राजनीतिक मंचों और अकादमिक बहसों में जब पितृसत्ता का विखंडन और व्यक्तिगत पहचान के आकर्षक नारों का सहारा लिया जाता है, तब इसके पीछे की वैचारिक दिशा को गहराई से समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है। हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के मंच से विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा दिए गए वक्तव्य इस वैचारिक विसंगति के प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर उभरे हैं।
एक तरफ जहाँ हिंदू समाज की सहस्राब्दियों पुरानी परंपराओं, पारिवारिक मूल्यों और प्राचीन ग्रंथों पर सीधा और विकृत प्रहार किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ अन्य सेमेटिक या इब्राहिमी मजहबों में गहराई से रची-बसी सख्त और बाध्यकारी पितृसत्तात्मक व्यवस्थाओं पर पूरी तरह मौन साध लिया जाता है।
यह वैचारिक चयनात्मकता किसी सार्वजनिक मंच पर तब खुलकर सामने आती है जब हिंदू समाज की आधुनिक युवतियों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के आधार पर हिंदू संस्कारों और पारिवारिक ताने-बाने पर कटाक्ष किए जाते हैं। पुणे के उस मंच पर जींस और टी-शर्ट पहने, बिना किसी आवरण या दुपट्टे के पहुँची स्वतंत्र भारतीय युवतियों की उपस्थिति के बीच जब ‘पारिवारिक बंधनों’ और ‘पितृसत्ता’ को कटघरे में खड़ा किया जा रहा था, ठीक उसी मंच और उसके आसपास सिर से पैर तक हिजाब और बुर्के में ढकी महिलाओं की उपस्थिति भी दर्ज की गई थी। विडंबना यह रही कि जो मंच जींस पहने लड़की के माध्यम से परंपराओं को संकीर्ण बता रहा था, उसी मंच से हिजाब में लिपटी महिला की मजहबी बाध्यताओं पर एक शब्द भी नहीं कहा गया।
इस सार्वजनिक मंच का दोहरा मापदंड और चयनात्मक चुप्पी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। एक तरफ जहां एक पुरुष को चार विवाह करने की मजहबी छूट को व्यक्तिगत या धार्मिक स्वतंत्रता का नाम देकर अनदेखा कर दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ ‘स्मैश पैट्रियार्की’ का नारा केवल एक ही संस्कृति पर लागू करने का प्रयास होता है।
इसी प्रकार, जहाँ एकतरफा तलाक का अधिकार पुरुष के पास केंद्रित रहा और हलाला जैसी अमानवीय प्रक्रियाओं से महिलाओं को गुजरना पड़ा, वहाँ आधुनिकतावादी विमर्शकार पूरी तरह चुप्पी साध लेते हैं। इस्लामी मान्यताओं के तहत किसी महिला का बिना किसी पुरुष रिश्तेदार (मेहरम) के अकेले यात्रा न कर पाना जैसी सख्त पाबंदियों पर कभी स्वतंत्रता और स्वायत्तता का नारा लागू नहीं किया जाता।
हिंदू समाज को हीनभावना से ग्रस्त करने के लिए मनुस्मृति को बार-बार संदर्भ से काटकर विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाता है। पुणे के मंच से राहुल गांधी ने मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि महिला को पिता, पति या पुत्र के अधीन बताने वाली सोच एक शर्मनाक दृष्टिकोण है। किंतु इस संदर्भ को ऐतिहासिक और सामाजिक संतुलन के बिना प्रस्तुत करना अनुचित है।
ऐतिहासिक रूप से सामाजिक सुधार आंदोलनों के दौरान मनुस्मृति के कुछ अंशों पर तीखी बहसें हुईं और डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने सामाजिक असमानता के विरोध में आलोचनात्मक विचार रखे, लेकिन उन्होंने प्राचीन भारतीय विधि शास्त्र (हिंदू लॉ) में वर्णित स्त्रीधन (महिला की निजी संपत्ति) की अवधारणा को अत्यंत प्रगतिशील माना। उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार करते समय प्राचीन हिंदू शास्त्रकारों की उस उदार व्यवस्था का समर्थन किया, जिसमें महिलाओं को संपत्ति पर पूर्ण सर्वाधिकार दिया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू परंपरा में महिलाओं के अधिकारों के जो मौलिक सूत्र मौजूद थे, उन्हें आधुनिक कानून का रूप दिया जाना चाहिए।
वहीं महात्मा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू सहित स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख नेताओं ने भारतीय समाज की मूल नैतिक और पारिवारिक अवधारणा को कभी पूरी तरह खारिज नहीं किया। गांधी जी ने सदैव भारतीय कुटुंब प्रणाली का समर्थन किया। यहाँ तक कि पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान भी सरकारी और प्रामाणिक प्रकाशन संस्थानों द्वारा मनुस्मृति और अन्य स्मृतियों के प्राचीन संस्करणों को भारतीय विधिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मुद्रित और संरक्षित किया गया था।
जिस हिंदू संस्कृति पर महिला-विरोधी होने का अनर्गल आरोप लगाया जाता है, वह विश्व की एकमात्र ऐसी सनातन परंपरा है जहाँ वेदों में 22 से अधिक ऋषिकाओं (जैसे अपाला, लोपामुद्रा, मैत्रेयी, गर्गा और संध्या) के मंत्रों और दर्शन को सर्वोच्च आध्यात्मिक दर्जा प्राप्त है। मनुस्मृति का मूल विचार स्पष्ट करता है :
