देश के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी NEET परीक्षा में पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों ने स्वाभाविक रूप से पूरे देश में आक्रोश का वातावरण उत्पन्न किया। शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं है; वह एक पीढ़ी के सपनों, परिवारों की आकांक्षाओं और राष्ट्र के भविष्य की आधारशिला है। इसलिए जब परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगता है, तब केवल विद्यार्थियों का ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का विश्वास डगमगाने लगता है। इसी पृष्ठभूमि में देशभर में उठी युवाओं की आवाज़ लोकतंत्र की एक स्वाभाविक और आवश्यक अभिव्यक्ति थी।
दिल्ली के जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक के उपोषण से आरंभ हुआ यह आंदोलन कुछ ही दिनों में राष्ट्रीय स्वरूप ग्रहण कर गया। शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार, पेपर लीक, जवाबदेही के अभाव और परीक्षा प्रणाली की कमियों की ओर सरकार तथा समाज का ध्यान आकर्षित करने में इस आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लोकतंत्र में अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। इसलिए आंदोलन के अधिकार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। वस्तुतः अन्याय के प्रति सजग समाज ही लोकतंत्र को सशक्त बनाता है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से इस आंदोलन को यशस्वी होने की बात कही जा रही है। आने वाले भविष्य में भी युवकों के सहयोग से समाज एवं राजनीति में होने वाली गलत धारणाओं पर आवाज उठाने का आगाज करने की बात दीपके और अन्य नेताओं के द्वारा कही गई है। किन्तु किसी भी आंदोलन की सफलता केवल उसके उद्देश्य से निर्धारित नहीं होती। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है कि उसका स्वरूप कैसा था, उसकी भाषा कितनी संयमित थी, उसका आचरण कितना मर्यादित था और उसने समाज के सामने कौन-सा आदर्श प्रस्तुत किया। इसी बिंदु पर जंतर मंतर के आंदोलन में सहभागी युवक एवं युवतियों द्वारा हुई गाली गलौज की भाषा, पुलिसकर्मियों से हुई मारपीट, आंदोलन में घुसे अवसरवादी राजनेता, आंदोलन में समाविष्ट हुई गुंडो की फौज आदि विविध बातें अनेक गंभीर प्रश्न छोड़ जाती है।

युवकों के सहभागीता से संपन्न हुआ यह पहला आंदोलन नहीं है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि छत्रपति शिवाजी महाराज से लेकर स्वतंत्रता संग्राम, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों तक युवाओं ने सदैव परिवर्तन के अग्रदूत की भूमिका निभाई है। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव ये युवा ही थे, लेकिन उस समय जेन-झी जैसा शब्द नहीं था। ऐसे शब्दों को भुनाने वाली सोशल मीडिया उस समय नहीं थी। महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, जयप्रकाश नारायण और अन्ना हज़ारे जैसे आंदोलनों में शासन की तीखी आलोचना हुई, किंतु उस आलोचना की भाषा मर्यादित थी और संघर्ष का नैतिक स्तर अत्यंत ऊँचा था। वहाँ विरोध था, परंतु वैचारिक अनुशासन भी था; संघर्ष था, किंतु संयम भी था।

इसके विपरीत NEET आंदोलन के दौरान देश के संवैधानिक पद पर बैठे हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनियंत्रित रूप से गाली गलौज करना, समाज एवं देश की सुरक्षा के लिए ड्यूटी पर तैनात पुलिस पर निरंतर हमला करते रहना, संसद भवन को टारगेट करने का उद्देश्य मन में रखना, सरकारी वाहनों को आग लगाना, सोशल मीडिया का उपयोग करके विभिन्न भ्रम समाज में अस्थिरता हेतु प्रसारित करना यह सारी बातें इस आंदोलन में हुई है। युवाओं के माध्यम से इस आंदोलन में जो दृश्य सामने आए, उसने चिंता बढ़ाई। पुलिस पर पथराव, सार्वजनिक संपत्ति की तोड़फोड़, सरकारी संसाधनों को नुकसान पहुँचाना तथा देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों के प्रति अभद्र और अशोभनीय भाषा का प्रयोग किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की पहचान नहीं हो सकती। सरकार की कठोर आलोचना करना लोकतांत्रिक अधिकार है, किंतु व्यक्तिगत घृणा, अपमान और अशिष्ट भाषा का प्रयोग लोकतांत्रिक संस्कृति को दुर्बल करता है। यदि यह अंतर मिट गया, तो लोकतंत्र संवाद की संस्कृति खो देगा। यह बात इस आंदोलन में महसूस हुई है।
आज मूल प्रश्न यह नहीं है कि युवा सड़कों पर क्यों उतरे; बल्कि यह है कि सड़कों पर उतरने वाला युवा किन मूल्यों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। आक्रोश उचित हो सकता है, लेकिन उसकी अभिव्यक्ति भी उतनी ही संयमित और उत्तरदायी होनी चाहिए। अन्यथा न्याय की लड़ाई अराजकता में बदलने का खतरा उत्पन्न हो जाता है।

