सीमाओं की सुरक्षा वस्तुतः राष्ट्र की आत्मा की सुरक्षा है। यदि सीमाएं सुरक्षित हैं तो समाज सुरक्षित है, अर्थव्यवस्था सुरक्षित है और भविष्य सुरक्षित है। भारत की स्मार्ट बॉर्डर पहल इसी विश्वास को सशक्त करती है।
कहा जाता है कि सीमाओं की सुरक्षा मां के वस्त्रों के समान होती है। जिस प्रकार एक पुत्र अपनी माता के सम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास करता है, उसी प्रकार किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी सीमाएं केवल भौगोलिक रेखाएं नहीं होतीं बल्कि उसकी सम्प्रभुता, सुरक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की जीवंत अभिव्यक्ति होती हैं। भारत की सीमाएं अनेक प्रकार की भौगोलिक, सामरिक और सुरक्षा सम्बंधी चुनौतियों से घिरी हुई हैं।
बदलते वैश्विक परिदृश्य, तकनीक-संचालित अपराधों, ड्रोन आधारित तस्करी, मानव तस्करी और अवैध घुसपैठ जैसी नई चुनौतियों ने सीमा सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणाओं को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता उत्पन्न कर दी है। ऐसे समय में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘स्मार्ट बॉर्डर’ परियोजना भारत की सीमा सुरक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी परिवर्तन का संकेत देती है।
हाल ही में त्रिपुरा के लंकामुरा सीमा चौकी पर सीमा सुरक्षा बल के जवानों को सम्बोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि भारत अपनी सीमाओं को अभेद्य बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठा रहा है। उन्होंने घोषणा की कि देश की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर 7 से 8 स्थानों पर ‘स्मार्ट बॉर्डर’ की पायलट परियोजना प्रारम्भ की जाएगी, जिसके माध्यम से आधुनिक तकनीक, स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों के बीच एक समन्वित सुरक्षा तंत्र विकसित किया जाएगा। यह केवल एक नई योजना नहीं बल्कि सीमा प्रबंधन की उस सोच का विस्तार है जिसमें मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता को एक साथ जोड़कर सुरक्षा की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है।

भारत की सीमाएं केवल सैन्य चुनौतियों का सामना नहीं करतीं। पश्चिमी सीमा पर आतंकवाद और ड्रोन गतिविधियां हैं, तो पूर्वी सीमाओं पर अवैध घुसपैठ, मानव तस्करी, मादक पदार्थों की तस्करी और नकली मुद्रा के नेटवर्क जैसी समस्याएं लगातार सुरक्षा एजेंसियों के सामने चुनौती बनकर खड़ी रहती हैं। विशेष रूप से बांग्लादेश से लगती सीमाओं पर दशकों से घुसपैठ और तस्करी को लेकर चिंता व्यक्त की जाती रही है।
गृह मंत्री ने अपने सम्बोधन में यह स्पष्ट संदेश दिया कि देश किसी भी कीमत पर सीमा पार से होने वाली अवैध घुसपैठ को स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की किसी भी प्रयास को विफल करना केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
वास्तव में स्मार्ट बॉर्डर परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी बहुस्तरीय सुरक्षा अवधारणा है। गृह मंत्री ने इसे चतुर्भुज अथवा चार-आयामी सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बताया है, जिसमें सुरक्षा बलों की सतर्कता, स्थानीय प्रशासन का सहयोग, आधुनिक तकनीक का उपयोग और सीमावर्ती समाज की भागीदारी को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जाएगा।
