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सैन्य शक्ति वर्चस्व का पैमाना नहीं  

सैन्य शक्ति वर्चस्व का पैमाना नहीं  

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, देश-विदेश
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वास्तव में यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो इस युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि दोनों पक्षों ने भारी कीमत चुकाई है। अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए, अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रश्न खड़े किए और वैश्विक स्तर पर आलोचना झेली। वहीं ईरान ने आर्थिक क्षति, मानव हानि और विकास की गति में रुकावट का सामना किया।

“युद्ध का अंत शांति नहीं, बल्कि घावों की विरासत छोड़ जाता है।” युद्ध के संदर्भ में यह कहावत अमेरिका ,इजरायल और ईरान युद्ध में युद्धरत देश और विश्व के अन्य देशों के लिए सटीक रूप में सही साबित हो रही है। विश्व राजनीति में कुछ युद्ध केवल दो देशों के बीच नहीं लड़े जाते, बल्कि वे पूरी विश्व व्यवस्था की दिशा तय करते हैं। अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में  हुआ संघर्ष भी ऐसा ही एक युद्ध था। लगभग साढ़े तीन महीनों तक चले इस संघर्ष  ने केवल मध्य-पूर्व को ही नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन को भी प्रभावित किया। अंततः अब दोनों देशों के बीच युद्धविराम और समझौते का एम ओ यू हुआ है। किंतु इस संघर्ष ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि इस युद्ध में वास्तव में जीता कौन और हारा कौन?

यदि केवल सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य सामरिक ताकत है। उसके पास अत्याधुनिक हथियार, विशाल नौसेना, वैश्विक सैन्य ठिकाने और आर्थिक शक्ति है। दूसरी ओर ईरान अपेक्षाकृत सीमित संसाधनों वाला देश है। लेकिन आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीते जाते। युद्ध का परिणाम राजनीतिक इच्छाशक्ति, जनसमर्थन, आर्थिक क्षमता और कूटनीतिक संतुलन पर भी निर्भर करता है। यही कारण है कि युद्ध समाप्त होने के बाद दुनिया में यह धारणा बनी कि अमेरिका अपनी सैन्य श्रेष्ठता सिद्ध तो कर सका, किंतु वह अपनी राजनीतिक इच्छाओं को पूरी तरह लागू नहीं करा पाया। वहीं ईरान सैन्य रूप से कमजोर होने के बावजूद अपने अस्तित्व, सम्मान और राजनीतिक संकल्प को बचाने में सफल रहा।

युद्ध के प्रारंभिक दिनों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने कहा था कि “युद्ध आपने शुरू किया है, लेकिन समाप्त हमारी शर्तों पर होगा।” उस समय अनेक लोगों को यह वक्तव्य केवल भावनात्मक प्रतीत हुआ था। किंतु आज जब युद्ध विराम का एम ओ यू बातचीत और समझौते के माध्यम से हुआ है, तब अयातुल्ला अली खामेनेई के शब्दों को नए संदर्भ में देखा जा रहा है। यह कहना उचित नहीं होगा कि युद्ध पूरी तरह ईरान की शर्तों पर समाप्त हुआ, क्योंकि ईरान को भी अनेक मोर्चों पर समझौते करने पड़े हैं। फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि युद्ध के प्रारंभ में अमेरिका और  इजराइल ने ईरान को पूरी तरह नष्ट करने की और ईरान में सत्ता परिवर्तन करने की बात कही थी। अमेरिका और उसके सहयोगी इसराइल दोनों मिलकर ईरान को पूर्णतः झुकाने या उसकी सत्ता व्यवस्था को बदलने के अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सके और युद्ध विराम में तय बातों ने अमेरिका का पलड़ा कमजोर कर दिया। इसलिए खामेनेई का कथन आंशिक रूप से सही सिद्ध होता दिखाई देता है।

Israel Iran War Iran Says Ceasefire With Israel Comes Into Effect after Trump claim सीजफायर के लिए मान गया ईरान, इजरायल अब तक खामोश; मिडिल ईस्ट में रुकेगी तबाही?, International Hindi News -

