हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
युवाओं… व्यवस्था बदले नहीं, इसे सक्षम बनाएं

युवाओं… व्यवस्था बदले नहीं, इसे सक्षम बनाएं

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, युवा
1

“भारतीय युवाओं में ऊर्जा है, उनमें सामर्थ्य है। इस ऊर्जा एवं सामर्थ्य का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि विकास के लिए होना चाहिए। देश को आंदोलन करने वाले युवा चाहिए, लेकिन साथ ही राष्ट्र के बारे में सोचने वाले, संविधान पर विश्वास रखने वाले, राष्ट्र को सर्वोपरि मानने वाले और चरित्रवान युवा भी चाहिए। आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।  यह प्रगति किसी एक सरकार या सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति का प्रमाण है।”

Startup Success in India: Opportunities for Young Entrepreneurs in 2026 -  People's University

“भारतीय व्यवस्था को बदलने के लिए ही यह जनआंदोलन किया गया है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) जैसी सभी संस्थाओं पर लोगों का विश्वास खत्म हो गया है। पूरी व्यवस्था में बदलाव लाने के लिए जनआंदोलन की आवश्यकता है।” दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन के बाद अभिजीत दीपके द्वारा दिए गए इस बयान से क्या इस आंदोलन के पीछे का वास्तविक उद्देश्य सामने आता है? इस तरह की चर्चा अब व्यापक रूप से होने लगी है। किसी भी आंदोलन की सफलता या असफलता से अधिक महत्वपूर्ण उसका उद्देश्य होता है। इसलिए युवा आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अभिजीत दीपके के इस बयान का गंभीरता से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है।


Independence day: भारत ही नहीं, दुनिया के इन देशों में भी 15 अगस्त को ही  मनाया जाता है स्वतंत्रता दिवस - Prabhat Khabar

इस 15 अगस्त को भारत अपनी स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश करेगा। इन 80 वर्षों में देश में अनेक सरकारें बदलीं, कई राजनीतिक दल सत्ता में आए और गए, अनेक आंदोलन हुए, कई सामाजिक समस्याएँ सामने आईं और उनका समाधान भी संवैधानिक तरीके से खोजा गया। इस पूरे सफर में भारतीय संविधान ने देश को स्थिरता, निरंतरता और लोकतांत्रिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रदान की। ऐसे में भारत को कमजोर करने वाली भाषा अभिजीत दीपके जैसे आंदोलनकारी क्यों बोल रहे हैं? वे भारत की व्यवस्था बदलने के बजाय उसे मजबूत बनाने की बात क्यों नहीं करते? ऐसे कई प्रश्न मन में उठते हैं। क्योंकि “व्यवस्था बदलो” का नारा जितना आकर्षक लगता है, उतना ही गंभीर चिंतन का विषय भी है।

लोकमान्य की यादें - कौशल एस इनामदारमहात्मा गांधी - विकिपीडियाभगत सिंह का पिता को पत्र •• 4 अक्टूबर 1930स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन के अग्रणी नेता नेताजी सुभाषचंद्र  बोस - प्रवक्‍ता.कॉम - Pravakta.Com

भारत में आंदोलनों की परंपरा नई नहीं है। स्वतंत्रता से पहले लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे अनेक नेताओं ने स्वतंत्रता के लिए आंदोलन किए। ये सभी युवा थे, लेकिन उनके आंदोलन के पीछे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं थी। उनका लक्ष्य स्पष्ट रूप से राष्ट्रनिर्माण था।

स्वतंत्रता के बाद भी आंदोलनों का सिलसिला नहीं रुका। जयप्रकाश नारायण का संपूर्ण क्रांति आंदोलन, छात्र आंदोलन, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, किसान आंदोलन, पर्यावरण आंदोलन, महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष और सामाजिक न्याय के आंदोलन, इन सभी ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूत किया।

जेपी 'संपूर्ण क्रांति' का लक्ष्य साधने में कितने सफल रहे - BBC News हिंदीEmergency, When Not a Leaf Moved Unless Govt Willed it | NewsClick

