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शिवसेना:  प्रश्नों के उत्तर गाली गलौज में नहीं

शिवसेना: प्रश्नों के उत्तर गाली गलौज में नहीं

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, राजनीति
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महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना केवल एक राजनीतिक दल नहीं थी, बल्कि वह एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन के रूप में उभरी थी। 1966 में बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना ने मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और आक्रामक जनसंगठन की त्रिसूत्री के बल पर राज्य की राजनीति में स्वतंत्र स्थान बनाया था। लेकिन आज, पार्टी के साठवें स्थापना दिवस की पृष्ठभूमि में, शिवसेना के सांसद विभक्त होने के कारण उद्धव ठाकरे शिवसेना के सामने अस्तित्व और सक्षम नेतृत्व दोनों स्तरों पर गंभीर प्रश्न खड़े दिखाई दे रहे हैं।

हाल के समय में शिवसेना के विधायकों, सांसदों और स्थानीय स्तर के नेताओं के लगातार दल बदलने, संगठन के भीतर गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर बढ़ती असहजता के कारण एक प्रश्न बार-बार उठ रहा है। क्या उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना राजनीतिक रूप से कमजोर होती जा रही है? इस प्रश्न का उत्तर खोजते समय शिवसेना के पिछले दशक के राजनीतिक सफर पर नजर डालना आवश्यक है।
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बालासाहेब ठाकरे के करिश्माई नेतृत्व और उद्धव ठाकरे की शैली इन दोनों बातों पर यहां विचार करना होगा। बालासाहेब ठाकरे का नेतृत्व व्यक्तित्व प्रधान था। उनका शब्द ही आदेश माना जाता था। उनके व्यक्तित्व में करिश्मा, आदरयुक्त डर और भावनात्मक संबंध ये तीनों बातें थीं। उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभालने के बाद शिवसेना की शैली बदल दी। संगठनात्मक दृष्टिकोण, प्रशासनिक भूमिका और गठबंधन की राजनीति पर अधिक जोर दिया गया। लेकिन इसी काल में पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं में निर्णय प्रक्रिया को लेकर नाराजगी बढ़ती गई। 2019 में भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़कर शिवसेना ने राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के साथ महाविकास आघाड़ी बनाई।

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यह निर्णय शिवसेना के पारंपरिक एवं हिंदुत्व से जुड़े मतदाताओं के लिए अप्रत्याशित था। इसी काल में पार्टी के भीतर मतभेद धीरे-धीरे बढ़ते गए। उसी का परिणाम 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए बड़े विद्रोह के रूप में सामने आया और शिवसेना का बड़ा समूह अलग हो गया। इस घटना ने शिवसेना की संगठनात्मक शक्ति को बड़ा झटका दिया।

राजनीति में नेतृत्व करने वाले व्यक्ति के वक्तव्य का बहुत महत्व होता है। नेतृत्व को हमेशा अपने शब्द सोच-समझकर बोलने चाहिए। शिवसेना के एक सभा में उद्धव ठाकरे ने एकनाथ शिंदे को लक्ष्य करते हुए या अपनी आदत के अनुसार उन पर तंज कसते हुए उपस्थित शिवसैनिकों के सामने कहा था, “मां का दूध बेचने वालों की औलाद मुझे शिवसेना में नहीं चाहिए।” इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेता अमित शाह की तुलना अफजल खान से की थी। लगभग चार वर्ष पहले जब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को संबोधित करते हुए कहा था, “राजनीति में या तो तुम रहोगे या मैं रहूंगा।” अमित शाह, एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस के लिए इस्तेमाल किए गए इन वाक्यों की कीमत उद्धव ठाकरे और शिवसेना को बहुत भारी पड़ रही है।
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वर्तमान में उद्धव ठाकरे अमित शाह, मोदी और फडणवीस के संदर्भ में बहुत कुछ नहीं बोलते, लेकिन उन्होंने यह जिम्मेदारी संजय राऊत को सौंप दी है। संजय राऊत लगातार अपनी शैली में शिवसेना का पक्ष रखने के प्रयास में भावनाओं के प्रभाव में आकर गाली गलौज वाली भाषा का उपयोग करते हैं।
राजनीति में शब्दों का विशेष महत्व होता है। नेताओं के वक्तव्यों का पार्टी की छवि पर सीधा प्रभाव पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में उद्धव ठाकरे तथा शिवसेना के प्रमुख प्रवक्ता संजय राऊत के वक्तव्यों ने कई बार चर्चा और विवाद पैदा किए हैं।

राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करना लोकतंत्र की स्वाभाविक बात है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी, उपहासात्मक भाषा या आक्रामक गाली गलौज वाली शब्दों के कारण कई बार व्यापक मतदाता वर्ग दूर हो जाता है। विशेष रूप से मध्यमवर्गीय और नए मतदाताओं को अधिक संयमित और विकासोन्मुख राजनीति की अपेक्षा होती है। बालासाहेब ठाकरे के समय शिवसेना की आक्रामक शैली ने जिस प्रकार राजनीतिक लाभ पहुंचाया था, वैसा लाभ आज शिवसेना को मिलता दिखाई नहीं देता।

जब बालासाहेब ठाकरे थे तब उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को आदेश दिया था कि आगे यदि कोई विधायक या सांसद टूटे तो उसे सड़क पर पकड़कर मारों। बालासाहेब का कर्तृत्व और नेतृत्व जिस प्रकार का था, उसे देखते हुए वह उचित था, लेकिन जब संजय राऊत जैसा बड़बोला व्यक्ति, जिसने कभी नगरसेवक के रूप में चुनाव जीतने का पराक्रम नहीं किया, वह जब पार्टी छोड़कर जाने वाले कार्यकर्ताओं को सड़क पर पकड़कर मारने का आदेश देता है, तब “छोटा मुंह बड़ी बात” जैसी स्थिति सामने आती है।

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क्या संजय राऊत के वक्तव्यों में व्यक्त होने वाली गाली गलौज वाली भाषा वास्तव में शिवसेना की शक्ति व्यक्त करती है? या फिर उसकी कमजोरी ही व्यक्त होती है? शिवसेना के अनेक कार्यकर्ताओं के अनुसार उद्धव ठाकरे और संजय राऊत की अतिआक्रामक, गाली गलौज से भरी भाषा और लगातार संघर्षात्मक दृष्टिकोण पार्टी के विस्तार को सीमित करने वाला साबित हुआ है।

शिवसेना से अनेक विधायक और सांसद बाहर जा रहे हैं। इसके पीछे केवल वैचारिक मतभेद हैं या राजनीतिक भविष्य की चिंता, इस पर विभिन्न मत हैं। कुछ लोगों का मानना है कि सत्ता से दूर रहने के कारण स्थानीय विकास कार्यों, निधि और मतदाता क्षेत्र में प्रभाव के संदर्भ में सीमाएं पैदा होती हैं। इसलिए निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए सत्ताधारी समूह की ओर जाना अधिक सुविधाजनक लगता है।
शिवसेना के अनेक कार्यकर्ता निजी तौर पर या सार्वजनिक रूप से कहते हैं कि जब से संजय राऊत ने संगठन की बागडोर संभाली है तब से संगठन का पतन शुरू हुआ है।

क्या शिवसैनिकों की यह भावना नेतृत्व कर रहे उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र आदित्य ठाकरे की समझ में नहीं आती? या फिर उनमें वह क्षमता नहीं बची है? जिस प्रकार शकुनि पूरे कौरव वंश को समाप्त करने की कूटनीति लेकर कौरवों के समूह में घुसा था और उसने पूरी कौरव सेना को समाप्त कर दिया था, क्या संजय राऊत भी उसी प्रकार का व्यक्तित्व बनकर शिवसेना संगठन में प्रवेश कर चुके हैं?

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आज शिवसेना में संजय राऊत एक बड़बोले नेता, उद्धव ठाकरे निरंतर अस्वस्थ एवं बिमार और आदित्य ठाकरे की प्रवृत्ति राजनीतिक नहीं है, ऐसा चित्र शिवसेना के नेतृत्व में दिखाई दे रहा है। वर्तमान में शिवसेना के जहाज में छेद हो चुका है और इस जहाज को सुरक्षित किनारे तक पहुंचाने वाला एक भी कुशल नाविक आज उद्धव ठाकरे की शिवसेना में दिखाई नहीं देता। ऐसी स्थिति में शिवसेना के पतन का दोष केवल विधायकों और सांसदों पर मढ़ना उचित नहीं है।

बालासाहेब ठाकरे इस दुनिया को अलविदा कहते समय राजनीतिक वैभव से संपन्न शिवसेना पक्ष उद्धव ठाकरे के हाथों में सौंपकर गए थे। उद्धव ठाकरे के हाथों में नेतृत्व आने के बाद शिवसेना को यह गिरावट क्यों आई? कोई नेता अपने राजनीतिक जीवन में गलत नेतृत्व शैली के कारण जो गलतियां करता है, उसके परिणाम संगठन को भुगतने पड़ते हैं। उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता की कमी के कारण शिवसेना ठाकरे परिवार के हाथों से निकलकर अब एकनाथ शिंदे की ओर जाती दिखाई दे रही है। ऐसा चित्र आज महाराष्ट्र के सामने है।

