श्री राम जन्मभूमि पर निर्मित भव्य मंदिर पीढ़ियों के संघर्ष और करोड़ों रामभक्तों के समर्पण, त्याग एवं बलिदान के कारण संपूर्ण हिन्दू समाज के लिए श्रद्धा, आस्था और भक्ति का केन्द्र बना है।
अयोध्या में श्री रामलला मंदिर में रखे हुए दान पात्रों में जमा राशि की चोरी की दुर्भाग्यपूर्ण घटना से समूचे समाज और राम भक्तों की भावना एवं श्रद्धा को आघात पहुँचा है तथा इस घटना से हम सभी आहत हैं।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के आग्रह पूर्वक निवेदन पर उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष जाँच दल का गठन कर उसकी अनुशंसा पर क़ानूनी प्रक्रिया प्रारंभ की है। जाँच में जो भी दोषी पाए जाएँगे उन्हें कठोर दंड हो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित संपूर्ण हिंदू समाज की न्यास से स्वाभाविक ही अपेक्षा है कि इस घोर निंदनीय घटना को असाधारण मान कर गंभीरता से व्यवस्था एवं संचालन की सभी कमियों को दूर करने हेतु परिणामकारक कदम उठाए ताकि अयोध्या मंदिर पर करोड़ों रामभक्तों की आस्था व श्रद्धा अखंड एवं अटूट बनी रहे।
वर्तमान भ्रम और असमंजस की स्थिति समाप्त होनी चाहिए। इस दृष्टि से हमारी अपेक्षा है कि सभी आवश्यक पहल मंदिर प्रबंधन और शासन द्वारा गठित विशेष जाँच दल करेंगे। हमारा यह विश्वास है कि समुचित वित्तीय प्रबंधन, सुचारू संचालन हेतु निर्दोष पारदर्शी व्यवस्थाओं एवं शुद्धता और पवित्रता से परिपूर्ण धार्मिकता से ओतप्रोत वातावरण के द्वारा श्री रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास हिन्दू समाज की आस्था एवं विश्वास को सुदृढ़ बनाये रखेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपूर्ण हिन्दू समाज से भी आह्वान करता है कि इस कठिन क्षण में वह आवश्यक धैर्य और संयम का परिचय दें तथा इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का लाभ उठाकर हिन्दू विरोधी, राष्ट्र विरोधी शक्तियों के हिंदू धर्म एवं समाज को बदनाम करने के षड्यंत्रों को विफल करे।


“दानपात्र में सेंध और श्रद्धा पर पहरा”
वाह रे देश!
यहाँ भगवान की रक्षा के लिए करोड़ों भक्त हैं, लेकिन भगवान के दानपात्र की रक्षा के लिए शायद कोई नहीं था।
चोर भी बड़े धार्मिक निकले। उन्हें पता था कि जहाँ सबसे अधिक आस्था होगी, वहीं सबसे अधिक नकद भी होगा। लगता है उन्होंने भी अर्थशास्त्र का वही सूत्र पढ़ा था “जहाँ विश्वास अधिक हो, वहाँ हिसाब-किताब कम पूछा जाता है।”
अब बयान आ रहे हैं जाँच होगी, दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, पारदर्शिता लाई जाएगी। यह सब सुनकर ऐसा लगता है जैसे चोरी अभी हुई हो, जबकि हमारे यहाँ हर घोटाले के बाद यही मंत्र पढ़ा जाता है। बयान बदल जाते हैं, शब्द वही रहते हैं।
श्रद्धा का अर्थ यह नहीं कि आँखें बंद कर ली जाएँ। श्रद्धा अगर विवेक खो दे तो वह आस्था नहीं, अंधविश्वास बन जाती है। मंदिर जितना पवित्र है, उसकी व्यवस्था भी उतनी ही पवित्र होनी चाहिए। भगवान को सोने का सिंहासन चढ़ाने से पहले ईमानदारी की चौकी भी मजबूत करनी होगी।
सबसे मज़ेदार बात यह है कि चोरी पर कम, बदनामी पर ज़्यादा चिंता दिखाई देती है। मानो अपराध इसलिए बड़ा नहीं कि चोरी हुई, बल्कि इसलिए कि लोगों को पता चल गया। यदि चोरी छिपी रहती तो शायद सब कुछ “पवित्र” ही माना जाता।
धर्म की सबसे बड़ी सेवा मंदिर की ऊँची दीवारें नहीं, बल्कि ऊँचा चरित्र है। दानपात्र में गिरी हर पाई किसी गरीब की मेहनत, किसी वृद्ध की पेंशन, किसी माँ की मन्नत और किसी बच्चे की गुल्लक से आई होती है। उस धन की चोरी केवल पैसे की चोरी नहीं, विश्वास की चोरी है।
इसलिए दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे दंड मिलना ही चाहिए। क्योंकि मंदिर पत्थरों से नहीं, विश्वास से बनते हैं; और विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे जोड़ने में सदियाँ लग जाती हैं।
राम का नाम लेने से पहले राम के आदर्शों को व्यवस्था में उतारना होगा। अन्यथा चोर दानपात्र लूटते रहेंगे और हम श्रद्धा बचाने के भाषण लिखते रहेंगे।