महंगाई की मार सर्वाधिक सामान्य व गरीब नागरिकों को झेलनी पड़ती है, जो पहले से ही अभाव और असुरक्षा की मार झेल रहे होते हैं। इस प्रकार युद्ध-प्रेरित महंगाई अकाल, बीमारी, विस्थापन और गरीबी जैसी अनेक आफतों की श्रृंखला अपने साथ लाती है, जिससे पीढ़ियों तक पीड़ा बनी रहती है।
विश्व आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे बल्कि उनका प्रभाव घर-घर की रसोई, खेतों, उद्योगों, बाजारों और सामान्य मनुष्य के जीवन पर दिखाई देने लगा है। हालांकि भारत युद्ध का प्रत्यक्ष भागीदार नहीं है, फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की परस्पर निर्भरता ऐसी हो चुकी है कि हजारों किलोमीटर दूर होने वाला युद्ध भी भारत को प्रभावित कर रहा है। यही कारण है कि आज भारत का सामान्य नागरिक महंगाई की उस आग को महसूस करने लगा है जो धीरे-धीरे उसकी जीवनशैली, उसकी योजनाओं और उसके भविष्य को प्रभावित कर रही है।
महंगाई केवल वस्तुओं के दाम बढ़ने का नाम नहीं है। महंगाई एक मानसिक दबाव है। यह वह स्थिति है जब व्यक्ति दिन-रात परिश्रम करने के बाद भी अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में असमर्थ महसूस करने लगता है। जब किसी पिता को यह सोचना पड़े कि इस महीने बच्चों की फीस भरे या घर का राशन खरीदे, जब किसी किसान को यह चिंता सताने लगे कि डीजल महंगा होने से उसकी खेती की लागत कैसे निकलेगी, जब मध्यमवर्गीय परिवार गैस सिलेंडर की कीमत देखकर अपनी रसोई का बजट बदलने लगे, तब समझना चाहिए कि महंगाई केवल आर्थिक समस्या नहीं रही, वह सामाजिक चिंता का रूप ले चुकी है। युद्धजन्य परिस्थितियां इसी प्रकार की भयावह महंगाई को जन्म देती हैं।

भारत अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसका अर्थ यह है कि यदि विश्व में कहीं भी तेल उत्पादन प्रभावित होता है या समुद्री मार्ग असुरक्षित होते हैं तो उसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है तो केवल पेट्रोल और डीजल महंगे नहीं होते बल्कि हर वह वस्तु महंगी हो जाती है जिसके उत्पादन या परिवहन में ईंधन का उपयोग होता है। ट्रकों का किराया बढ़ता है, खेतों में चलने वाले पम्प और ट्रैक्टर का उपयोग महंगे हो जाते हैं, फैक्ट्रियों का उत्पादन खर्च बढ़ता है और अंततः सब्जियों से लेकर कपड़ों तक सबकी कीमत बढ़ जाती है।
एक समय था जब सामान्य भारतीय परिवार 400-500 रुपये में गैस सिलेंडर खरीद लेता था, पर पिछले कुछ वर्षों में यह कीमत कई बार 1000 रुपये के आसपास पहुंच गई। यदि युद्ध और गम्भीर रूप लेता है तो यह आशंका अस्वाभाविक नहीं कि रसोई गैस 1400-1500 रुपये तक पहुंच जाए। यह स्थिति उस गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कितनी भयावह होगी जिसकी मासिक आय ही सीमित है, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है।
महंगाई का सबसे गहरा प्रभाव रसोई पर पड़ता है। भारतीय समाज में भोजन केवल आवश्यकता नहीं, संस्कृति और परिवार का आधार भी है, किंतु जब दाल, तेल, आटा, सब्जियां और दूध महंगे होने लगते हैं, तब सबसे पहले गरीब परिवारों के भोजन की गुणवत्ता प्रभावित होती है। बच्चों के दूध में कटौती होने लगती है, फल और पोषक आहार कम हो जाते हैं। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद खाद्य तेलों की कीमतों में भारी वृद्धि देखी गई थी। भारत सूरजमुखी तेल का बड़ा हिस्सा यूक्रेन और रूस से आयात करता था। युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित हुई और देखते ही देखते खाने के तेल की कीमतें 40 से 60 प्रतिशत तक बढ़ गईं। इसका सीधा प्रभाव सामान्य परिवारों की रसोई पर पड़ा। यदि वैश्विक युद्ध का दायरा बढ़ता है तो यही स्थिति भविष्य में और भी गम्भीर रूप ले सकती है।
