हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
पाँच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के साथ संवेदनाएँ भी चाहिए

पाँच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के साथ संवेदनाएँ भी चाहिए

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, सामाजिक
0

हर सुबह जब मैं कार्यालय के लिए घर से निकलता हूँ, तो मेरी पत्नी मुझे केवल “जल्दी आना” कहकर विदा नहीं करती। वह कम से कम तीन-चार बार एक ही बात दोहराती है “रास्ते में किसी से लड़ना मत, ट्रेन में किसी से उलझना मत, कोई कुछ भी कहे तो शांत रहना, पलटकर जवाब मत देना।”

कुछ वर्ष पहले तक यह सामान्य पारिवारिक सलाह नहीं थी क्योंकि आज महानगर में घट रही हिंसक घटनाओं ने इसे लगभग हर परिवार की चिंता बना दिया है। अब घर से निकलते समय दुर्घटना का नहीं, बल्कि किसी अनजान व्यक्ति के अचानक हिंसक हो जाने का भय मन में घर करने लगा है। कभी सड़क पर मामूली विवाद, कभी लोकल ट्रेन में सीट या दरवाज़े को लेकर कहासुनी, कभी भाषा के नाम पर तनाव और कभी क्षणिक आवेश में हत्या जैसी घटनाएँ समाज के भीतर एक गहरे असुरक्षा-बोध को जन्म दे रही हैं।

How India Generates Revenue: Key Sectors and Exports

मेरी पत्नी की ये बातें केवल एक पत्नी की चिंता नहीं हैं; वे आज लाखों भारतीय परिवारों की सामूहिक मनःस्थिति का प्रतिबिंब हैं। हर शाम घर लौटने तक कहीं न कहीं यह प्रश्न मन में बना रहता है, क्या आज का समाज अपने हिंसक स्वभाव के बीच हमें सुरक्षित घर लौटने देगा?
यही प्रश्न हमें एक बड़े राष्ट्रीय प्रश्न के सामने खड़ा करता है।

भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है। नई सड़कें बन रही हैं, मेट्रो नेटवर्क फैल रहा है, गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो रही हैं, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार हो रहा है। लेकिन इसी विकास यात्रा के समानांतर एक और तस्वीर उभर रही है, समाज के भीतर विशेष कर युवाओं में बढ़ती हिंसा, असहिष्णुता और अविश्वास की। प्रश्न यह है कि यदि भारत के मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में इमारतें ऊँची हो रही हैं, लेकिन मनुष्य का मन छोटा होता जा रहा है, मनुष्य का मन मनोविकार से विकृत होता जा रहा है। तो क्या केवल आर्थिक विकास ही विकसित भारत का आधार बन सकता है?

He planned her b'day, she planned his murder? On June 18 ...

पिछले कुछ महीनों में देश ने अनेक ऐसी घटनाएँ देखी हैं, जिन्होंने पूरे समाज को झकझोर दिया। पुणे में विवाह तय होने के बाद एक युवती द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिलकर मंगेतर की हत्या करने का आरोप हो या मुंबई की लोकल ट्रेन में मामूली विवाद के बाद एक युवक की चाकू मारकर हत्या। परिवार के लोगों ने तय की हुई शादी पसंद ना होने पर दूल्हे की हत्या कर देना। इन घटनाओं में व्यक्तियों का नाम लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस प्रकार की हिंसक घटना कुछ महीनो से आए दिन अलग-अलग शहरों में अलग-अलग नाम के व्यक्तियों द्वारा हो रही है। ये घटनाएँ केवल आपराधिक घटनाएँ नहीं हैं। ये समाज की अस्वस्थ मानसिक अवस्था का संकेत हैं।

आज सबसे बड़ा प्रश्न अपराध नहीं, बल्कि अपराध करने वाले की मानसिकता है। आखिर ऐसा क्या बदल गया कि ट्रेन और सड़कों पर होने वाले मामूली मतभेद भी हत्या तक पहुँचने लगे? किसी से शादी हो रही है और वह पसंद नहीं है तो सीधे तौर पर आप ना पसंद दर्ज कर सकते हैं। सामाजिक रिश्तों में विश्वास इतना कमजोर क्यों हो गया? युवा पीढ़ी के भीतर धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम क्यों घटता जा रहा है?

This Indian city has been named among the World's 50 best cities in 2025 |  GQ India

हमारे शहरों का विस्तार हुआ है, लेकिन सामाजिक जीवन सिकुड़ गया है। हर साल मुंबई जैसे देश के प्रमुख शहरों में हजारों गगन को छुती इमारते निर्माण हो रही है। वैसे झुग्गी झोपड़ियां का भी विस्तार हो रहा है। हजारों लोग मुंबई और देश के अन्य महानगरों में आ रहे हैं। अपना बसेरा बसा रहे हैं। वे रोजगार के लिए आते हैं, लेकिन साथ ही अकेलापन, तनाव, प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा भी लेकर आते हैं। बगल में रहने वाले पड़ोसियों का नाम तक नहीं पता होता है, परिवारों में आपसी संवाद कम हो गया है और जीवन मोबाइल की स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है।

Empowering India's Youth: The Key to a Stronger Future – Aam Janmat Party

युवाओं का एक बड़ा वर्ग आज आभासी दुनिया में जी रहा है। सोशल मीडिया ने त्वरित प्रतिक्रिया, त्वरित सफलता और त्वरित संतुष्टि की आदत विकसित कर दी है। जब वास्तविक जीवन में इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं, तब निराशा, क्रोध और हिंसा जन्म लेने लगते हैं। भावनाओं पर नियंत्रण की क्षमता कमजोर होती जा रही है। छोटी-सी असहमति, राह चलते-चलते होने वाली छोटी सी अनबन और शादी की ना पसंद भी आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाती है।

