भारत को सदियों से सूर्य की प्रचुरता वाला देश माना जाता रहा है। यहां वर्ष के अधिकांश दिनों में भरपूर धूप उपलब्ध रहती है और भौगोलिक दृष्टि से भी देश का बड़ा हिस्सा ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहां सूर्य का प्रकाश पर्याप्त मात्रा में पहुंचता है। सामान्य धारणा यह रही है कि जिस देश में धूप इतनी अधिक हो, वहां विटामिन डी की कमी जैसी समस्या शायद ही देखने को मिले। लेकिन हाल के वर्षों में विभिन्न चिकित्सा अध्ययनों और स्वास्थ्य सर्वेक्षणों ने एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है जिसने विशेषज्ञों के साथ-साथ आम लोगों को भी चिंतित कर दिया है।
अनेक शोधों में पाया गया है कि भारत की बड़ी आबादी, कुछ अध्ययनों के अनुसार 70 से 90 प्रतिशत तक लोग, विटामिन डी की कमी या अपर्याप्तता से जूझ रहे हैं। यह स्थिति इसलिए और भी हैरान करने वाली है क्योंकि विटामिन डी का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत सूर्य का प्रकाश है और भारत में इसकी कोई कमी नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर धूप से भरपूर देश में रहने वाले लोगों के शरीर में विटामिन डी का स्तर लगातार क्यों घट रहा है और इसके पीछे कौन-कौन से कारण जिम्मेदार हैं।
विटामिन डी को अक्सर केवल हड्डियों की मजबूती से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वास्तव में इसकी भूमिका इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह शरीर में कैल्शियम और फॉस्फोरस के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे हड्डियां और दांत मजबूत रहते हैं। इसके अलावा यह मांसपेशियों के कार्य, प्रतिरक्षा प्रणाली, हार्मोनल संतुलन और शरीर की अनेक जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
पिछले कुछ वर्षों में हुए शोधों ने यह भी संकेत दिया है कि विटामिन डी का पर्याप्त स्तर हृदय स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और संक्रमणों से बचाव में भी सहायक हो सकता है। इसलिए जब किसी व्यक्ति के शरीर में इसकी कमी होती है तो उसका प्रभाव केवल हड्डियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि संपूर्ण स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में विटामिन डी की कमी का सबसे बड़ा कारण बदलती जीवनशैली है। कुछ दशक पहले तक अधिकांश लोग खुले वातावरण में अधिक समय बिताते थे। खेतों में काम करने वाले किसान, निर्माण कार्य से जुड़े मजदूर, छोटे व्यवसायी और बच्चे दिन का बड़ा हिस्सा बाहर गुजारते थे। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली ने लोगों को घरों और कार्यालयों के भीतर सीमित कर दिया है।
आज लाखों लोग सुबह घर से निकलकर सीधे कार्यालय पहुंचते हैं और शाम को वापस लौटते हैं। दिन के अधिकांश घंटे वातानुकूलित कमरों, बंद इमारतों और कृत्रिम रोशनी वाले वातावरण में बीताते हैं। ऐसे में सूर्य की किरणों के संपर्क में आने का अवसर बहुत कम रह जाता है। यही कारण है कि धूप की उपलब्धता होने के बावजूद शरीर को उससे पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता।
शहरी जीवनशैली के साथ-साथ तकनीक पर बढ़ती निर्भरता ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। आज का युवा वर्ग मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य डिजिटल उपकरणों के साथ घंटों बिताता है। बच्चों के खेल के मैदान अब धीरे-धीरे मोबाइल स्क्रीन और वीडियो गेम में बदलते जा रहे हैं। पहले जहां बच्चे स्कूल के बाद बाहर खेलते थे, वहीं अब उनका बड़ा हिस्सा घर के भीतर बीतता है। इससे न केवल शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं बल्कि धूप के संपर्क में आने का समय भी घटा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव आने वाली पीढ़ियों में विटामिन डी की कमी को और गंभीर बना सकता है।
धूप की उपलब्धता और विटामिन डी के बीच संबंध को लेकर भी कई गलतफहमियां मौजूद हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि सुबह कुछ मिनट धूप में बैठना पर्याप्त है, लेकिन वास्तविकता इतनी सरल नहीं है। विटामिन डी का निर्माण तब होता है जब सूर्य की पराबैंगनी-बी अर्थात यूवी-बी किरणें त्वचा पर पड़ती हैं। यदि व्यक्ति पूरी तरह ढके हुए कपड़े पहने हुए हैं, छाते का उपयोग कर रहा है या अधिकतर समय छाया में रहता है, तो धूप मिलने के बावजूद विटामिन डी का निर्माण सीमित हो सकता है। इसके अलावा दिन के अलग-अलग समय पर सूर्य की किरणों की तीव्रता भी अलग होती है। इसलिए केवल धूप में मौजूद रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि शरीर को कितनी मात्रा में प्रभावी सूर्य प्रकाश मिल रहा है।