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल वाहन चलाने वालों तक सीमित नहीं रहता। भारत में अधिकांश वस्तुओं का परिवहन सड़कों के माध्यम से होता है। डीजल महंगा होते ही ट्रांसपोर्ट कम्पनियां किराया बढ़ा देती हैं। फल, सब्जियां, अनाज, दवाइयां, दूध, सीमेंट, कपड़े सबका परिवहन खर्च बढ़ जाता है। अंततः व्यापारी वह अतिरिक्त खर्च ग्राहक से वसूलते हैं। गांव का किसान जब अपनी उपज मंडी तक पहुंचाता है तो उसे पहले से अधिक खर्च करना पड़ता है। शहर में नौकरी करने वाला व्यक्ति रोज बस, ऑटो या बाइक से यात्रा करता है, उसका दैनिक खर्च बढ़ जाता है। धीरे-धीरे यह महंगाई पूरे आर्थिक ढांचे को प्रभावित करने लगती है।
युद्ध का सबसे घातक प्रभाव समुद्री व्यापार पर पड़ता है। आज विश्व का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों से होता है। भारत का लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार समुद्र के रास्ते संचालित होता है। यदि हॉर्मूज जलडमरूमध्य या लाल सागर जैसे मार्ग बाधित होते हैं तो तेल और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति पर गम्भीर संकट आ सकता है। जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है, कंटेनर किराया कई गुना बढ़ जाता है और सामान की डिलीवरी में देरी होने लगती है। कोरोना काल में दुनिया ने यह स्थिति देखी थी जब कंटेनर संकट के कारण चीन से भारत तक सामान लाने का किराया कई गुना बढ़ गया था। इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल, मशीनें और कई आवश्यक वस्तुएं महंगी हो गई थीं। यदि युद्ध लम्बा चला तो यह संकट उससे भी अधिक गम्भीर हो सकता है।
भारत जैसे विकासशील देश में महंगाई का सबसे अधिक बोझ गरीब और मध्यमवर्ग उठाता है। सम्पन्न वर्ग कुछ समय तक अपनी बचत और संसाधनों के कारण स्थिति सम्भाल सकता है, परंतु मजदूर, किसान, छोटे दुकानदार और नौकरीपेशा लोग सबसे पहले प्रभावित होते हैं। उनकी आय सीमित होती है, जबकि खर्च लगातार बढ़ते जाते हैं। कई बार परिवारों को कर्ज लेना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। छोटे उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की नौकरी चली जाती है क्योंकि उद्योगों की लागत बढ़ने लगती है। बेरोजगारी और महंगाई का यह संयुक्त संकट सामाजिक असंतोष को जन्म देता है।

युद्धजन्य परिस्थितियों में शेयर बाजार भी अस्थिर हो जाता है। निवेशक डर के कारण अपने पैसे सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगते हैं। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकाल सकते हैं। इससे कम्पनियों के शेयर गिरते हैं, म्यूचुअल फंड और एसआईपी प्रभावित होते हैं। मध्यमवर्गीय परिवार जिन्होंने अपने भविष्य और बच्चों की शिक्षा के लिए निवेश किया होता है, उनकी बचत अचानक घटने लगती है। 2020 में कोरोना महामारी के दौरान भारतीय शेयर बाजार कुछ ही सप्ताहों में लगभग 35 प्रतिशत तक गिर गए थे। लाखों निवेशकों को भारी आर्थिक हानि हुई थी। युद्ध की स्थिति में भी ऐसी अस्थिरता पैदा हो सकती है। इसका प्रभाव केवल अमीर निवेशकों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि उन सामान्य परिवारों पर भी पड़ेगा जो छोटी-छोटी बचत के माध्यम से भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं।
इतिहास बताता है कि संकट के समय समाज में मानवता और स्वार्थ दोनों अपने चरम रूप में सामने आते हैं। एक ओर कुछ लोग दूसरों की सहायता के लिए आगे आते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ व्यापारी संकट को लाभ कमाने का अवसर बना लेते हैं। जमाखोरी, कालाबाजारी और भ्रष्टाचार ऐसे ही समय में बढ़ते हैं। आवश्यक वस्तुओं को छिपाकर कृत्रिम कमी पैदा की जाती है ताकि अधिक कीमत वसूली जा सके। कोरोना महामारी के समय ऑक्सीजन सिलेंडर, दवाइयां आदि की अस्पतालों में जिस प्रकार की कालाबाजारी देखी गई, उसने समाज को झकझोर दिया था। कुछ लोगों ने मानव पीड़ा को भी व्यापार बना लिया था। युद्धजन्य महंगाई में भी यही संकट बढ़ जाता है। अनाज, तेल, दवाइयां, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी कर कीमतें बढ़ाई जा सकती हैं। इससे गरीब और सामान्य नागरिक सबसे अधिक पीड़ित होता है।

