शिक्षा में भ्रष्टाचार-व्यापार और अपराध-उद्योग जैसी कमियां यदि समय रहते नहीं सुधारी गई तो मौकापरस्त राजनीति करनेवाले इसका लाभ उठाकर देश का वातावरण बिगाड़ सकते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी सहित राहुल गांधी द्वारा छात्र आंदोलन की आड़ में युवाओं को भड़काना इसी का उदाहरण है।
देश में इस समय सबसे असुरक्षित चीज यदि कोई है तो वह प्रश्नपत्र नहीं, निष्ठावान छात्र का भविष्य है क्योंकि प्रश्नपत्र तो लीक होकर भी कहीं न कहीं पहुंच ही जाता है, पर परिश्रम कई बार मंजिल तक नहीं पहुंच पाती। नीट हो, यूजीसी-नेट हो या विभिन्न राज्यों की भर्ती परीक्षाएं, हर नए पेपर लीक के साथ केवल एक परीक्षा रद्द नहीं होती, लाखों युवाओं का विश्वास भी रद्द हो जाता है।
प्रतियोगी परीक्षाएं नौकरी या प्रवेश का माध्यम नहीं हैं। छोटे शहरों, गांवों और निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यही सामाजिक परिवर्तन का सबसे बड़ा रास्ता हैं। यही कारण है कि जब कोई पेपर लीक होता है तो हानि मात्र परीक्षा की नहीं होती, उस विश्वास की होती है जिस पर पूरी चयन प्रक्रिया खड़ी होती है।
विश्वास के संकट में फंसी परीक्षा व्यवस्था
देश ने पिछले कुछ वर्षों से भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े विवादों की लम्बी सूची देखी है। कभी पेपर लीक, कभी परीक्षा रद्द, कभी परिणामों पर प्रश्न तो कभी मूल्यांकन प्रक्रिया पर विवाद। इससे छात्रों के मन में यह धारणा मजबूत हुई है कि परीक्षा प्रणाली उनसे जितनी निष्ठा चाहती है, उतनी स्वयं नहीं दिखा पा रही। सबसे बड़ी चिंता यह है कि अब पेपर लीक कोई अपवाद नहीं रहा। यह एक पैटर्न बनता जा रहा है। हर बार गिरफ्तारियां होती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, आश्वासन दिए जाते हैं और फिर अगली परीक्षा किसी नए विवाद के साथ सामने आ जाती है। ऐसा लगता है मानो व्यवस्था बीमारी का नहीं, उसके लक्षणों का प्रबंधन कर रही हो।
एनटीए और उत्तरदायित्व का प्रश्न
राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) का गठन इसलिए किया गया था कि देश की प्रमुख परीक्षाएं अधिक पेशेवर, पारदर्शी और विश्वसनीय बन सकें, किंतु हाल के वर्षों में नीट और यूजीसी-नेट से जुड़े विवादों ने एजेंसी की कार्यप्रणाली पर गम्भीर प्रश्न खड़े किए हैं। जब करोड़ों युवाओं का भविष्य किसी संस्था के हाथ में हो तो मात्र परीक्षा आयोजित कर देना पर्याप्त नहीं होता। पारदर्शिता, तकनीकी दक्षता और उत्तरदायित्व भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। दुर्भाग्य से हमारे यहां उत्तरदायित्व की व्यवस्था प्राय: उतनी मजबूत दिखाई नहीं देती जितनी प्रवेश परीक्षा की निगरानी व्यवस्था होती है। एक छात्र एक प्रश्न गलत कर दे तो उसका चयन रुक सकता है, पर यदि पूरी व्यवस्था गलती कर दे तो जिम्मेदारी तय होने में वर्षों लग जाते हैं। यही असंतुलन युवाओं के भीतर अविश्वास पैदा करता है।
पेपर लीक : अपराध नहीं, उद्योग
पेपर लीक अब किसी एक व्यक्ति या एक कमरे में होने वाला षड्यंत्र नहीं रह गया है। यह कई जगहों पर संगठित आपराधिक नेटवर्क का रूप ले चुकी है। इसमें तकनीकी विशेषज्ञ, बिचौलिए, कोचिंग नेटवर्क, भ्रष्ट अधिकारी और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करने वाले गिरोह शामिल पाए गए हैं। व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, एन्क्रिप्टेड चैट, क्लाउड स्टोरेज और डिजिटल भुगतान प्रणालियों ने अपराधियों को नए उपकरण उपलब्ध कराए हैं। तकनीक ने शिक्षा को जितना आधुनिक बनाया है, अपराधियों को भी उतने ही ज्यादा अवसर दिए हैं। आज आवश्यकता पेपर लीक करने वालों को पकड़ने की नहीं बल्कि उस पूरे नेटवर्क को ध्वस्त करने की है, जो युवाओं के भविष्य का कारोबार कर रहा है।
