दुर्भाग्य देखिए कि जिन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर कभी मोदी की लोकप्रियता दुनिया के किसी भी अन्य नेता की अपेक्षा अनंत पर थी, जहां एक समय हर दूसरा वीडियो और लेख उनके महिमामंडन से भरा होता था, वहीं अब उनके हर अच्छे कार्य में भी छिद्रान्वेषण करते हुए बड़ी संख्या में वीडियो और लेख दिखाई देते हैं।
यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ। अराजकता के विरुद्ध सरकार की लगातार दिखी चुप्पी और समय पर प्रभावी प्रतिक्रिया के अभाव ने धीरे-धीरे मोदी की उस आभा को धूमिल कर दिया, जो वर्षों में बनाई गई थी।

आज रील क्रिएटर और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर इसी माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंच रहे हैं। वे इस विधा से आर्थिक लाभ भी कमा रहे हैं और सरकार तथा मोदी की छवि को लगातार चुनौती भी दे रहे हैं। देश से जुड़े अनेक विषयों पर अधूरी, भ्रामक और कई बार तथ्यहीन जानकारियां प्रसारित कर सरकार के विरुद्ध नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। परिणामस्वरूप झूठ बार-बार दोहराए जाने के कारण अनेक लोगों को सच प्रतीत होने लगता है।
और आत्ममुग्ध सरकार जो मोदी के समक्ष स्वयं को गिरवी रख चुकी है, की ओर से न तो प्रभावी प्रतिवाद दिखाई देता है, न ही इसे रोकने को कोई कानून बनाता है और न ही अपने तंत्र को इतना अधिकार देता है जो इस दुष्प्रचार का समय रहते उत्तर दे सके।
मेरी दृष्टि में सबसे बड़ी समस्या संवाद की कमी और निर्णयों के क्रियान्वयन की शैली रही है। जब देश में आलोचना बढ़ती है, तब उसका उत्तर देश के भीतर स्पष्ट संवाद और दृढ़ कार्रवाई से दिया जाना चाहिए।
यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि सरकार हर विवाद पर अनावश्यक संतुलन साधने में लगी है, तो समर्थकों का मनोबल भी प्रभावित होता है और विरोधियों का साहस भी बढ़ता है।
यह भी समझना होगा कि केवल जातीय समीकरणों, हिंदू-मुस्लिम विमर्श या चुनावी सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे लंबे समय तक राजनीतिक पूंजी सुरक्षित नहीं रखी जा सकती।
किसी भी सरकार की सबसे बड़ी शक्ति उसके निष्ठावान समर्थक होते हैं। यदि वही यह महसूस करने लगें कि उनकी अपेक्षाओं की उपेक्षा हो रही है, तो राजनीतिक क्षरण स्वाभाविक है।
विडंबना यह है कि जिस राहुल गांधी को कभी कमजोर माना जाता था, वही आज हर मुद्दों पर सरकार को रक्षात्मक मुद्रा में खड़ा करने में सफल हो जाता है। इसका कारण केवल विरोध की कोई ताकत नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष की रणनीतिक और संवाद संबंधी कमियां भी हैं।
लोकतंत्र में सरकार की लोकप्रियता केवल उसके कार्यों से नहीं, बल्कि उन कार्यों को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने, भ्रमों का समय पर उत्तर देने और कानून व्यवस्था के प्रश्न पर समान एवं दृढ़ रुख अपनाने से भी तय होती है।
बाकी सोशल मीडिया की तुकबंदियों में ही अगला आत्ममुग्धता की अपनी हद बढ़ा ही रहा है।
– शरद सिंह