इस युद्ध ने अमेरिका की वैश्विक छवि पर भी प्रभाव डाला है। पिछले कई दशकों से अमेरिका स्वयं को विश्व व्यवस्था का संरक्षक और लोकतंत्र का रक्षक बताता रहा है। किंतु वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान और अब ईरान जैसे संघर्षों ने यह दिखाया है कि सैन्य शक्ति हर समस्या का समाधान नहीं होती। अमेरिका अपने सामर्थ्य से किसी देश के सैन्य ढांचे को क्षति पहुंचा सकता है, लेकिन किसी समाज की राष्ट्रीय भावना, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक संकल्प को आसानी से नहीं तोड़ सकता। यही कारण है कि अमेरिका कई बार युद्ध के मैदान में बढ़त लेने के बावजूद राजनीतिक लक्ष्य हासिल नहीं कर पाता।
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ईरान की छवि इसके विपरीत एक ऐसे राष्ट्र की बनी है जो भारी दबाव के बावजूद झुकने को तैयार नहीं हुआ। ईरान के समर्थकों के लिए यह संघर्ष आत्मसम्मान और संप्रभुता की रक्षा का प्रतीक बन गया है। हालांकि यह भी सत्य है कि ईरान को भारी आर्थिक और मानवीय क्षति उठानी पड़ी है। उसके कई सैन्य और औद्योगिक प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुंचा, आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं और जनता को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसलिए ईरान इस युद्ध को पूर्ण विजय नहीं कह सकता।

वास्तव में यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाए तो इस युद्ध की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि दोनों पक्षों ने भारी कीमत चुकाई है। अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए, अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रश्न खड़े किए और वैश्विक स्तर पर आलोचना झेली। वहीं ईरान ने आर्थिक क्षति, मानव हानि और विकास की गति में रुकावट का सामना किया। यही कारण है कि आम जनमानस में यह प्रचलित हो रहा है कि,“युद्ध में आखिर जीत किसी की नहीं हुई, पर दोनों निवस्त्र हो गए”, अमेरिका- ईरान संघर्ष पर यह बात काफी हद तक लागू होती दिखाई देती है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी जनता को विजय का संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं, किंतु वास्तविकता यह है कि दोनों ने नुकसान सहा है।
Strait of Hormuz - Wikipedia

इस युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान विश्व समुदाय को हुआ। होर्मुज़ जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध के कारण तेल और गैस के बाजारों में अस्थिरता उत्पन्न हुई। अनेक देशों में महंगाई बढ़ी, व्यापार प्रभावित हुआ और वैश्विक आर्थिक विकास की गति पर असर पड़ा। विकासशील देशों को सबसे अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि ऊर्जा की बढ़ती कीमतों का सीधा प्रभाव उनकी अर्थव्यवस्था पर पड़ा। युद्ध ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि आज की परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में किसी क्षेत्रीय संघर्ष का प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ता है।

युद्धविराम के बाद विश्व को सबसे बड़ी उपलब्धि यह मिली है कि युद्ध का व्यापक स्तर पर विस्तार और संभावित वैश्विक महायुद्ध के संकट की आशंका कम हुई है। तेल बाजारों में स्थिरता लौटने की संभावना बनी है। निवेशकों का विश्वास बढ़ा है और कूटनीतिक समाधान के लिए नया अवसर पैदा हुआ है। इसके अतिरिक्त परमाणु संघर्ष का जो भय विश्व के सामने मंडरा रहा था, उसमें भी कुछ कमी आई है। इसलिए युद्धविराम केवल अमेरिका और ईरान के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए राहत का विषय है।
इजराइल-ईरान युद्ध पर बीस प्रश्न (और विशेषज्ञों के उत्तर) - अटलांटिक काउंसिल