इन आंदोलनों ने कई बार सरकारों को अपने निर्णय बदलने पर मजबूर किया, नीतियों में बदलाव हुआ और समाज में जागरूकता आई।

लेकिन इस इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई आंदोलनों के नेता कुछ समय बाद राजनीतिक दलों में शामिल हो गए। कुछ ने अपने दल बनाए, कुछ सत्ता का हिस्सा बने और कुछ समय के साथ सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए। इससे एक मूलभूत प्रश्न उठता है, जो लोग राजनीतिक व्यवस्था बदलने के लिए आंदोलन करते हैं, वही बाद में उसी व्यवस्था का हिस्सा क्यों बन जाते हैं? भारतीय जनआंदोलनों के इतिहास का यह सबसे रोचक और गंभीर प्रश्न है।

व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने वाले अनेक युवा नेता बाद में उसी व्यवस्था में शामिल हो जाते हैं। क्या यह केवल संयोग है या लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया? अन्ना हजारे के आंदोलन से उभरकर आगे आए अरविंद केजरीवाल तथा गुजरात के पटेल आंदोलन से सामने आए हार्दिक पटेल इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

Anna Hazare News Photo Anna Hazare, one of India's well...आपकी कथनी और करनी में फर्क'...शराब नीति पर अन्ना हजारे का केजरीवाल को खत - Anna  Hazare Letter to Delhi cm Arvind Kejriwal on liquor policy of aap govt ntc  - AajTakहार्दिक पटेल मध्य प्रदेश में एक महीने की यात्रा का शुभारंभ करेंगे |  न्यूज़क्लिक

यदि इस विषय को थोड़ा गहराई से देखें तो भारतीय व्यवस्था की ताकत भी सामने आती है। आंदोलन और प्रशासन में मूलभूत अंतर होता है। आंदोलन के माध्यम से समस्याएँ उठाई जा सकती हैं, लेकिन शासन चलाने के लिए अर्थव्यवस्था, कानून, प्रशासन, विदेश नीति, विकास, सुरक्षा और सामाजिक संतुलन जैसे अनेक विषयों पर विचार करना पड़ता है। सड़क पर नारे लगाने और शासन चलाने की जिम्मेदारी में बहुत बड़ा अंतर होता है।

भारतीय रक्षा नीति के बदलते ढांचे से उभरती नई तस्वीर'भारतीय अर्थव्यवस्था: कैसा रहा 2023?मोदी सरकार के 8 सालों में कितनी बदल गई भारत की विदेश नीति, पंडित नेहरू के  जमाने क्या है अलग? | मोदी सरकार के 8 सालों में कितनी बदल गई भारत की

भारत एक मजबूत और समावेशी लोकतंत्र है। यहाँ किसी भी बड़े परिवर्तन का मार्ग संसद, न्यायपालिका, चुनाव और संवैधानिक प्रक्रिया से होकर जाता है। इसलिए अनेक आंदोलनकारी अंततः संवैधानिक व्यवस्था के भीतर काम करना स्वीकार करते हैं। लेकिन जिन आंदोलनों के पास स्पष्ट वैचारिक दिशा नहीं होती, वे अधिक समय तक प्रभावी नहीं रह पाते। कई आंदोलन केवल भावनात्मक लहर पर खड़े होते हैं। सोशल मीडिया से लोकप्रियता जल्दी मिल जाती है, लेकिन आंदोलन समाप्त होने के बाद आगे क्या करना है, इसका उत्तर यदि नेतृत्व के पास नहीं होता तो वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है।

यदि अभिजीत दीपके के हाल के बयानों पर ध्यान दें तो कभी वे कहते हैं कि उन्हें भाजपा ने राजनीतिक निमंत्रण दिया है, तो कभी कहते हैं कि देश की पूरी व्यवस्था बदलनी है। इस प्रकार के विरोधाभासी और आधारहीन बयान लगातार सामने आ रहे हैं।