भारत के इतिहास में ऐसी परिस्थितियां पहले भी आ चुकी हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। उस समय युद्ध के कारण वस्तुओं की भारी कमी हो गई थी। राशनिंग व्यवस्था लागू करनी पड़ी थी। चीनी, कपड़ा, पेट्रोल और अनाज सीमित मात्रा में वितरित किए जाते थे। 1943 का बंगाल अकाल भारतीय इतिहास के सबसे भयावह घटनाओं में से एक माना जाता है। 1973 का तेल संकट भी विश्व इतिहास का महत्वपूर्ण उदाहरण है। अरब-इजरायल युद्ध के बाद तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन घटा दिया था। परिणामस्वरूप तेल की कीमतें अचानक चार गुना तक बढ़ गईं। पेट्रोल और परिवहन महंगा हुआ, उद्योगों की लागत बढ़ी और आर्थिक विकास धीमा पड़ गया। 1990 के खाड़ी युद्ध के समय भी भारत गम्भीर आर्थिक संकट में फंस गया था। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया कि देश को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा। उस समय भारत ने कठोर आर्थिक सुधार किए और धीरे-धीरे स्थिति को सम्भाला।
ऐसी परिस्थितियों में सरकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। इतिहास में विभिन्न सरकारों ने महंगाई और संकट से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। राशनिंग व्यवस्था लागू करना, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण, गरीबों को सब्सिडी देना, जमाखोरी रोकने के लिए कठोर कार्रवाई करना और वैकल्पिक व्यापार मार्ग खोजना, ये सभी उपाय समय-समय पर किए गए हैं। भारत सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया था। इससे करोड़ों गरीब परिवार भूख और भयंकर संकट से बचे रहे। इसी प्रकार यदि भविष्य में युद्धजन्य महंगाई बढ़ती है तो सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को और मजबूत करना होगा, परंतु केवल सरकारें ही हर समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं। समाज और नागरिकों की भी बड़ी जिम्मेदारी होती है।
भारतीय समाज को उपभोग की अंधी दौड़ से बाहर निकलना होगा। आज आधुनिक जीवनशैली में अनावश्यक खर्च और दिखावा बहुत बढ़ गया है। युद्धजन्य संकट हमें यह सिखा सकता है कि सीमित संसाधनों में संयमपूर्वक जीवन कैसे जिया जाए। ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा और अनावश्यक खर्चों में कमी, ये केवल आर्थिक उपाय नहीं बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी हैं।
भारतीय परिवारों को बचत की संस्कृति पुनः अपनानी होगी। एक समय था जब भारतीय परिवार कठिन समय के लिए बचत करते थे, किंतु आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने लोगों को ऋण और तात्कालिक उपभोग की ओर धकेल दिया है। संकट के समय वही परिवार सुरक्षित रह पाते हैं जिनके पास कुछ बचत होती है। इसलिए आर्थिक अनुशासन और भविष्य के प्रति सजगता अत्यंत आवश्यक है।
केवल सरकार की ओर देखने से समाधान नहीं निकलेगा। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नैतिकता का है। यदि व्यापारी केवल लाभ देखेंगे, यदि अधिकारी भ्रष्टाचार करेंगे, यदि नागरिक घबराकर अनावश्यक वस्तुओं की खरीद करेंगे तो संकट और भी भयावह हो जाएगा। युद्धजन्य महंगाई केवल आर्थिक परीक्षा नहीं होती, वह समाज के चरित्र की परीक्षा भी होती है। इतिहास उन्हीं समाजों को सम्मान देता है जिन्होंने कठिन समय में मानवता और अनुशासन बनाए रखा।
आज भारत के सामने चुनौती यह है कि वह आर्थिक विकास के साथ आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे कैसे बढ़े। ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, सौर और हरित ऊर्जा का विस्तार, कृषि उत्पादन में वृद्धि, स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन और समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना आने वाले समय की आवश्यकता है। यदि भारत अपने आवश्यक संसाधनों के लिए अत्यधिक विदेशी निर्भरता कम कर पाएगा, तभी वह वैश्विक संकटों का सामना मजबूती से कर सकेगा।

