प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 80 वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से दिए संबोधन में देश के वर्तमान, भविष्य, विकसित भारत के लक्ष्य, विश्व व्यवस्था आदि पर इतने पहलू थे जिन पर लंबे समय तक चर्चा हो सकती है। किंतु उनकी कुछ बातों पर जैसी तीखी प्रतिक्रिया और उबाल दिख रही है उस पर गौर करना आवश्यक है। सबसे ज्यादा प्रतिवाद उनके द्वारा दिमागी नक्सली शब्द के प्रयोग पर हो रहा है।
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने यहां तक कह दिया कि, ‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व है।’ कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री पहले अपने विरोधियों को अर्बन नक्सल कहते थे और अब दिमागी नक्सल कह रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जिन मुद्दों को लेकर सरकार के विरोधियों को पहले अर्बन नक्सल या अब दिमागी नक्सल कहा जाता है, उनमें से कुछ मांगों या विचारों को सरकार बाद में स्वीकार करती रही है। सोशल मीडिया पर जाएंगे तो भारी संख्या में लोग स्वयं को दिमागी नक्सली और न जाने क्या-क्या कह रहे हैं। यह स्थिति चिंता पैदा करने वाली है किंतु आश्चर्यजनक नहीं।


पहले यह देखें कि आखिर प्रधानमंत्री ने कहा क्या? प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमने नक्सलवाद खत्म करने का संकल्प लिया था। नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया। नक्सलवाद ने चार-पांच दशक तक हिंदुस्तान के बहुत बड़े हिस्से को, बहुत बड़ी आबादी को बंदूक की नोक पर दबोच रखा था। संविधान की धज्जियां उड़ा दी थीं। देश के समान्य नागरिकों की रक्षा में 3500 से ज्यादा सुरक्षा बल के जवान शहीद हुए। उन्होंने कहा कि उनको खुशी है कि नक्सलवादी-माओवादी हिंसा को आखिरी सांस लेने की ताकत भी नहीं बची। जहां पर कभी नक्सलियों की गोलियां चलती थी, जहां कभी धरती रक्तरंजित रहा करती थी, आज उन्हीं नक्सल क्षेत्रों में विकास, विश्वास और प्रयास का तिरंगा लहरा है।
इसके आगे उन्होंने कहा कि हमें सावधान रहने की जरूरत है। हथियारबंद नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल मौके की तलाश में हैं। समाज को गलत राह पर ले जाने के लिए तरह-तरह के काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘ऐसे लोग हिंसा अराजकता के रास्ते खोज रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन्हें युवाओं को भटकाने से बचाना होगा और इन्हें आइसोलेट करना होगा और विकसित राष्ट्र बनाने की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।’ यह ऐसी बात है जिनका परिप्रेक्ष्य व्यापक है तथा महान भारत के सपने के बड़े लक्ष्य से जुड़ा है। हथियारबंद नक्सलवाद देश से समाप्त हो गया, यह ऐसी उपलब्धि है जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की हो। प्रधानमंत्री ने नक्सलियों के कब्जे वाले क्षेत्र में शांति सुकून और विकास की स्थिति का जो विवरण दिया उसे कोई नकार नहीं सकता।
किंतु यह भी सच है कि अब एक दूसरे किस्म की झूठ के द्वारा कृत्रिम असंतोष और हिंसक अराजकता पैदा करने की कोशिश लगातार चल रही है। उदाहरण के लिए हाल के कुछ आंदोलन को देखिए। सरकार ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक रूप से उत्पीड़ित गैर मुसलमानों के लिए नागरिकता कानून में संशोधन किया तो उसके विरुद्ध दिल्ली के शाहीनबाग में धरना शुरू हुआ। देखते-देखते देश और दुनिया में इसका दुष्प्रचार हुआ। धरनास्थल सड़क पर स्थायी निर्माण कर दिए गए। अगर कोरोना संकट नहीं आता तो इनको हटाना मुश्किल था। इसके कारण हिंसा हुई और अंततः दिल्ली में दंगे तक हो गए। मुसलमानों और दूसरे तत्वों को भड़काया गया कि आपकी नागरिकता चली जाएगी। आज तक किसी की नागरिकता नहीं गई। साफ है कि इसके पीछे देश में हिंसक अराजकता ही पैदा करने की कोशिश थी।
कृषि कानून विरोधी आंदोलन को देख लीजिए। उसे आंदोलन में वास्तविक किसान भी थे। लेकिन अराजक तत्व हावी रहे। दिल्ली को चारों ओर से घेरा गया। 26 जनवरी के दिन दिल्ली की सड़कों पर ट्रैक्टर ऐसे दौड़ रहे थे मानो हथियारबंद गाड़ियां हो। भारी संख्या में लोग लाल किले पर चढ़कर पुलिस वालों को धक्के देकर नीचे गिराया। काफी संख्या में हमारे जवान घायल भी हुए। अगर उस दिन पुलिस कठोर कार्रवाई करती तो कैसा दृश्य होता है, इसकी कल्पना करिए। एक किसान नेता ने बाद में कहा कि थोड़ी गलती हो गई, संसद तक पहुंच जाते तो बांग्लादेश उसी दिन दोहरा देते।