भारतीय आबादी की त्वचा की बनावट भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीयों की त्वचा में मेलेनिन नामक रंगद्रव्य की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। मेलेनिन त्वचा को सूर्य की हानिकारक किरणों से सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन इसके कारण विटामिन डी बनने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी हो सकती है।
इसका अर्थ यह है कि जिन लोगों की त्वचा में मेलेनिन अधिक होता है, उन्हें समान मात्रा में विटामिन डी बनाने के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय तक धूप में रहना पड़ सकता है। यह कोई बीमारी नहीं है, बल्कि जैविक विशेषता है, लेकिन भारतीय परिस्थितियों में यह विटामिन डी की कमी के जोखिम को बढ़ाने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन जाता है।
वायु प्रदूषण भी इस समस्या के पीछे एक बड़ा कारण माना जा रहा है। देश के अनेक महानगर और बड़े शहर प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि वातावरण में मौजूद धूल, धुआं और प्रदूषक तत्व सूर्य की कुछ किरणों को पृथ्वी तक पहुंचने से पहले ही अवरुद्ध कर सकते हैं। विशेष रूप से यूवी-बी किरणों पर इसका प्रभाव पड़ता है, जो विटामिन डी निर्माण के लिए आवश्यक होती हैं।
परिणामस्वरूप, धूप दिखाई देने के बावजूद शरीर को उतनी प्रभावी किरणें नहीं मिल पातीं जितनी मिलनी चाहिए। यह समस्या विशेष रूप से उन शहरों में अधिक गंभीर हो सकती है जहां प्रदूषण का स्तर लगातार ऊंचा बना रहता है।

खानपान की बदलती आदतें भी चिंता का विषय हैं। भारत में पारंपरिक रूप से विटामिन डी से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रहा है। मछली, अंडे की जर्दी, कुछ प्रकार के मशरूम और फोर्टिफाइड खाद्य पदार्थ विटामिन डी के अच्छे स्रोत माने जाते हैं, लेकिन ये सभी लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा नहीं होते। बड़ी संख्या में लोग शाकाहारी हैं और उनके भोजन में प्राकृतिक रूप से विटामिन डी की मात्रा कम होती है। इसके अलावा फास्ट फूड और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की बढ़ती लोकप्रियता ने भी संतुलित पोषण को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप शरीर को भोजन से भी पर्याप्त विटामिन डी नहीं मिल पाता।
महिलाओं में विटामिन डी की कमी अपेक्षाकृत अधिक देखी गई है। इसके पीछे सामाजिक और सांस्कृतिक कारण भी हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं घर के भीतर अधिक समय बिताती हैं और बाहर निकलने पर भी शरीर को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहनती हैं। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं। यदि इस दौरान पर्याप्त विटामिन डी न मिले तो कमी और अधिक गंभीर हो सकती है। महिलाओं में यह समस्या भविष्य में हड्डियों के कमजोर होने और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी स्थितियों का कारण बन सकती है।
बच्चों और किशोरों में भी विटामिन डी की कमी तेजी से बढ़ रही है। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि यही वह आयु होती है जब शरीर और हड्डियों का विकास सबसे तेजी से होता है। यदि इस चरण में पर्याप्त विटामिन डी उपलब्ध न हो तो हड्डियों की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, कोचिंग संस्कृति और डिजिटल मनोरंजन के कारण बच्चों का बाहरी गतिविधियों में समय कम हो गया है। स्कूल से लौटने के बाद भी कई बच्चे लंबे समय तक पढ़ाई या स्क्रीन के सामने बिताते हैं, जिससे धूप के संपर्क में आने का अवसर सीमित हो जाता है।
वृद्ध लोगों में भी यह समस्या व्यापक रूप से देखी जाती है। उम्र बढ़ने के साथ त्वचा की विटामिन डी बनाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है। साथ ही बुजुर्गों की शारीरिक गतिविधियां भी घट जाती हैं और वे अपेक्षाकृत कम समय बाहर बिताते हैं। कई बुजुर्गों को पहले से हड्डियों या जोड़ों से जुड़ी समस्याएं होती हैं, ऐसे में विटामिन डी की कमी उनकी स्थिति को और जटिल बना सकती है।
