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सपनों का बाजार कोचिंग या कारोबार

सपनों का बाजार कोचिंग या कारोबार

by हिंदी विवेक
in जुलाई 2026, युवा
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चिंता का विषय कोचिंग संस्थानों का अस्तित्व नहीं बल्कि शिक्षा में घटती नैतिकता और बढ़ता बाजारवादी दृष्टिकोण है। अंततः शिक्षा को सपनों का बाजार नहीं बल्कि ज्ञान, चरित्र और नागरिक चेतना के निर्माण का माध्यम बनना चाहिए।

भारत के लाखों परिवारों के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं केवल परीक्षा नहीं बल्कि आशाओं, त्याग और संघर्ष की कहानी होती हैं। कोई जमीन बेचता है, कोई कर्ज लेता है तो कोई अपनी वर्षों की बचत दांव पर लगा देता है। उद्देश्य एक ही- बच्चे के हाथ में सफलता का वह टिकट आ जाए, जिस पर आईआईटी, एआईआईएमएस, यूपीएससी लिखा हो।

बच्चों की सफलता की आकांक्षा के साथ कोचिंग उद्योग भी तेजी से बढ़ा है और आज लगभग 58,000 करोड़ रुपये का विशाल बाजार बन चुका है। जो संस्थान कभी विद्यालयी शिक्षा के पूरक थे, वे अब समानांतर शिक्षा व्यवस्था का रूप ले चुके हैं। सीमित अवसर, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और शिक्षा व्यवस्था की कमियों ने इसे विस्तार दिया है। अवसरों और आकांक्षाओं के बीच बढ़ती खाई ऐसी परिस्थितियां निर्मित करती है, जिनका लाभ यह उद्योग उठाता है। मूल समस्या उस शिक्षा व्यवस्था में है, जो विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पर्याप्त रूप से तैयार नहीं कर पाती।

जब सफलता बिकने लगे : शोषण की पांच कड़ियां
कोचिंग उद्योग का यह विशाल कारोबार कई ऐसी कड़ियों का परिणाम है, जिन्होंने धीरे-धीरे शिक्षा को बाजार और लाभ की व्यवस्था में बदल दिया है।

पहली कड़ी: सपनों की चमकदार मार्केटिंग
शहरों की सड़कों पर लगे विशाल होर्डिंग, टॉपर्स की तस्वीरें, सैकड़ों चयनित अभ्यर्थियों के दावे और सफलता की आकर्षक कहानियां अभिभावकों और छात्रों को प्रभावित करती हैं। प्राय: एक ही सफल छात्र को कई कोचिंग संस्थान अपना विद्यार्थी बताकर प्रचार करते हैं। जब विज्ञापन वास्तविकता से अधिक भ्रम पैदा करने लगें, तब शिक्षा का उद्देश्य पीछे छूट जाता है और शोषण की शुरुआत हो जाती है।

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दूसरी कड़ी: छात्रवृत्ति के नाम पर मनोवैज्ञानिक जाल
’90 प्रतिशत तक स्कॉलरशिप’, ’विशेष चयन’ और ’मेधावी छात्र योजना’ जैसे आकर्षक नारों के माध्यम से छात्रों को विशेष होने का एहसास कराया जाता है, किंतु तथाकथित छूट के बाद भी फीस प्राय: लाखों रुपये तक पहुंच जाती है। छात्र स्वयं को चुना हुआ मानता है और अभिभावक भावनात्मक दबाव में निर्णय लेने को विवश हो जाते हैं।

तीसरी कड़ी: अग्रिम फीस और बंद रास्तों की व्यवस्था
कई संस्थान 1 या 2 वर्षों की फीस अग्रिम जमा करा लेते हैं। प्रवेश के समय बड़े वादे किए जाते हैं, पर कोर्स छोड़ने पर फीस वापसी आसान नहीं होती। ऐसे में जोखिम छात्र और अभिभावक का होता है, जबकि आर्थिक लाभ संस्थान का सुनिश्चित रहता है।

चौथी कड़ी: परिणाम की अंधी दौड़
जब सफलता ही सब कुछ बन जाए तो ज्ञान और मूल्यों का महत्व कम होने लगता है। पेपर लीक, नकल और परीक्षा अनियमितताओं की घटनाएं इस चिंता को बढ़ाती हैं और विद्यार्थियों में यह संदेश देती हैं कि किसी भी तरह परिणाम प्राप्त करना ही सबसे महत्वपूर्ण है।
पांचवीं और सबसे घातक कड़ी: विश्वास का