यदि अभिजीत दीपके सरकार से प्रश्न पूछ सकते हैं, तो जनता को भी उनसे प्रश्न पूछने का अधिकार है। “व्यवस्था बदलने” का अर्थ क्या है? क्या वे भारतीय संविधान बदलना चाहते हैं? क्या वे संसदीय लोकतंत्र बदलना चाहते हैं? क्या वे न्यायपालिका बदलना चाहते हैं? क्या वे चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं का पुनर्गठन करना चाहते हैं? या केवल उनमें सुधार चाहते हैं? जब तक इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब तक “व्यवस्था बदलो” का नारा केवल एक भावनात्मक नारा बनकर रह जाता है।

भारतीय लोकतंत्र में संविधान ने स्वयं संशोधन की व्यवस्था दी है। संसद को कानून बदलने का अधिकार है। जनता को सरकार बदलने का अधिकार है। इसलिए सुधार संभव हैं, लेकिन उनका मार्ग संवैधानिक होना चाहिए। इस बात को अभिजीत दीपके को समझने की आवश्यकता है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया, ईडी और सीबीआई जैसी सभी संस्थाओं पर विश्वास समाप्त होने की घोषणा करना और पूरी भारतीय व्यवस्था बदलने की बात करना अत्यंत गंभीर विषय है।

May be an image of one or more people and text that says "COCKROACH COCKROACHJANATAPART JANATA NEET हम देखेंगे अल्लाह सर्वोच्च वेदांत है, वो शक्ति जो वोशक्तिजोहम हम सबमें सबमेंहै है 地推共 बुत उठवाए जाएँगे, बस नाम रहेगा अल्लाह का... इस्लामिक क्राति"

क्या युवाओं के नाम पर चल रहा यह आंदोलन राष्ट्रविरोधी एजेंडे की ओर बढ़ रहा है? यदि ऐसा है तो यह आंदोलन अपनी सही दिशा से भटक रहा है। ऐसे बयान नागरिकों का संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास कम कर सकते हैं और देश में अराजकता का वातावरण पैदा कर सकते हैं।

ऐसे समय में यह प्रश्न भी उठता है कि क्या छात्रों की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के नाम पर शुरू हुआ यह आंदोलन केवल एक मुखौटा था? क्या देश को कमजोर करने वाली शक्तियाँ इसके पीछे सक्रिय हैं? अतीत में कई राजनीतिक दलों, विदेशी फंडिंग से चलने वाले कुछ गैर-सरकारी संगठनों तथा राष्ट्रविरोधी वैचारिक समूहों ने जनआंदोलनों को प्रभावित करने का प्रयास किया है।

अभिजीत दीपके के बदलते बयानों को देखते हुए इस संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति में आंदोलन के नेतृत्व को भी कुछ प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। इतने बड़े आंदोलन के लिए धन कहाँ से आया? लोकतंत्र में जैसे सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है, वैसे ही आंदोलन का नेतृत्व भी जवाबदेह होना चाहिए।

यदि हम भारतीय आंदोलनों के इतिहास को देखें तो उनका उद्देश्य देश की एकता, स्वतंत्रता और राष्ट्रनिर्माण रहा है। मतभेद थे, विचारों में भिन्नता थी, लेकिन भारत की व्यवस्था को नष्ट करना किसी भी आंदोलन का लक्ष्य नहीं था। स्वतंत्रता के बाद हुए अनेक आंदोलनों ने लोकतंत्र को मजबूत किया। उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई, सामाजिक न्याय की मांग की, किसानों और मजदूरों के प्रश्न उठाए, पर्यावरण और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की। ये आंदोलन व्यवस्था तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी बनाने के लिए थे। इसलिए आज “व्यवस्था बदलो” के नारे का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होना चाहिए।

क्या सभी संस्थाओं पर अविश्वास व्यक्त करके देश में अस्थिरता पैदा करना ही इसका उद्देश्य है? जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, तब तक ऐसे नारों का सही मूल्यांकन संभव नहीं है।

