लोक संस्कृति में प्रकृति और जीवन एक दूसरे से अलग नहीं माने जाते। पेड़ पौधों, नदियों, पर्वतों और पशुओं के साथ साथ मनुष्य की आजीविका के साधनों तक में ईश्वरीय चेतना का अनुभव किया जाता है। छत्तीसगढ़ का हरेली तिहार इसी जीवन दर्शन का सजीव उदाहरण है। यह केवल कृषि पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, श्रम के सम्मान और लोक संस्कृति का उत्सव है।
हरेली शब्द का अर्थ ही हरियाली से जुड़ा है। वर्षा ऋतु के आगमन के साथ जब धरती हरी चादर ओढ़ लेती है और धान की फसल खेतों में लहलहाने लगती है, तब किसान प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करता है। यह समय खेती के सबसे महत्वपूर्ण दौर का होता है। जुताई और बुआई का कार्य लगभग पूरा हो चुका होता है और किसान अच्छी वर्षा तथा भरपूर फसल की कामना करता है।
देश के अनेक भागों में सावन की अमावस्या को हरियाली अमावस्या के रूप में मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यही पर्व हरेली तिहार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यहां झूले डालने की परंपरा नहीं है, बल्कि कृषि, पशुधन और लोक परंपराओं का विशेष महत्व दिखाई देता है।
हरेली के दिन किसान अपने कृषि उपकरणों जैसे हल, नांगर, कुदाली, गैंती, फावड़ा, रापा और अन्य औजारों को साफ कर एक स्थान पर रखकर उनकी पूजा करते हैं। यह परंपरा बताती है कि भारतीय किसान अपने श्रम के साधनों को केवल उपकरण नहीं, बल्कि जीवन का आधार मानता है। इसी दिन बैलों की भी पूजा की जाती है, क्योंकि खेती में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

इस अवसर पर घरों में गुड़ का चीला सहित अनेक पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। अधिकांश परिवार अपने कुलदेवता और ग्राम देवता की पूजा करते हैं। कुछ क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार विशेष अनुष्ठान भी संपन्न किए जाते हैं। यह पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकता को भी मजबूत बनाता है।
हरेली से जुड़ी अनेक लोक परंपराओं के पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार भी दिखाई देता है। इस दिन गांवों में गाय, बैल और भैंसों को अरंड और नमक खिलाने की परंपरा है। यादव समाज के लोग घर घर जाकर पशुओं को यह खिलाते हैं। इसके साथ ही वे किसानों को दशमूल कंद और वन गोंदली अर्थात जंगली प्याज भी देते हैं। परिवार इनका सेवन प्रसाद के रूप में करता है।
वर्षा ऋतु में घरों के दरवाजे पर नीम की डालियां लगाने की परंपरा भी प्रचलित है। कई स्थानों पर भेलवा के पत्ते भी लगाए जाते हैं। लोक मान्यताओं के साथ साथ इन परंपराओं का स्वास्थ्य विज्ञान से भी संबंध है। नीम में रोगाणुरोधी गुण होते हैं, जबकि दशमूल और जंगली प्याज जैसी वनौषधियां शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक मानी जाती हैं। इसी प्रकार अरंडी और खम्हार के पत्तों का उपयोग पशुओं की सुरक्षा के लिए किया जाता रहा है।
हरेली का सबसे आकर्षक पक्ष गेड़ी है। बांस से बनी ऊंची गेड़ी पर संतुलन बनाकर चलना छत्तीसगढ़ की विशिष्ट लोक परंपरा है। बच्चे और युवा गेड़ी पर चढ़कर गांव में घूमते हैं तथा प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। पहले वर्षा के दिनों में जलभराव वाले क्षेत्रों में आवागमन के लिए भी गेड़ी उपयोगी थी। आज यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है।
हरेली के दिन गांवों और कस्बों में नारियल फेंक, बैल दौड़, कबड्डी आदि प्रतियोगिता भी आयोजित होती है। पूजा के बाद चौक चौराहों पर युवाओं की टोलियां जुटती हैं और देर रात तक यह प्रतियोगिता चलती है। इससे पर्व में उत्साह और सामुदायिक सहभागिता का वातावरण बनता है।
छत्तीसगढ़ में हरेली का संबंध केवल कृषि से नहीं, बल्कि लोक तंत्र साधना और पारंपरिक ज्ञान से भी माना जाता है। लोक मान्यता है कि इसी दिन से बैगा और गुनिया अपने शिष्यों को विभिन्न मंत्रों और पारंपरिक उपचार विधियों की शिक्षा देना आरंभ करते हैं, इसे पाठ-पीढा देना भी कहते हैं। ग्रामीण समाज में यह ज्ञान लोक चिकित्सा, सर्पदंश, विष उपचार और अन्य पारंपरिक उपचार पद्धतियों से जुड़ा रहा है। इन परंपराओं के साथ अनेक लोक विश्वास भी जुड़े हैं, जो आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में जीवित हैं।
हरेली के अवसर पर गांव का लोहार और अन्य परंपरागत कारीगर भी किसानों के घर जाकर शुभ कार्य करते हैं। वे चौखट पर कील ठोकते हैं, औषधीय वनस्पतियां घर में लगाने की सलाह देते हैं और बदले में किसान उन्हें धान, चावल तथा अन्य उपहार देकर सम्मानित करते हैं। यह व्यवस्था गांव की पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
आज आधुनिक जीवन शैली के कारण हरेली की अनेक परंपराएं धीरे धीरे कम होती जा रही हैं। फिर भी कृषि उपकरणों की पूजा, बैलों का सम्मान, गेड़ी चलाना और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना आज भी इस पर्व की आत्मा बने हुए हैं। हरेली हमें यह संदेश देता है कि मनुष्य का विकास प्रकृति से जुड़कर ही संभव है।
बदलते परिवेश में आज भी हरेली केवल एक लोक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस जीवन दृष्टि का उत्सव है जिसमें धरती, जल, वन, पशु, औजार और मनुष्य सभी एक दूसरे के पूरक हैं। यही कारण है कि हरेली आज भी छत्तीसगढ़ की लोक चेतना, कृषि संस्कृति और प्रकृति संरक्षण की अमूल्य धरोहर के रूप में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है।
– आचार्य ललित मुनि
