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भक्ति, समर्पण व समरसता का जीवंत उत्सव

भक्ति, समर्पण व समरसता का जीवंत उत्सव

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग
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वारी हमें केवल पंढरपुर तक पहुंचने का मार्ग नहीं दिखाती, बल्कि एक संवेदनशील, समरस और मानवीय समाज की दिशा भी प्रदान करती है।

भारत की सांस्कृतिक परम्परा में अनेक ऐसे पर्व और यात्राएं हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाले जीवंत आंदोलन हैं। महाराष्ट्र की आषाढ़ी वारी ऐसी ही एक अद्भुत परम्परा है, जो लगभग 800 वर्षों से निरंतर चल रही है। संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालखी आलंदी से तथा संत तुकाराम महाराज की पालखी देहू से पंढरपुर स्थित भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए प्रस्थान करती है। इस यात्रा में लाखों वारकरी सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलते हैं। किंतु वारी की सबसे बड़ी विशेषता केवल यह पदयात्रा नहीं, बल्कि उसके साथ चलने वाली सेवा की संस्कृति है। यही सेवा वारी को एक धार्मिक आयोजन से आगे बढ़ाकर सामाजिक समरसता, मानवता और राष्ट्रभावना का विराट उत्सव बना देती है।

भारतीय संस्कृति में सेवा को ईश्वर की उपासना का सर्वोच्च माध्यम माना गया है। संत परम्परा ने सदैव यह संदेश दिया कि मानव की सेवा ही माधव की सेवा है। वारी में यह विचार व्यवहार के रूप में दिखाई देता है। यहां कोई व्यक्ति प्रसिद्धि या प्रतिफल की इच्छा से सेवा नहीं करता, बल्कि इसे अपना सौभाग्य मानकर करता है। हजारों स्वयंसेवक बिना किसी भेदभाव के वारकरियों की सहायता में दिन-रात जुटे रहते हैं। उनके लिए प्रत्येक वारकरी स्वयं विठ्ठल का स्वरूप होता है।

वारी के दौरान सबसे अधिक आवश्यक सेवा भोजन और पेयजल की होती है। यात्रा के मार्ग में अनेक सामाजिक संस्थाएं, धार्मिक संगठन, उद्योग समूह, स्थानीय नागरिक और ग्रामवासी विशाल अन्नछत्र संचालित करते हैं। यहां जाति, धर्म, भाषा, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान का कोई प्रश्न नहीं होता। सभी एक पंक्ति में बैठकर प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण करते हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति के सर्वे भवन्तु सुखिनः के आदर्श को साकार करता है।

दिंडी चालली, दिंडी चालली । - सनातन ...

भोजन के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं का भी विशेष महत्व है। लम्बी पदयात्रा के कारण अनेक वारकरियों को थकान, बुखार, पैरों में छाले, निर्जलीकरण अथवा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसे समय चिकित्सक, नर्स, पैरामेडिकल स्टाफ तथा स्वयंसेवी संस्थाएं निःशुल्क चिकित्सा शिविर संचालित करती हैं। प्राथमिक उपचार, दवाईयां, एम्बुलेंस सेवा और आपातकालीन चिकित्सा की व्यवस्था निरंतर उपलब्ध रहती हैं। अनेक स्थानों पर वारकरियों के पैरों की मालिश, घावों की सफाई और पट्टी जैसी सेवाएं भी अत्यंत श्रद्धा के साथ की जाती हैं। यह सेवा करुणा और संवेदनशीलता का अनुपम उदाहरण है।

इसके अतिरिक्त विश्राम स्थलों की व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल, स्नान एवं शौचालय, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष सुविधाएं, खोए हुए लोगों को उनके परिजनों से मिलाना, यातायात व्यवस्था में सहयोग, स्वच्छता अभियान तथा पर्यावरण संरक्षण जैसे अनेक सेवा कार्य वारी की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अनेक युवा संगठन यात्रा मार्ग पर प्लास्टिक मुक्त अभियान चलाते हैं और स्वच्छता बनाए रखने के लिए स्वयं श्रमदान करते हैं। यह दर्शाता है कि सेवा केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के प्रति भी उत्तरदायित्व है।

वारी का सबसे प्रेरक पक्ष इसकी सामाजिक समरसता है। यहां जाति, वर्ग, भाषा, क्षेत्र, सम्पत्ति और पद का कोई भेद नहीं रहता। किसान, मजदूर, व्यापारी, विद्यार्थी, अधिकारी, डॉक्टर, उद्योगपति और साधारण नागरिक सभी एक साथ चलते हैं, एक साथ भोजन करते हैं और एक-दूसरे की सेवा करते हैं। यही संतों की उस शिक्षा का प्रत्यक्ष स्वरूप है जिसमें सभी मनुष्यों को समान माना गया है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत चोखामेला, संत सावता माली और अन्य संतों ने जिस समतामूलक समाज की कल्पना की थी, उसका सजीव दर्शन वारी में होता है।

वारी केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक शिक्षा का भी माध्यम है। सेवा कार्यों में बड़ी संख्या में युवाओं की भागीदारी उन्हें अनुशासन, सहयोग, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व का पाठ पढ़ाती है। वे सीखते हैं कि समाज केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि कर्तव्यों और सेवा भाव से भी चलता है। यही अनुभव आगे चलकर उन्हें जागरूक और उत्तरदायी नागरिक बनने की प्रेरणा देता है। आज जब समाज अनेक प्रकार के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक विभाजनों से जूझ रहा है, तब वारी का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ और भौतिकता के इस दौर में निस्वार्थ सेवा का यह विशाल आयोजन मानवता के प्रति विश्वास को मजबूत करता है। वारी हमें सिखाती है कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसके संसाधनों में नहीं, बल्कि उसके सेवा संस्कार में निहित होती है।

महाराष्ट्र शासन, स्थानीय प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, नगरपालिकाएं तथा हजारों स्वयंसेवी संगठन मिलकर जिस प्रकार समन्वित रूप से सेवा कार्य करते हैं, वह सुशासन और जनसहभागिता का उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। लाखों लोगों की सुरक्षित यात्रा केवल सरकारी व्यवस्था से संभव नहीं होती; इसमें समाज की सहभागिता और सेवा भावना ही सबसे बड़ी शक्ति बनती है।

वास्तव में वारी भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है जिसमें धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि लोकमंगल का माध्यम है। यहां सेवा ही साधना है, समर्पण ही भक्ति है और मानवता ही ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग है। वारी के सेवा कार्य हमें यह संदेश देते हैं कि जब समाज बिना किसी भेदभाव के एक-दूसरे के दुःख को अपना दुःख मानकर आगे बढ़ता है, तभी सच्चे अर्थों में सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का निर्माण होता है।

लवकुश तिवारी

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