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
(अर्थात : जहाँ स्त्रियों का आदर और सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं; और जहाँ ऐसा नहीं होता, वहाँ सभी कर्म निष्फल हो जाते हैं।)
भारतीय संस्कृति में संपत्ति, अधिकार और नेतृत्व में नारी की भूमिका प्राचीन काल से सर्वोपरि रही है। कानून और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में संपत्ति खरीदने या धारण करने में कोई लिंग-आधारित बाध्यता नहीं रही है; इतिहास साक्षी है कि लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा साम्राज्य का कुशल प्रशासनिक व सैन्य संचालन करने के साथ देशभर में सांस्कृतिक पुनरुद्धार कराया, वहीं रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नम्मा और रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं ने सिद्ध किया कि भारत में सत्ता और राष्ट्र-रक्षा का दायित्व मातृशक्ति ने अग्रिम पंक्ति में रहकर संभाला है।
इसके विपरीत, इब्राहिमी कानूनी व्यवस्थाओं और शरिया नियमों में के अनुसार अदालती मामलों में भी दो महिलाओं की गवाही को एक पुरुष की गवाही के बराबर माना जाता है।
हिंदू / भारतीय दृष्टिकोण से नारी को अर्धांगिनी (पुरुष की पूरक) और गृहलक्ष्मी का सर्वोच्च दर्जा दिया गया है। धार्मिक अनुष्ठान पत्नी के बिना अपूर्ण माने गए हैं। विवाह को दो आत्माओं का सात जन्मों का पवित्र संस्कार और नैतिक दायित्व माना गया है। राष्ट्र को भारत माता के रूप में और सर्वोच्च शक्तियों को देवी स्वरूप में पूजने की परंपरा है।
इब्राहिमी/सेमेटिक (विशेषकर इस्लामी) दृष्टिकोण से विवाह को मुख्य रूप से एक कानूनी संविदा (Contract / निकाहनामा) माना जाता है। इसके तहत पुरुष को धार्मिक व कानूनी रूप से एक से अधिक (चार तक) विवाह करने की अनुमति दी गई है, तथा पारंपरिक नियमों में एकतरफा तलाक और हलाला जैसी प्रक्रियाएँ भी शामिल रही हैं। इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए आवरण (हिजाब/पर्दा) अनिवार्य माना गया है।
जैसा कि कहा जा रहा है कि भारतीय परिवार प्रणाली और सांस्कृतिक चेतना को तोड़ने का यह प्रयास केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक अंतरराष्ट्रीय वैचारिक नेटवर्क का हिस्सा है। सितंबर 2021 में अमेरिकी विश्वविद्यालयों के मंचों से आयोजित ‘Dismantling Global Hindutva’ सम्मेलन और ‘हेनरी लूस फाउंडेशन’ द्वारा प्रायोजित विमर्शों ने भारतीय समाज को जातियों और लैंगिक संघर्ष (Gender War) में बांटने का खाका तैयार किया। इसके बाद विभिन्न मंचों पर ‘Eradication of Sanatan Dharma’ जैसे वक्तव्य आयोजित किए गए। पुणे के मंच से दिया गया ‘स्मैश पैट्रियार्की’ का नारा इसी विदेशी स्क्रिप्ट और एजेंडे को भारत में लागू करने का एक छद्म माध्यम प्रतीत होता है।
वास्तविक महिला सशक्तिकरण परिवार को तोड़ने या पश्चिमी वैचारिक आयात से नहीं, बल्कि महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सामाजिक रूप से निर्णय लेने की स्थिति में लाने से होता है। धरातलीय नीतियों का उदाहरण देखें तो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत निर्मित 4 करोड़ से अधिक मकानों में से लगभग 3 करोड़ घरों की मालकिन गरीब महिलाएँ बनी हैं। 55 करोड़ से अधिक जनधन खातों में 60% से अधिक खाते महिलाओं के हैं, जिसने उन्हें आर्थिक स्वावलंबन दिया। थलसेना, वायुसेना और नौसेना में महिलाओं को परमानेंट कमीशन देकर रक्षा सेवाओं के सर्वोच्च पदों के द्वार खोले गए हैं, जबकि ड्रोन दीदी और लखपति दीदी जैसी योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं को तकनीक और स्वरोजगार से जोड़ा है।
भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष के बीच अधिकारों का संघर्ष नहीं, बल्कि पारस्परिक पूरकता का दर्शन रहा है। पश्चिमी विचार जहाँ स्वतंत्रता को केवल व्यक्तिगत उपभोग और देह-केंद्रित दृष्टि से देखता है, वहीं भारतीय संस्कृति स्वतंत्रता को नैतिक दायित्व, स्नेह और परिवार-व्यवस्था के संतुलन के साथ देखती है। राजनीतिक स्वार्थ, चुनिंदा बयानबाजी और विदेशी एजेंडे के तहत भारतीय परिवारों को शोषण का केंद्र बताना और हिंदू संस्कारों को कटघरे में खड़ा करना अंततः देश की सामाजिक स्थिरता और सांस्कृतिक रीढ़ को कमजोर करने का ही एक प्रयास है।
अतः, भारतीय युवा को वैचारिक भ्रम और सांस्कृतिक विखंडन के इस जाल को पहचानना होगा। अपनी महान परंपरा और मूल्यों पर गर्व करते हुए, हमें अपनी असीम ऊर्जा को विध्वंस के नारों में गँवाने के बजाय राष्ट्र के सकारात्मक व रचनात्मक निर्माण में लगाना होगा।
– अखिलेश चौधरी