संस्थागत दुरुपयोग
जब कोई संस्थान छात्रों और अभिभावकों का विश्वास अर्जित करने के बाद अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं करता या अचानक संचालन बंद कर देता है तो सबसे अधिक हानि उन परिवारों को होती है, जिन्होंने अपने सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च किया होता है। आर्थिक शोषण, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण और जवाबदेही का अभाव एक गम्भीर विषय बन चुका है। इन कड़ियों को जोड़ने पर स्पष्ट होता है कि समस्या व्यवस्था की है, जहां शिक्षा और सपने धीरे-धीरे लाभ के उत्पाद में बदल जाते हैं।

गुरु से सेलिब्रिटी तक
भारतीय परम्परा में गुरु ज्ञान के साथ चरित्र और जीवन मूल्यों के मार्गदर्शक माने जाते थे, किंतु आज के डिजिटल युग में शिक्षक ज्ञानदाता से अधिक ब्रांड और सेलिब्रिटी के रूप में प्रस्तुत किए जाने लगे हैं। यह शिक्षा के बढ़ते वस्तुकरण का और प्रदर्शनकारी संस्कृति का परिणाम है, जहां ज्ञान की अपेक्षा दृश्यता, लोकप्रियता और ब्रांड मूल्य अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। चयनित विद्यार्थियों का प्रचारात्मक उपयोग शिक्षा के व्यवसायीकरण को दर्शाता है, जहां गुरु-शिष्य सम्बंध नैतिकता से हटकर लेन-देन तक सीमित होने लगता है।

नैतिक विमुखता और बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य
टॉपर्स-केंद्रित वातावरण और सफलता को ही मूल्य का मानक बना देने से अनेक छात्र स्वयं को कमतर समझने लगते हैं। निरंतर सामाजिक तुलना उनकी आत्मछवि, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को प्रभावित करती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2013 से 2023 के बीच छात्र आत्महत्याओं में लगभग 65 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि दर्ज हुई है। कोटा जैसी घटनाएं दर्शाती हैं कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, सफलता का दबाव और असफलता का भय अनेक युवाओं को तनाव, निराशा और मानसिक संकट की ओर धकेल रहे हैं। इससे भी गम्भीर समस्या नैतिक विमुखता की है। जब सफलता उत्पाद और छात्र की उपलब्धि विज्ञापन बन जाए, तब ज्ञान और निष्ठा की अपेक्षा रैंक व पैकेज अधिक महत्वपूर्ण लगने लगते हैं। यह बढ़ती प्रदर्शनकारी संस्कृति का संकेत है, जहां सीखने से अधिक परिणामों के प्रदर्शन को महत्व दिया जाता है।

कोचिंग उद्योग का अपराधीकरण

कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने चिंताजनक रूप धारण किया है। जून 2026 में पटना के कोचिंग जगत से जुड़ी फायरिंग, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाओं ने कोचिंग गैंगवार और कोचिंग माफिया जैसे शब्दों को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है। क्या शिक्षा का क्षेत्र अब ज्ञान के बजाए आर्थिक हितों, बाजार हिस्सेदारी और संस्थागत वर्चस्व की लड़ाई में बदलता जा रहा है? विडम्बना यह है कि सस्ती और जनसुलभ शिक्षा का दावा करने वाले कुछ संस्थान आक्रामक प्रचार, बाउंसर्स और समर्थकों की भीड़ के माध्यम से शक्ति-प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं।
नियमन की विफलता

केंद्र और राज्यों के दिशानिर्देशों के बाद भी कोचिंग उद्योग का प्रभावी नियमन अभी भी चुनौती बना हुआ है। समस्या का समाधान कोचिंग संस्थानों को बंद करना नहीं है बल्कि शिक्षा को पुनः शिक्षा बनाना है। इसलिए आवश्यक है कि भविष्य में विद्यालयी शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में सामंजस्य स्थापित किया जाए।

कोचिंग संस्थानों का अनिवार्य पंजीकरण हो। भ्रामक विज्ञापनों पर कठोर कार्रवाई हो। छात्रों के लिए मानसिक स्वास्थ्य परामर्श व्यवस्था अनिवार्य हो। भवन सुरक्षा और फायर सेफ्टी का नियमित ऑडिट हो। चयनित छात्रों के प्रचार उपयोग के लिए नैतिक संहिता बनाई जाए। साथ ही नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी दंड और संस्थानों की स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित हो।

डॉ. शिवानी कटारा

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