आज सफलता की परिभाषा बदल गई है। व्यक्ति के चरित्र से अधिक उसकी आय, पद और प्रदर्शन को महत्व दिया जा रहा है। परिणामस्वरूप भावनात्मक परिपक्वता और नैतिक शिक्षा पीछे छूटती जा रही है। परिवारों में भी परिवर्तन आया है। पहले बच्चों को केवल शिक्षा नहीं, बल्कि संस्कार, संयम और सामाजिक उत्तरदायित्व का अभ्यास मिलता था। आस पड़ोस में, समाज के उत्सव और समारोह में आत्मीय भाव से सम्मिलित होना होता था। आज माता-पिता आर्थिक सफलता की दौड़ में व्यस्त हैं। बच्चों के साथ बिताया जाने वाला समय लगातार घट रहा है, ऐसे में पड़ोसी के साथ उठने बैठने का सवाल ही नहीं आता। विद्यालय ज्ञान दे रहे हैं, लेकिन युवाओं के चरित्र निर्माण का दायित्व कहीं पीछे छूट गया है।

बच्चों को प्रतियोगिता जीतना सिखाया जा रहा है, पर हार को स्वीकार करना नहीं। उन्हें अधिकारों का ज्ञान कराया जा रहा है, लेकिन कर्तव्यों और उत्तरदायित्व का अभ्यास कम कराया जा रहा है।
एक और चिंता का विषय समाज में बढ़ता अविश्वास है। आज लोगों के मन में यह प्रश्न उठने लगा है, क्या जिस व्यक्ति से मैं विवाह करने जा रहा हूँ, वह विश्वास के योग्य है? क्या इस शहर के भीड़ में मैं सुरक्षित हूँ? क्या ट्रेन में मामूली विवाद मेरी जान ले सकता है? क्या भाषा, जाति या क्षेत्र के आधार पर मेरे साथ हिंसा हो सकती है? यह भय किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे समाज का मनोविज्ञान बदल देता है। जब विश्वास कमजोर होता है, तब समाज केवल व्यक्तियों का समूह रह जाता है, समुदाय नहीं।

मुंबई जैसे महानगर, जिन्हें कभी अवसर और सहअस्तित्व की पहचान माना जाता था, वहाँ भी भाषाई तनाव, क्षेत्रीय कटुता और भीड़ की आक्रामक मानसिकता समय-समय पर सामने आती है। यदि किसी व्यक्ति को स्थानीय भाषा नहीं आती, तो उसके साथ अपमानजनक व्यवहार या शारीरिक हिंसा किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है। भारत की शक्ति उसकी विविधता रही है, विभाजन नहीं।

Man Stabbed To Death In Moving Mumbai Local Train After Row Over Closing  Door

यह भी समझना होगा कि केवल कानून व्यवस्था इस समस्या का समाधान नहीं कर सकती। पुलिस अपराध रोक सकती है, लेकिन हिंसक मानसिकता का उपचार नहीं कर सकती। न्यायालय सज़ा दे सकते हैं, लेकिन समाज में विश्वास पैदा नहीं कर सकते। यहीं सामाजिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक नेतृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। आज आवश्यकता केवल धार्मिक आयोजनों की नहीं, बल्कि ऐसे सामाजिक प्रयासों की है जो युवाओं में आत्मसंयम, सेवा, संवाद, सहिष्णुता और राष्ट्रबोध का निर्माण करें। शैक्षणिक संस्थाओं को युवाओं को केवल करियर नहीं, जीवन जीने की कला भी सिखानी होगी। उन्हें यह समझाना होगा कि शक्ति का अर्थ आक्रामकता नहीं, बल्कि आत्मनियंत्रण है।

Watch: All-Out Brawl Between Women In Mumbai Local, Woman Cop Injured Too

विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संगठनों को मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास, परिवार संवाद, नशामुक्ति, खेल, योग, ध्यान और सेवा कार्यों को जीवन का नियमित हिस्सा बनाना होगा। सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व से जुड़ा युवा सामान्यतः समाज को तोड़ने के बजाय जोड़ने की दिशा में सोचता है।
विकसित भारत का सपना केवल पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से पूरा नहीं होगा। उसके लिए पाँच ट्रिलियन संवेदनाएँ भी चाहिएँ। यदि तकनीक आगे बढ़े और मनुष्य पीछे छूट जाए, तो विकास अधूरा रहेगा।

आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक है। हमें ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो तकनीक में दक्ष हों, लेकिन संवेदनशील भी हों; जो प्रतिस्पर्धी हों, लेकिन करुणामय भी हों; जो सफल हों, लेकिन चरित्रवान भी हों।
यदि समाज इस चेतावनी को समय रहते नहीं समझता, तो आने वाले वर्षों में महानगर आर्थिक रूप से समृद्ध अवश्य दिखाई देंगे, लेकिन भीतर से भय, अविश्वास और हिंसा से ग्रस्त समाज में बदल सकते हैं। विकसित भारत की यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है, क्या हम केवल आधुनिक, विकसित, स्मार्ट शहर बना रहे हैं या आधुनिक और संस्कारित नागरिक भी तैयार कर रहे हैं? क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी गगन को छुती इमारतों एवं स्मार्ट सिटी के साथ उसके युवाओं के चरित्र से तय होता है।

– अमोल पेडणेकर

 

 

#5TrillionEconomy #HumanSensitivities #DevelopedIndia2047 #SocialPsychology #MentalHealthAwareness #FamilyValues #CharacterBuilding #UrbanizationChallenges #CivicSense #ThoughtProvoking

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp

अमोल पेडणेकर

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0