शिवसेना टूट नहीं रही है, बल्कि ठाकरे परिवार के पास मौजूद शिवसेना की एकाधिकारशाही टूट रही है और पार्टी के कार्यकर्ता, सांसद और विधायक समर्थ नेतृत्व वाले एकनाथ शिंदे के साथ एकत्रित हो रहे हैं। ऐसा चित्र दिखाई देता है। यदि किसी जहाज में छेद हो जाए तो उस डूबते जहाज में कौन रहेगा? उद्धव ठाकरे की शिवसेना में रहकर डूबने की मूर्खता कोई करेगा, ऐसा नहीं लगता।

शिवसेना के सांसदों को अपने निर्वाचन क्षेत्रों में काम करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध नहीं हो रही। इन सांसदों की व्यक्तिगत और जनहित की समस्याओं को सुलझाने में उद्धव ठाकरे का नेतृत्व निष्प्रभावी साबित हो रहा है। ऐसे समय में क्या केवल नाममात्र के सांसद बनकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना में रहना चाहिए? ऐसा प्रश्न भी शिवसेना के सांसदों और विधायकों के मन में पैदा हो रहा है।

उद्धव ठाकरे के डूबते जहाज के सांसद बने रहने से बेहतर जनता के काम करने के लिए एकनाथ शिंदे के साथ जाने का मार्ग सांसदों ने स्वीकार किया है। इसलिए लगातार बड़े पैमाने पर हुए दल-बदल ने उद्धव ठाकरे की शिवसेना की ताकत कम होने का चित्र बनाया है। बालासाहेब के समय का मजबूत लेकिन भावनात्मक नेतृत्व और आज का विचलित नेतृत्व, इन दोनों के बीच का अंतर अनेक पारंपरिक शिवसैनिकों को बेचैन करता दिखाई देता है।

आज क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना समाप्त हो रही है? या समाप्त होने के कगार पर है? यह प्रश्न अनेक लोगों के मन में उठ रहा है। यदि राजनीतिक इतिहास देखा जाए तो अनेक दलों को बड़े झटके लगे, लेकिन वे फिर खड़े हुए। क्योंकि राजनीति में कोई भी हमेशा के लिए समाप्त नहीं होता। संभव है कि शिवसेना के मामले में भी वर्तमान में चल रही प्रक्रिया पार्टी की समाप्ति की नहीं बल्कि पुनर्गठन की हो सकती है। लेकिन आज शिवसेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती आत्ममंथन की है। पार्टी को स्वयं से कुछ मूलभूत प्रश्न पूछने की आवश्यकता है।

शिवसेना के साठवें स्थापना दिवस की पृष्ठभूमि में पार्टी एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी को संगठनात्मक क्षरण, नेतृत्व पर प्रश्न और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला समूह स्वयं को बालासाहेब का वास्तविक उत्तराधिकारी स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। जब बालासाहेब ठाकरे शिवसेना की कमान संभाले हुए थे तब सभी शिवसैनिकों में एक मत था। शिवसेना और बालासाहेब पर अपना सर्वस्व अर्पित करने वाले वही कार्यकर्ता, सांसद और विधायक आज शिवसेना से दूर क्यों जा रहे हैं?

इसका उत्तर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा को गाली गलौज वाली भाषा में दोषी ठहराकर नहीं मिलेगा। यदि उद्धव ठाकरे की शिवसेना के भटके हुए जहाज को सुरक्षित किनारे पर लाना है तो क्या आत्ममंथन और प्रत्यक्ष कार्य करने वाला सक्षम नेतृत्व शिवसेना में तैयार होगा? या भविष्य में एकनाथ शिंदे की शिवसेना ही बालासाहेब की शिवसेना की विरासत को आगे बढ़ाएगी?

आने वाले कुछ वर्ष उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी के लिए निर्णायक सिद्ध होंगे। आत्ममंथन, संगठनात्मक पुनर्निर्माण और जनता से नए सिरे से संवाद स्थापित करने की क्षमता क्या उद्धव ठाकरे, संजय राऊत और आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में है? क्या शिवसैनिकों का उन पर विश्वास कायम है? महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की शिवसेना किस स्वरूप में बनी रहती है या नेतृत्वहीनता के कारण समाप्त हो जाती है? इसी प्रश्न के उत्तर में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का भविष्य निहित होगा। वर्तमान समय में चल रहा मंथन और संघर्ष क्या उद्धव ठाकरे की शिवसेना के लिए पुनर्गठन का अवसर साबित हो सकता है? इसका भी उत्तर अंततः आने वाला समय ही देगा।

 

:-अमोल पेडणेकर

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