता पर सीधा आघात है।
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज की संस्कृति की वाहक होती है। बोलियों के शब्द, लय, स्वर और भावविश्व पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित की गई सांस्कृतिक विरासत हैं। रील संस्कृति के तेज प्रवाह में यह धरोहर खो न जाए, इसके लिए समाज को सजग रहने की आवश्यकता है।
मनोरंजन और प्रसिद्धि की दौड़ में हमारी भाषा की प्रतिष्ठा और अस्मिता को कोई नुकसान न पहुंचे, इसकी चिंता करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। स्थानीय बोलियों की मिठास, उनकी विशिष्टता और सांस्कृतिक मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए यदि आधुनिक माध्यमों का उपयोग किया जाए, तभी तकनीक और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।
– सूर्यकांत आयरे