आप इस प्रकार के विचार और व्यवहार को क्या कहेंगे? अभी हाल में कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर से दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन हुआ। नीट या किसी परीक्षा के प्रश्न पत्र लीक होने के विरुद्ध आवाज उठाने, संघर्ष करने, आगे ऐसा न हो इसके लिए सरकार पर दबाव बढ़ाने में समस्या नहीं है। किंतु वहां नारे क्या लग रहे थे? कोई आजादी के नारे लगा रहा था, कोई 370 हटाने का, कोई शरजिल इमाम के चिकन नेक को काटने का समर्थन कर रहा था तो कोई मेरा लिंग मेरा अधिकार तो कोई समलैंगिकता को लेकर झंडा उठाए हुए था। जिस तरह प्रधानमंत्री के लिए शब्दों का प्रयोग हुआ और जैसे पोस्टर दिखाए गए उनसे शर्म से सर झुक जाए। ऐसी बातें बोली गईं कि वाकई एक वर्ग में गुस्सा पैदा हुआ। उस आंदोलन में ऐसे तत्व शामिल थे जो चेहरा ढंककर पत्थरबाजी कर रहे थे, पुलिस की गाड़ियां तोड़ रहे थे, पुलिस से मुठभेड़ कर रहे थे और अंततः संसद मार्च के नाम पर संसद की दीवार तक पहुंच गए। पुलिस ने उनके विरुद्ध जो कुछ किया उस पर खूब चर्चा हो रही है, मुद्दा बनाया जा रहा है लेकिन दूसरी ओर इस तरह की हिंसक अराजकता पर विरोधी एक शब्द बोलने को तैयार नहीं।
मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिनवाद, माओवाद इन सबकी विचारधारा का मुख्य केंद्र धर्म का नकार रहा है। हालांकि मार्क्स ने रिलिजन शब्द का प्रयोग किया। भारतीय संदर्भ में धर्म और रिलिजन का अंतर है लेकिन इस विचारधारा के लोग दोनों को समान मानते हैं। पिछले लंबे समय से हिंदू धर्म या सनातन धर्म के विरुद्ध कितने बयान दिए गए और हिंदुत्व पर काम करने वाले लोगों को फासिस्ट, सांप्रदायिक और न जाने क्या-क्या कहा गया। लोगों के अंदर चाहे राम मंदिर निर्माण हो या इस तरह के कोई अन्य कार्य पूरा प्रचार हुआ कि देश को इसकी आवश्यकता नहीं है। कोई प्रश्न उठाता कि क्या इससे रोजगार मिलेगा? क्या इससे स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार हो जाएगा? यह सब छद्म रुप में माओवाद और नक्सलवाद ही है।

आखिर मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे कांग्रेस के अध्यक्ष अगर सनातन का विरोध करते हैं और उनके पुत्र इसके लिए झंडा उठाते हैं तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए? विडंबना देखिए कि आजकल ये सब कहते हैं कि हम भी हिंदू हैं और हिंदू धर्म पर हमारा भी विश्वास है और उस रूप में बातें की जाती है।
राहुल गांधी जी ने तो फैजाबाद लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद कह दिया कि हमने अयोध्या आंदोलन को ही हरा दिया। सनातन को डेंगू, मलेरिया, विषाणु कहने वाले के विरुद्ध एक शब्द नहीं। कुछ कर्मचारियों द्वारा श्रीराम मंदिर चढ़ावे की चोरी जैसे निकृष्ट अपराध और पाप को ऐसे प्रस्तुत किया गया जैसे श्रीराम मंदिर के लिए काम करने वाली पार्टियों और संगठनों ने लूट मचाया है। ये सब विचार लोगों में केवल गुस्सा और अतिवादी भाव ही पैदा नहीं करते हैं, मंदिर और धर्म में आस्था पर भी चोट पहुंचाते हैं
वैसे भी देश में माओवाद या नक्सलवाद विचारधारा को महिमामंडित करने वाली पुस्तकें, पत्रिकाएं, प्रचार भारत में लंबे समय से रही तथा ऐसे लोग थे जिन्होंने हथियार उठाकर संघर्ष करने की प्रेरणा ही नहीं दी, उसके लिए लगातार संसाधन दिए। माओवाद को विश्वविद्यालयों से लेकर कला, संस्कृति के क्षेत्र में महान रोमांसवादी विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया गया जिसमें आम लोगों के शोषण और दमन से मुक्ति के साथ एक अलग किस्म की राज्य व्यवस्था का सपना था। हालांकि धीरे-धीरे संदर्भ, कल्पना, चरित्र और संपूर्ण आचरण में बदलाव आने लगा। आश्चर्य की बात है कि अपने कार्यकाल में नक्सलवादियों द्वारा सुरक्षा बलों की बारुदी सुरंग से हत्या या फिर स्वयं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के अधिकतम वरिष्ठ नेताओं को एक ही दिन में समाप्त करने जैसी घटनाओं के बाद जिस नक्सलवाद को चिदम्बरम ने आतंकवाद की संज्ञा देकर उसे समूल नाश करने का संकल्प लिया, वे ऐसी बातें बोल रहे हैं। हिंसा से तो किसी शासन को समस्या थी किंतु मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद को वैज्ञानिक विचारधारा कहा जाता था और यह धर्म, परंपरा आदि को अंधविश्वास कह कर नकारता था इसलिए अंतर्मन में इसके समर्थन का भी भाव था।
विरोधी प्रधानमंत्री को कुछ भी कहें लेकिन उनकी चेतावनी सच है कि मानसिक नक्सलियों से भारत को हर दृष्टि से सुरक्षित बनाने के लिए सतर्क और सचेत रहना होगा। हमें विश्व शक्ति बनना है तो इन तत्वों को समाज की मुख्यधारा से बाहर करना ही होगा। यह संघर्ष ज्यादा कठिन है।
– अवधेश कुमार