ऑनलाइन और ऑफलाइन परीक्षा की चुनौतियां
कई लोग देश में ऑनलाइन परीक्षा को अंतिम समाधान मानते हैं, पर वास्तविकता इतनी सहज नहीं है। ऑनलाइन परीक्षा में साइबर हमले, सर्वर फेल होना, डेटा सुरक्षा और नकली उम्मीदवार जैसी चुनौतियां हैं। दूसरी ओर ऑफलाइन परीक्षा में प्रश्नपत्र की छपाई, परिवहन और वितरण प्रक्रिया सबसे कमजोर कड़ी बन जाती है। समस्या केवल माध्यम की नहीं, सुरक्षा संस्कृति की भी है। जब तक परीक्षा प्रणाली के प्रत्येक चरण को सुरक्षित नहीं बनाया जाएगा, तब तक माध्यम बदलने से चमत्कार नहीं होगा।
छात्र आंदोलन और राजनीतिक स्वार्थ
युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है। जब बार-बार परीक्षाएं विवादों में घिरेंगी तो विरोध भी होगा, परंतु यह भी उतना ही सच है कि कुछ राजनीतिक दल और वैचारिक समूह छात्र असंतोष को अपने राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग करने का प्रयास करते हैं। राहुल गांधी और कॉकरोच जनता पार्टी का छात्र आंदोलन के नाम पर युवाओं (जेन-जी) को भड़काना इसी षडयंत्र की ओर संकेत करता है।
छात्र नौकरी, निष्पक्ष परीक्षा और पारदर्शी व्यवस्था की मांग कर रहे होते हैं, पर कुछ लोग उनके आक्रोश में सत्ता परिवर्तन के अवसर तलाशने लगते हैं। दुनिया के कई देशों में छात्र आंदोलनों का उपयोग व्यापक राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए किया गया है। भारत के युवाओं को यह समझना होगा कि उनका संघर्ष परीक्षा सुधार के लिए है, किसी राजनीतिक प्रयोग का हिस्सा बनने के लिए नहीं। जागरूक नागरिक और जागरूक छात्र ही इस अंतर को समझ सकते हैं। व्यवस्था की आलोचना आवश्यक है, परंतु अराजकता कभी समाधान नहीं हो सकती।
सुधार की दिशा
परीक्षा प्रणाली के संकट का समाधान गिरफ्तारियों और जांच समितियों से नहीं निकलेगा। सबसे पहले प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक पूरी प्रक्रिया को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल ट्रैकिंग और मजबूत साइबर सुरक्षा जैसी व्यवस्थाओं का प्रभावी उपयोग समय की मांग है। इसके साथ ही उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित करना होगी। यदि छात्र की एक गलती उसके भविष्य को प्रभावित कर सकती है तो परीक्षा में गड़बड़ी होने पर सम्बंधित संस्थाओं और अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। पेपर लीक को साधारण अपराध नहीं, युवाओं के भविष्य के विरुद्ध संगठित अपराध मानकर कठोर दंड दिया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि परीक्षा प्रणाली में युवाओं का विश्वास लौटाया जाए।
भविष्य का सबसे बड़ा प्रश्न
भारत दुनिया की सबसे युवा जनसंख्या वाले देशों में से एक है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है, परंतु इसके लिए व्यवस्था पर विश्वास बनाए रहना आवश्यक है। यदि युवाओं को यह लगने लगे कि परिश्रम से अधिक शक्ति भ्रष्ट नेटवर्क की है तो यह मात्र शिक्षा का संकट नहीं रहेगा, लोकतांत्रिक विश्वास का संकट बन जाएगा। आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अगला पेपर कहां लीक होगा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि युवाओं का विश्वास कब तक लीक होता रहेगा। भारत का छात्र आज केवल परीक्षा नहीं दे रहा, वह व्यवस्था की विश्वसनीयता की भी परीक्षा ले रहा है। दुर्भाग्य यह है कि हर पेपर लीक के बाद छात्र फेल नहीं होते, व्यवस्था फेल होती है और जब व्यवस्था बार-बार फेल होने लगे तो सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं रह जाता कि प्रश्नपत्र किसने चुराया बल्कि यह हो जाता है कि युवाओं का विश्वास किसने चुराया।
-सोनम लववंशी

