जल जीवन का आधार है। हम इसे पीते हैं, भोजन बनाते हैं, स्नान करते हैं, खेती में उपयोग करते हैं और उद्योगों में भी इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। किंतु हर प्रकार का जल एक-सा नहीं होता। हमें जो पानी साफ दिखाई देता है, वह हमेशा स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हो, यह आवश्यक नहीं। इसलिए शुद्ध जल, ताजा जल, पेय जल और दूषित जल के अर्थ तथा उनके अंतर को समझना आवश्यक है।
सामान्यतः हम पारदर्शी, रंगहीन और गंधहीन पानी को शुद्ध मान लेते हैं परंतु केवल साफ दिखाई देना जल की शुद्धता का प्रमाण नहीं है। पानी में अनेक सूक्ष्मजीव और रसायन घुले हो सकते हैं, जो आँखों से दिखाई नहीं देते तथा जिनका स्वाद या गंध भी महसूस नहीं होता।
वैज्ञानिक अर्थ में पूर्णतः शुद्ध जल में केवल जल के अणु होते हैं। प्रयोगशालाओं में प्राप्त आसुत जल इसका उदाहरण है। दैनिक जीवन में, हालांकि, “शुद्ध जल” से आशय ऐसे जल से होता है जिसमें मिट्टी, कचरा, दुर्गंध, रोगजनक जीवाणु और हानिकारक रसायन बहुत कम हों या न हों।
जल को छानने, उबालने, क्लोरीनीकरण, यूवी उपचार तथा उपयुक्त जल शुद्धक यंत्रों द्वारा काफी हद तक सुरक्षित बनाया जा सकता है। फिर भी यह याद रखना चाहिए कि अत्यधिक खनिज या कुछ घुले हुए रसायन साफ दिखने वाले जल में भी उपस्थित हो सकते हैं। अतः जल की वास्तविक गुणवत्ता का पता वैज्ञानिक जाँच से ही चलता है।

ताजा जल: कम नमक वाला प्राकृतिक जल
ताजा जल वह प्राकृतिक जल है जिसमें घुले हुए नमक की मात्रा बहुत कम होती है। नदियां, झीलें, तालाब, झरने, वर्षा जल और भूमिगत जल इसके प्रमुख स्रोत हैं। इसके विपरीत समुद्र का जल खारा होता है, क्योंकि उसमें नमक की मात्रा बहुत अधिक होती है; इसलिए उसे सीधे पीना उचित नहीं है।
पृथ्वी पर उपलब्ध अधिकांश जल समुद्रों में खारे पानी के रूप में है। मनुष्य, पशु-पक्षी, खेती और अधिकांश स्थलीय जीव मुख्यतः ताजे जल पर निर्भर हैं। वर्षा से प्राप्त जल नदियों, झीलों और तालाबों में एकत्र होता है तथा उसका कुछ भाग भूमि के भीतर जाकर भूजल बनाता है।
ताजा जल और शुद्ध जल समानार्थी नहीं हैं। उदाहरण के लिए, नदी का जल ताजा हो सकता है क्योंकि उसमें नमक कम है, किंतु उसमें मिट्टी, सीवेज, प्लास्टिक, कीटाणु, औद्योगिक अपशिष्ट अथवा खेती से बहकर आए उर्वरक और कीटनाशक शामिल हो सकते हैं। इसलिए किसी नदी, तालाब या कुएँ का जल ताजा होने पर भी बिना जांच और उपचार के पीने योग्य नहीं माना जाना चाहिए।
पेय जल: स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित जल
पेय जल वह है जो पीने और भोजन बनाने के लिए सुरक्षित हो। ऐसे जल में रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीव, विषैले रसायन तथा अन्य हानिकारक पदार्थ सुरक्षित सीमा से अधिक नहीं होने चाहिए। उसका रंग, स्वाद और गंध सामान्य हो सकते हैं, परंतु उसकी सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय आधार प्रयोगशाला-आधारित गुणवत्ता जांच ही है।

नगरपालिका अथवा सार्वजनिक जल-आपूर्ति व्यवस्थाएँ सामान्यतः जल को छानती हैं, कीटाणुरहित करती हैं और जाँच के बाद घरों तक पहुँचाती हैं। फिर भी स्रोत से घर तक पहुँचने की यात्रा में पानी दूषित हो सकता है। पुरानी पाइपलाइनें, टूटी जल-नलिकाएँ, गंदी या खुली टंकियाँ तथा अस्वच्छ भंडारण-पात्र पेय जल की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
घर में पेय जल को सुरक्षित रखने के उपाय
1. पानी को साफ और ढके हुए बर्तन में रखें।
2. पानी निकालने के लिए साफ गिलास, करछुल या नल का उपयोग करें।
3. घर की जल-टंकी की नियमित सफाई कराएँ।
4. पानी संदिग्ध लगे तो उसे उबालें या विश्वसनीय शुद्धिकरण विधि अपनाएँ।
5. बाढ़, पाइप टूटने या स्थानीय जल-संदूषण की सूचना मिलने पर नल का पानी सीधे न पिएँ।
6. यदि पानी में बदबू, असामान्य रंग, धात्विक स्वाद या रसायनों की आशंका हो, तो स्थानीय जल अथवा स्वास्थ्य विभाग से सलाह लेकर उसकी जाँच कराएँ।
जल को उबालने से रोगाणुओं को नष्ट करने में मदद मिलती है लेकिन यह हर प्रकार के रासायनिक प्रदूषण, भारी धातुओं या घुले हुए लवणों को नहीं हटा पाता है।
दूषित जल: स्वास्थ्य के लिए छिपा खतरा
दूषित जल वह है जिसमें गंदगी, रोगाणु, मल-मूत्र, जहरीले रसायन, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक या अन्य हानिकारक पदार्थ मिल गए हों। ऐसा जल पीने, भोजन बनाने और कुछ परिस्थितियों में स्नान के लिए भी जोखिमपूर्ण हो सकता है।
जल-दूषण के प्रमुख कारणों में नालों और सीवेज का जलस्रोतों में मिलना, खुले में शौच, कचरा फेंकना, कारखानों का रासायनिक अपशिष्ट, खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक एवं कीटनाशक और पशुओं का मल शामिल हैं। वर्षा का बहता पानी भी सड़कों, खेतों तथा कूड़े के ढेरों से गंदगी बहाकर नदियों, तालाबों और भूजल तक पहुँचा सकता है।
दूषित जल से दस्त, हैजा, पेचिश, टाइफाइड और हेपेटाइटिस ए जैसी बीमारियाँ फैल सकती हैं। छोटे बच्चों, बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में इसका जोखिम अधिक हो सकता है।
जल को सुरक्षित रखना केवल सरकार या जल-विभाग का कार्य नहीं है; यह प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी भी है। नदियों, तालाबों और नालों में प्लास्टिक, तेल, पूजा-सामग्री, कूड़ा या रसायन नहीं डालने चाहिए। घरों में पानी की बर्बादी रोकना, वर्षा-जल संचयन करना, जलस्रोतों के आसपास स्वच्छता बनाए रखना और गंदे पानी का उचित निस्तारण करना आवश्यक है।
संक्षेप में ताजा जल कम नमक वाला प्राकृतिक जल है; शुद्ध जल अशुद्धियों से मुक्त या उपचारित जल है; पेय जल वह है जो पीने के लिए सुरक्षित हो; जबकि दूषित जल में ऐसे पदार्थ होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। स्वस्थ जीवन के लिए केवल पानी उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं; उसका स्वच्छ, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण होना भी उतना ही आवश्यक है।
– सुभाष चंद्र लखेड़ा