हालांकि स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है। इस पूरे घटनाक्रम में इजराइल की भूमिका विशेष महत्व रखती है। इजराइल का मानना है कि यह युद्ध विराम अमेरिका ने पूर्णत: ईरान को सामने रखकर किया है, जबकी ईरान उसके अस्तित्व के लिए दीर्घकालिक खतरा है। इसलिए यदि अमेरिका और ईरान समझौते की दिशा में आगे बढ रहे हैं और इजराइल अपनी आक्रामक नीति जारी रखता है, तो क्षेत्रीय राजनीति में नई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी स्थिति में इजराइल स्वयं को अलग-थलग महसूस कर सकता है। हालांकि यह भी सच है कि इजराइल के पास मजबूत सैन्य क्षमता और कई अंतरराष्ट्रीय सहयोगी हैं। इसलिए उसके पूरी तरह अलग पड़ जाने की संभावना कम दिखाई देती है। फिर भी यदि वह कूटनीतिक प्रक्रिया से अलग राह अपनाता है, तो मध्य-पूर्व में तनाव पुनः बढ़ सकता है।

यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है कि, वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान और अब ईरान युद्ध में अमेरिका पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पाया है। अमेरिका बार-बार ऐसी परिस्थितियों में क्यों फंसता है , जहां उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। इसका उत्तर उसकी विदेश नीति की मूल सोच में छिपा हुआ है। अमेरिका अक्सर यह मानकर चलता है कि सैन्य शक्ति के माध्यम से राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन भी लाए जा सकते हैं। लेकिन इतिहास बताता है कि किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक पहचान और स्वतंत्रता की भावना को केवल सैन्य दबाव से समाप्त नहीं किया जा सकता। क्यूबा, वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान और अब ईरान जैसे उदाहरण इस तथ्य को बार-बार प्रमाणित करते हैं।

अमेरिका की एक और समस्या यह है कि वह कई बार स्थानीय परिस्थितियों को अपनी रणनीतिक दृष्टि से देखता है, जबकि जमीनी वास्तविकताएं भिन्न होती हैं। परिणामस्वरूप सैन्य अभियान अपेक्षा से अधिक लंबे, महंगे और जटिल हो जाते हैं। अमेरिका हर युद्ध हारता है ऐसा नहीं कह सकते, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि वह कई बार सैन्य सफलता को राजनीतिक सफलता में परिवर्तित नहीं कर पाता।

अमेरिका–ईरान युद्ध से यह बात स्पष्ट होती है कि इक्कीसवीं सदी में केवल सैन्य शक्ति किसी राष्ट्र की अंतिम ताकत नहीं है। राजनीतिक इच्छाशक्ति, राष्ट्रीय एकता, आर्थिक सहनशीलता और प्रभावी कूटनीति भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। इस युद्ध ने अमेरिका को यह संदेश दिया है कि उसकी शक्ति असीमित नहीं है। इसने ईरान को यह एहसास कराया है कि केवल प्रतिरोध , अतिरेक वाले धार्मिकता की राजनीति भी स्थायी समाधान नहीं दे सकती। और इसने विश्व समुदाय को यह सिखाया है कि युद्ध चाहे किसी भी उद्देश्य से शुरू किया जाए, अंततः समाधान बातचीत की मेज पर ही खोजा जाता है।
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अमेरिका, इजरायल और ईरान के इस पूरे संघर्ष की सबसे बड़ी कहानी किसी एक पक्ष की विजय नहीं, बल्कि युद्ध की सीमाओं का उजागर होना है। साढ़े तीन महीने तक चली हिंसा, आर्थिक संकट, कूटनीतिक तनाव और वैश्विक अस्थिरता के बाद दुनिया वहीं पहुंची जहां उसे पहले दिन पहुंच जाना चाहिए था…. संवाद, समझौता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की दिशा में। यही इस युद्ध का सबसे बड़ा सबक है।‌

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Tags: Ayatollah Ali KhameneiCeasefire MoUForeign PolicyGlobal Energy SecurityIsrael IsolationMiddle East GeopoliticsStrait of HormuzUS Iran Conflict 2026अमेरिका ईरान युद्धमध्य-पूर्व भू-राजनीतियुद्धविराम समझौतावैश्विक अर्थव्यवस्था

अमोल पेडणेकर

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