पूरे महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों में स्मार्ट बिजली मीटरों का अनिवार्य रूप से लगाया जाना एक गंभीर विवाद बन गया है। उपभोक्ता यह शिकायत कर रहे हैं कि बिना उनकी सहमति के लगाए गए इन नए मीटरों के कारण उनके बिजली बिल अचानक दोगुने से अधिक हो गए हैं, जिससे आम जनता में व्यापक आक्रोश व्याप्त है।
मुंबई-महाराष्ट्र में बढ़ा आक्रोश
महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड (MSEDCL) द्वारा लगाए जा रहे नए टाइम-ऑफ-डे (ToD) स्मार्ट मीटरों ने उपभोक्ताओं में तनाव पैदा कर दिया है। पुणे में अकेले 4 लाख से अधिक ऐसे मीटर लगाए जा चुके हैं और कई क्षेत्रों में बिना पूर्व सूचना के ये मीटर स्थापित कर दिए गए। इसी तरह पालघर जिला के विरार में भी ऐसा ही मामला आया है। यहाँ के म्हाडा कोलोनी में भी बिना सोसायटी के परमिशन बिजली विभाग ने नए स्मार्ट मीटर लगा दिए। पता तब चला जब सभी के लाईट बिल अत्यधिक बढ़ कर आए। एक बुजुर्ग महिला ने बताया कि वे अपने गाँव गए थे और पूरा महिना घर बंद ही पड़ा था और जब घर आए तब लाईट बिल देखकर चौक गए। उस लाईट बिल में लगभग 700 रु. आया था।

एक उपभोक्ता अमोल जोशी ने बताया, “हमें बिना बताए ही नया मीटर लगा दिया गया। हमें लगा कि नए मीटर से बिल कम होगा, लेकिन अचानक बिल दोगुना आ गया”। पुणे के केशवनगर, सहकारनगर, पार्वती-भेकरई नगर, फुरसुंगी और उरुळी देवाची क्षेत्रों में बिल पहले के ₹700-₹2,000 से बढ़कर ₹5,000-₹8,000 तक पहुंच गए हैं। नए स्मार्ट मीटर में बहुत बड़ा स्कैम होने की संभावना जताई जा रही है।
गोवा में भी विरोध
गोवा में भी स्मार्ट मीटर विवाद ने जोर पकड़ा है। गोवा सरकार द्वारा तेजी से किए जा रहे स्मार्ट मीटरों के अनिवार्य रोलआउट का सविनय नागरिक समूहों ने विरोध किया है। उनका कहना है कि बिना पर्याप्त सलाह-मशविरा, पारदर्शिता या सुरक्षा उपायों के यह कार्यक्रम लागू किया जा रहा है। गौरतलब है कि गोवा में 7.5 लाख स्मार्ट मीटरों के लिए ₹899 करोड़ का अनुबंध दिया गया है।
बंद घरों को भी बिल
सबसे चौंकाने वाला मामला मुंबई के माटुंगा का है, जहां एक निवासी आशीष अजमेरा को उनके बंद फ्लैट का ₹8,500 का बिल आया। उन्होंने कहा, “पहला बिल ₹1,200 था, जो समझ में आता था क्योंकि फ्लैट खाली था। लेकिन अगले महीने ₹8,500 का बिल आ गया। न कोई एसी, न फ्रिज, न पंखा, बस बुनियादी वायरिंग का काम चल रहा था”।
मुंबई के बोरीवली में एक अन्य उपभोक्ता को दो महीने बाद पता चला कि उनका मीटर बदल दिया गया है। उन्होंने कहा, “मार्च तक ₹2,000 तक बिल आते थे, अप्रैल में ₹6,000 आ गया। मुझे तकनीकी रूप से मीटर बदलने के बारे में बताया तक नहीं गया”।

नियमों की अनदेखी
विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) के अनुसार उपभोक्ताओं को अपना मीटर चुनने का कानूनी अधिकार है। फिर भी, जबरन मीटर बदले जा रहे हैं। फुरसुंगी के निवासी संजय गिरधर का सवाल है, “अगर सिस्टम ही भ्रष्ट है, तो उपभोक्ताओं को न्याय कहां से मिलेगा?”
अन्य राज्यों में भी शिकायतें

उत्तर प्रदेश
नोएडा के सेक्टर 34 में स्मार्ट मीटर लगने के बाद कई परिवारों को असामान्य रूप से उच्च बिल मिले हैं। फेडरेशन ऑफ नोएडा रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (FONRWA) ने चेतावनी दी है कि जब तक बिलिंग पारदर्शिता और उपभोक्ता विश्वास सुनिश्चित नहीं किया जाता, स्मार्ट मीटर प्रतिरोध का केंद्र बने रहेंगे।
त्रिपुरा
त्रिपुरा राज्य विद्युत निगम लिमिटेड (TSECL) ने स्मार्ट मीटरों से जुड़ी धोखाधड़ी की शिकायतों के बाद राज्यव्यापी जांच शुरू की है। एक मामले में खोवाई जिले के एक उपभोक्ता को स्मार्ट मीटर लगने के बाद ₹82,000 का बिजली बिल आया। बिजली मंत्री रतन लाल नाथ ने कहा कि दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश में भी स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिल अचानक बढ़ गए हैं। एक दुकानदार का बिल ₹2,000-₹2,500 से बढ़कर ₹4,000-₹5,000 हो गया है। एक रेस्तरां मालिक का बिल ₹10,000-₹25,000 की सीमा को पार कर गया है ।
विरोध और कानूनी कार्रवाई
महाराष्ट्र के कई शहरों में इस अनिवार्य स्मार्ट मीटर लगाए जाने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। पिछले साल नागपुर कोर्ट में एक पीआईएल दायर की गई थी, जिसमें कहा गया था कि स्मार्ट मीटर लगाने का निर्णय अनिवार्य नहीं हो सकता, क्योंकि मीटर चुनने का विकल्प उपभोक्ताओं के पास है।
एनसीपी (एससीपी) नेता जयंत पाटील ने मुख्य मंत्री देवेंद्र फडणवीस को ज्ञापन सौंपकर स्मार्ट मीटर परियोजना पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है।
बढ़े बिलों के कारण
बिजली कंपनियों का दावा है कि पुराने मीटर खराब थे और कम उपयोग दिखाते थे, जबकि नए स्मार्ट मीटर सटीक रीडिंग देते हैं। बिहार में स्मार्ट मीटरों का उपयोग बिजली चोरी पकड़ने के लिए किया गया, जिससे ₹1.46 करोड़ का अतिरिक्त बिलिंग हुआ। विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट मीटर के माध्यम से वास्तविक खपत का पता चलता है और मानवीय त्रुटि समाप्त होती है, लेकिन उपभोक्ताओं के अनुभव अलग हैं।
निष्कर्षतः स्मार्ट मीटरों का अनिवार्य और बिना सहमति के किया जा रहा यह अभियान न केवल नियमों की अनदेखी है, बल्कि आम जनता पर आर्थिक बोझ भी डाल रहा है। जब तक पारदर्शिता और उचित नियामकीय निगरानी सुनिश्चित नहीं की जाती, यह विवाद और गहराता रहेगा।
– मुकेश गुप्ता
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