विटामिन डी की कमी के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे विकसित होते हैं और कई बार लोग उन्हें सामान्य थकान या उम्र बढ़ने का हिस्सा मान लेते हैं। लगातार कमजोरी महसूस होना, शरीर में दर्द रहना, मांसपेशियों में खिंचाव, पीठ दर्द, सीढ़ियां चढ़ने में कठिनाई, जल्दी थक जाना और बार-बार बीमार पड़ना इसके सामान्य संकेत हो सकते हैं। कुछ मामलों में व्यक्ति को लंबे समय तक यह पता ही नहीं चलता कि उसके शरीर में विटामिन डी की कमी है। यही कारण है कि चिकित्सक जोखिम वाले लोगों को समय-समय पर जांच कराने की सलाह देते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में कोविड महामारी के दौरान भी विटामिन डी पर व्यापक चर्चा हुई थी। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय अभी भी इसके सभी पहलुओं पर शोध कर रहा है, लेकिन इस अवधि में लोगों का ध्यान प्रतिरक्षा प्रणाली और पोषण संबंधी आवश्यकताओं की ओर अधिक गया। इसके बाद विटामिन डी की जांच और सप्लीमेंट के प्रति जागरूकता बढ़ी, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सप्लीमेंट पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। संतुलित जीवनशैली, पर्याप्त धूप और स्वस्थ भोजन को प्राथमिकता देना अधिक महत्वपूर्ण है।
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि विटामिन डी की कमी और अधिकता दोनों ही स्वास्थ्य के लिए समस्याएं पैदा कर सकती हैं। कई लोग बिना चिकित्सकीय सलाह के सप्लीमेंट लेना शुरू कर देते हैं, जो उचित नहीं माना जाता। शरीर में विटामिन डी का अत्यधिक स्तर भी नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए किसी भी प्रकार की दवा या सप्लीमेंट लेने से पहले चिकित्सकीय परामर्श और आवश्यकता पड़ने पर रक्त जांच कराना बेहतर होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं, बल्कि सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी खोजा जाना चाहिए। स्कूलों में बच्चों को अधिक बाहरी गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना, शहरी क्षेत्रों में खुले स्थानों और पार्कों की उपलब्धता बढ़ाना, पोषण संबंधी जागरूकता फैलाना और खाद्य पदार्थों के फोर्टिफिकेशन को बढ़ावा देना कुछ ऐसे कदम हैं जो व्यापक स्तर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। कई देशों में दूध और अन्य खाद्य पदार्थों में विटामिन डी मिलाकर सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारने के प्रयास किए गए हैं। भारत में भी इस दिशा में पहलें की जा रही हैं, लेकिन अभी जागरूकता और पहुंच दोनों बढ़ाने की आवश्यकता है।
भारत में विटामिन डी की कमी का बढ़ना एक ऐसा विरोधाभास है जो पहली नजर में समझ से परे लगता है। एक ओर देश में भरपूर धूप उपलब्ध है, दूसरी ओर बड़ी आबादी इसकी कमी से जूझ रही है। लेकिन जब हम आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, प्रदूषण, बदलती खानपान आदतों, सीमित बाहरी गतिविधियों और जैविक कारकों को एक साथ देखते हैं तो यह तस्वीर स्पष्ट होने लगती है। समस्या धूप की अनुपलब्धता की नहीं, बल्कि धूप और स्वस्थ जीवनशैली से बढ़ती दूरी की है। यही दूरी धीरे-धीरे एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती का रूप ले रही है।
यदि समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में हड्डियों की बीमारियों, मांसपेशियों की कमजोरी और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ बढ़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि लोग अपने दैनिक जीवन में ऐसे बदलाव करें जो उन्हें प्राकृतिक सूर्य प्रकाश, संतुलित पोषण और सक्रिय जीवनशैली के करीब ले जाएं।

विटामिन डी की कमी कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान असंभव हो, लेकिन इसके लिए जागरूकता, वैज्ञानिक समझ और नियमित स्वास्थ्य देखभाल आवश्यक है। धूप से भरपूर देश में रहने के बावजूद यदि शरीर को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है, तो यह संकेत है कि हमें अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यही इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी है कि केवल संसाधनों की उपलब्धता पर्याप्त नहीं होती, उनका सही उपयोग भी उतना ही जरूरी है।
– डॉ. दीपक कोहली