लम्बे समय से यह अनुभव किया गया है कि केवल बाड़बंदी या सैनिक तैनाती से सीमा सुरक्षा की सभी चुनौतियों का समाधान सम्भव नहीं है। कई बार स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सूचनाएं और प्रशासनिक समन्वय सुरक्षा एजेंसियों को समय रहते कार्रवाई करने में सक्षम बनाते हैं। स्मार्ट बॉर्डर इसी सोच को तकनीकी शक्ति के साथ जोड़ने का प्रयास है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस परियोजना में सेंसर नेटवर्क, स्मार्ट फेंसिंग, ड्रोन निगरानी, उच्च क्षमता वाले कैमरे, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण प्रणाली और रीयल-टाइम डेटा संचार व्यवस्था जैसी आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग किया जा सकता है। ऐसी तकनीकें सीमा के किसी भी हिस्से में संदिग्ध गतिविधि की तत्काल पहचान कर सकती हैं तथा सुरक्षा बलों को त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती हैं।
वर्तमान समय में कई विकसित देश अपनी सीमाओं पर इसी प्रकार की तकनीक-संचालित निगरानी प्रणालियों का उपयोग कर रहे हैं। भारत भी अब उसी दिशा में तेजी से आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है, जहां सीमाओं की निगरानी केवल मानव संसाधन पर निर्भर न रहकर एक बुद्धिमान और एकीकृत सुरक्षा तंत्र के माध्यम से संचालित होगी।

त्रिपुरा का संदर्भ इस पूरी योजना को और अधिक प्रासंगिक बनाता है। बांग्लादेश से तीन ओर से घिरे इस राज्य की भौगोलिक स्थिति सीमा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है। गृह मंत्री ने बताया कि लगभग 650 किलोमीटर लम्बी सीमा बाड़ में से 119 किलोमीटर पुराने हिस्से को बदलने की मंजूरी दे दी गई है। यह बाड़ 15 वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी है और बदलती सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुरूप इसके आधुनिकीकरण की आवश्यकता महसूस की गई है। नई बाड़बंदी केवल भौतिक अवरोध नहीं होगी बल्कि उसे तकनीकी निगरानी उपकरणों के साथ एकीकृत किया जा सकता है, जिससे सुरक्षा बलों की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
असल में सीमा सुरक्षा को केवल युद्ध और सैन्य संकट तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। राष्ट्र की सुरक्षा का अर्थ यह भी है कि उसकी अर्थव्यवस्था, समाज और युवा पीढ़ी को उन संकटों से सुरक्षित रखा जाए जो सीमाओं के रास्ते देश में प्रवेश करते हैं। मादक पदार्थों की तस्करी आज केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं है बल्कि यह सामाजिक विघटन और राष्ट्रीय उत्पादकता पर सीधा आघात है। मानव तस्करी, हथियारों की तस्करी और नकली मुद्रा जैसे अपराध राष्ट्रीय सुरक्षा को भीतर से कमजोर करते हैं। यही कारण है कि केंद्र सरकार सीमा प्रबंधन को अब व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा अवधारणा के अंतर्गत देख रही है, जिसमें आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की चर्चा करते हुए भी गृह मंत्री ने सीमा सुरक्षा को मूल आधार बताया। किसी भी राष्ट्र का आर्थिक विकास तभी स्थाई और सुरक्षित रह सकता है जब उसकी सीमाएं सुरक्षित हों और अवैध गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सके। भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका, तेजी से विस्तार करती अर्थव्यवस्था और उभरती सामरिक शक्ति के दृष्टिगत यह आवश्यक हो गया है कि सीमा प्रबंधन भी उसी स्तर का आधुनिक और भविष्यदृष्टा हो। स्मार्ट बॉर्डर परियोजना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है। आने वाले वर्षों में यदि यह परियोजना अपने उद्देश्यों के अनुरूप सफल होती है तो भारत की सीमा सुरक्षा व्यवस्था विश्व की सर्वाधिक आधुनिक और प्रभावी व्यवस्थाओं में स्थान प्राप्त कर सकती है, तब वास्तव में यह कहा जा सकेगा कि राष्ट्रमाता के वस्त्रों की रक्षा के लिए भारत ने अपने समय के अनुरूप सबसे सक्षम और दूरदर्शी उपायों को अपनाया है।
–देवेंद्रराज सुथार