आज भारत स्वतंत्रता के 80वें वर्ष के द्वार पर खड़ा है। इन वर्षों में कठिनाइयाँ भी आईं, गलतियाँ भी हुईं, भ्रष्टाचार भी हुआ; लेकिन साथ ही लोकतंत्र और अधिक परिपक्व हुआ, न्यायालयों ने ऐतिहासिक निर्णय दिए, सत्ता परिवर्तन शांतिपूर्ण ढंग से हुए और संविधान ने देश को एकजुट बनाए रखा। इसलिए आज आवश्यकता व्यवस्था को नष्ट करने की नहीं, बल्कि उसे अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी, प्रभावी और जनहितकारी बनाने की है।

लोकतंत्र में आंदोलन आवश्यक हैं, लेकिन आंदोलन अंतिम लक्ष्य नहीं होते। अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित, संविधान के प्रति निष्ठा, सामाजिक स्थिरता और सामान्य नागरिक का विकास होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र के 80 वर्षों की यात्रा हमें यही संदेश देती है।

Amid RTI complaint, CJP's Abhijeet Dipke says scholarship, loan financed US  education

किसी भी आंदोलन का मूल्य उसके नारों से नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक दृष्टिकोण, संवैधानिक प्रतिबद्धता और राष्ट्रहित से जुड़े उसके उद्देश्य से तय होता है। इसलिए “व्यवस्था बदलो” के नारे के बाद यह प्रश्न स्वाभाविक है कि कहीं छात्र आंदोलन के नाम पर यह आंदोलन अपना राष्ट्रविरोधी चेहरा तो सामने नहीं ला रहा? इसलिए आंदोलन करने वालों को “व्यवस्था बदलो” के बजाय “व्यवस्था को और अधिक सक्षम कैसे बनाया जाए?” इस प्रश्न पर ध्यान देना चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा होता दिखाई नहीं देता।

भारतीय युवाओं में ऊर्जा है, उनमें सामर्थ्य है। इस ऊर्जा एवं सामर्थ्य का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि विकास के लिए होना चाहिए। देश को आंदोलन करने वाले युवा चाहिए, लेकिन साथ ही राष्ट्र के बारे में सोचने वाले, संविधान पर विश्वास रखने वाले, राष्ट्र को सर्वोपरि मानने वाले और चरित्रवान युवा भी चाहिए। आज भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
Independence Day 2025: Tryst with growth — India's economic journey from  Nehru to now - The Economic Times

भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन रहा है। अंतरिक्ष अनुसंधान में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। डिजिटल क्रांति में दुनिया भारत की ओर देख रही है। दवा निर्माण, रक्षा, स्टार्टअप, प्रौद्योगिकी, कृषि और आधारभूत संरचना जैसे क्षेत्रों में भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यह प्रगति किसी एक सरकार या सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की शक्ति का प्रमाण है।

इसलिए आज दृढ़ता से कहना होगा- भारतीय युवा व्यवस्था बदलने का नारा देने के बजाय व्यवस्था को अधिक सक्षम बनाने का संकल्प लें।

 

 

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: चुनाव आयोगछात्र आंदोलनन्यायपालिकाभारतभारतीय राजनीतिभारतीय लोकतंत्रभारतीय संविधानयुवा नेतृत्वयुवा शक्तिराजनीतिक विश्लेषणराष्ट्र निर्माणराष्ट्रहितलोकतंत्रलोकतांत्रिक व्यवस्थालोकतांत्रिक सुधारव्यवस्था परिवर्तनसंविधानसंवैधानिक संस्थाएंसंसदसामाजिक आंदोलन

अमोल पेडणेकर

Comments 1

  1. Anonymous says:
    2 hours ago

    खूप छान लेख, या आंदोलनामध्ये देश विरोधी एनजीओने आपापले दुकानावर मांडले व देश कसा रसा तळाला जाईल हेच उद्दिष्टे समोर ठेवून आंदोलन चालले होते.

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0