इससे भी अधिक गंभीर तथ्य यह है कि युवाओं की निष्कपट भावनाएँ अनेक बार राजनीतिक और वैचारिक शक्तियों के लिए अवसर बन जाती हैं। भारत के लगभग प्रत्येक बड़े आंदोलन के इतिहास का अध्ययन करें, तो स्पष्ट दिखाई देता है कि विभिन्न राजनीतिक दलों और वैचारिक समूहों ने समय-समय पर आंदोलनों को अपने हितों की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया है। इसलिए किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन करते समय केवल युवाओं के उत्साह को नहीं, बल्कि उसके पीछे सक्रिय बाहरी-भीतरी शक्तियों, उनके उद्देश्य और आंदोलन की दिशा पर पड़े उनके प्रभाव का भी निष्पक्ष विश्लेषण आवश्यक है।
आज जब कांग्रेस, उद्धव गुट शिवसेना, जनता दल, समाजवादी पार्टी, आप जैसे अनेक राजनीतिक दल जनविश्वास के संकट से जूझ रहे हैं, तब युवाओं के असंतोष को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लाभ में बदलने का आकर्षण स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। राहुल गांधी, उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, केजरीवाल, शरद पवार जैसे समाज का आधार खो चुके और अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे नेता आंदोलन के मंच पर उपस्थित थे। विद्यार्थियों के आंदोलन के मंच पर इनका उपस्थित होना और विद्यार्थियों की समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने के लिए निरंतर कार्य करना इन दोनों में मूलभूत अंतर है। नेतृत्व केवल विरोध के क्षणों में नहीं, बल्कि समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता में भी दिखाई देता है। गत 20 सालों की भारतीय राजनीति पर नजर घुमाए तो हमें ध्यान में आएगा कि देश में विविध क्षेत्र में अस्थिरता निर्माण करने में इन महानुभावों का कितना योगदान रहा है।
दूसरी ओर सरकार को भी गंभीर आत्ममंथन करना होगा। पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार, भर्ती प्रक्रियाओं की अनियमितताएँ और शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता का अभाव किसी एक सरकार या किसी एक कालखंड की समस्या नहीं हैं। यह चुनौती वर्षों से देश के सामने है। इसलिए इस विषय को दलगत राजनीति से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग, परीक्षा प्रणाली की पूर्ण पारदर्शिता, कठोर दंड व्यवस्था और स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की अनिवार्य आवश्यकता है।

भारत का युवा आज विश्व की सबसे बड़ी जनसांख्यिकीय शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। यही शक्ति भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की क्षमता रखती है। यदि उसका मार्गदर्शन सही दिशा में न हो, तो वही शक्ति सामाजिक अस्थिरता का कारण भी बन सकती है। इसलिए युवाओं को केवल आंदोलन के लिए प्रेरित करना पर्याप्त नहीं है; उन्हें संविधानसम्मत आचरण, लोकतांत्रिक मर्यादा, वैचारिक परिपक्वता और राष्ट्रहित की चेतना से भी संपन्न करना आवश्यक है।
सोशल मीडिया ने आंदोलनों का स्वरूप पूरी तरह बदल दिया है। अब विचारों से अधिक वायरल होने की होड़ दिखाई देती है। संवाद की अपेक्षा आक्रामकता अधिक ध्यान आकर्षित करती है और संयम की अपेक्षा उत्तेजना अधिक लोकप्रिय बनती है। परिणामस्वरूप अभद्र भाषा, गाली गलौज, व्यक्तिगत कटुता और सार्वजनिक अपमान को धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकार्यता मिलने लगी है। यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि आज का युवा ही कल का शिक्षक, प्रशासक, जनप्रतिनिधि और समाज का नेतृत्वकर्ता होगा।

दिल्ली के जंतर मंतर और आसपास के परिसर में हुआ यह सारा घटनाक्रम उन युवाओं के परिवारजनों, शिक्षक और समाज के विभिन्न क्षेत्र में कार्य करने वाले महानुभावों एवं संगठनों ने भी देखा होगा। यह पूरा घटनाक्रम संपूर्ण समाज के लिए भी आत्ममंथन का विषय है। क्या हम अपने बच्चों को मतभेद व्यक्त करने की सभ्य संस्कृति सिखा रहे हैं? क्या हम उन्हें यह समझा रहे हैं कि लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं, बल्कि कर्तव्यों और मर्यादाओं का भी नाम है? ये प्रश्न प्रत्येक परिवार, प्रत्येक शिक्षक और प्रत्येक सामाजिक संस्था के सामने खड़े हैं।
भारत में आंदोलन होते रहेंगे और उनका होना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक भी है। किंतु लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सड़क पर होने वाले शोर-शराबे, गाली गलौज, आगजनी, पुलिस पर हिंसक हमलों में नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता, नैतिक दृढ़ता और सार्वजनिक अनुशासन में निहित होती है। संसद, न्यायपालिका, पुलिस व्यवस्था तथा अन्य संवैधानिक संस्थाएँ लोकतंत्र की आधारशिलाएँ हैं। उनके प्रति असहमति व्यक्त की जा सकती है, उनकी आलोचना भी की जा सकती है, किंतु हिंसा और अपमान की भाषा लोकतंत्र को कभी सशक्त नहीं बना सकती।
निस्संदेह, NEET आंदोलन ने देश की शिक्षा व्यवस्था की गंभीर कमियों को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया। यह उसकी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। साथ ही इस आंदोलन ने युवाओं के आचरण, आंदोलन की भाषा, राजनीतिक हस्तक्षेप और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़े अनेक ऐसे प्रश्न भी सामने रखे हैं, जिनकी उपेक्षा भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
राष्ट्र को संघर्ष करने वाले युवाओं की आवश्यकता है, पर उससे भी अधिक आवश्यकता ऐसे युवाओं की है जो संघर्ष के साथ संयम, उत्साह के साथ विवेक, अधिकारों के साथ कर्तव्य और विरोध के साथ राष्ट्रहित की भावना को भी समान महत्व दें। क्योंकि आंदोलन शासन बदल सकते हैं, लेकिन संस्कार ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
