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नवाचार और लीक से हटकर सिखाने की प्रेरणा है ‘शिक्षक’

नवाचार और लीक से हटकर सिखाने की प्रेरणा है ‘शिक्षक’

by हिंदी विवेक
in शिक्षा
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शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ने वाला शिल्पकार है। वह विद्यार्थी को सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं देता, बल्कि जीवन को समझने, परिस्थितियों से जूझने, असफलताओं से सीखने और अपने भीतर संभावनाओं को पहचानने की दृष्टि भी प्रदान करता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में गुरु को केवल शिक्षक नहीं, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक माना गया है। आज जब शिक्षा तेजी से बदलते सामाजिक, तकनीकी और आर्थिक परिवेश के बीच नई चुनौतियों का सामना कर रही है, तब शिक्षक की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। नवाचार, रचनात्मकता और लीक से हटकर सिखाने की क्षमता आज के शिक्षक की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

अज्ञान से ज्ञान और संभावना से सामर्थ्य तक

‘गुरु’ का पारंपरिक अर्थ अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक से जुड़ा है। वास्तव में शिक्षक का कार्य भी यही है। वह विद्यार्थी को अज्ञान से ज्ञान, संकोच से आत्मविश्वास और संभावनाओं से सामर्थ्य की ओर ले जाता है। हम आज जो कुछ भी हैं, उसमें हमारे माता-पिता के साथ-साथ किसी न किसी शिक्षक की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका अवश्य रही है। जीवन में ऐसे अनेक शिक्षक मिलते हैं जो किसी विषय की पुस्तक पढ़ाते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो स्वयं अपने आचरण से जीवन का पाठ पढ़ा जाते हैं। उनके शब्द समय के साथ भले ही धुंधले पड़ जाएं, लेकिन उनके संस्कार जीवनभर हमारे भीतर बने रहते हैं। इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को धन्यवाद कहने का अवसर नहीं है। यह उन मूल्यों को याद करने का दिन भी है, जो हमें अपने शिक्षकों से मिले और जिनके आधार पर हम समाज तथा राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

शिक्षक बनाता नहीं, गढ़ता है

शिक्षक वह है जो केवल ‘बनना’ नहीं, बल्कि स्वयं को ‘गढ़ना’ सिखाता है। वह केवल सफलता का उत्सव मनाना नहीं, बल्कि असफलता के बाद दोबारा खड़े होना सिखाता है। वह केवल आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दिखाता, बल्कि रास्ते में आने वाली बाधाओं से जूझने का साहस भी देता है। एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को तर्क और कुतर्क का अंतर समझाता है। वह प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता देता है और जिज्ञासा को दबाने के बजाय उसे दिशा देता है। वह विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता, बल्कि जीवन की परीक्षा के लिए तैयार करता है। आज के दौर में यही दृष्टिकोण और महत्वपूर्ण हो गया है। तकनीक ने जानकारी तक पहुंच आसान कर दी है, लेकिन जानकारी और ज्ञान में अंतर समझाने की भूमिका अभी भी शिक्षक की ही है। इंटरनेट सूचना दे सकता है, लेकिन सूचना का सही अर्थ समझना, उसका विवेकपूर्ण उपयोग करना और उससे जीवन के लिए सही निष्कर्ष निकालना शिक्षक ही सिखाता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और शिक्षक की नई भूमिका

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की दिशा प्रस्तुत करती है। इसके केंद्र में विद्यार्थियों के समग्र विकास, भारतीय भाषाओं और संस्कृति के प्रति जुड़ाव तथा शिक्षा में नवाचार की भावना को मजबूत करने की आवश्यकता दिखाई देती है। राष्ट्रपति कार्यालय ने भी शिक्षक दिवस के संदर्भ में शिक्षकों द्वारा शोध, प्रयोग और नवाचार के माध्यम से अपनी क्षमता बढ़ाने तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन की भूमिका को रेखांकित किया है। लेकिन किसी भी नीति की सफलता केवल उसके दस्तावेज में नहीं, बल्कि उसके धरातल पर प्रभावी क्रियान्वयन में होती है। यहां शिक्षक की भूमिका निर्णायक हो जाती है। शिक्षक ही नीति के विचारों को कक्षा-कक्ष तक पहुंचाता है और उन्हें विद्यार्थी के व्यवहार तथा सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा बनाता है। इसलिए आने वाले समय में शिक्षक को केवल ‘पढ़ाने वाला’ नहीं, बल्कि ‘फैसिलिटेटर’, मार्गदर्शक, शोधकर्ता और नवाचारकर्ता के रूप में अपनी भूमिका को विस्तार देना होगा।

शिक्षा को मिशन बनाना होगा

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन इस बात का उदाहरण है कि शिक्षा को केवल नौकरी या पेशे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व के रूप में देखा जा सकता है। भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को उनके जन्मदिवस के अवसर पर राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है। वे देश के दूसरे राष्ट्रपति होने के साथ-साथ महान दार्शनिक और शिक्षाविद् भी थे। शिक्षा को मिशन बनाने का अर्थ है कि उसकी पहुंच समाज के अंतिम व्यक्ति तक हो। आज भी हमें ऐसी पहल की आवश्यकता है, जिसमें समाज का प्रत्येक सक्षम व्यक्ति शिक्षा के प्रसार में अपना योगदान दे। मोहल्लों, गांवों और वंचित क्षेत्रों में सामुदायिक शिक्षा केंद्रों जैसी पहलें इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यदि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति सप्ताह में कुछ घंटे भी किसी बच्चे को पढ़ाने, मार्गदर्शन देने या उसके कौशल विकास में योगदान देने का संकल्प ले, तो शिक्षा के विस्तार का यह अभियान व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

कक्षा से बाहर निकले शिक्षा
आज शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि विद्यार्थी जो सीख रहा है, उसे वास्तविक जीवन से कैसे जोड़ा जाए। शिक्षा यदि केवल परीक्षा और प्रमाणपत्र तक सीमित रह जाए तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। हमें शिक्षा को कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकालकर जीवन और आजीविका से जोड़ना होगा। विद्यार्थियों में संवाद, समस्या समाधान, तकनीकी दक्षता, रचनात्मकता, नेतृत्व और उद्यमिता जैसे कौशल विकसित करने होंगे।

शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाने की क्षमता विकसित करना नहीं, बल्कि रोजगार के नए अवसर पैदा करने की क्षमता भी विकसित करना होना चाहिए। स्व-रोजगार, कौशल आधारित शिक्षा और स्थानीय संसाधनों पर आधारित उद्यमिता को शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाना समय की आवश्यकता है। कोविड-19 ने भी हमें यह समझाया कि शिक्षा के पारंपरिक तरीकों के साथ डिजिटल और वैकल्पिक माध्यमों को अपनाना कितना आवश्यक है। भविष्य की चुनौतियों के लिए विद्यार्थियों को इस तरह तैयार करना होगा कि वे परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढाल सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।

Teach For India Fellowship: Leadership and Impact in Education | Teach For  India posted on the topic | LinkedIn
शिक्षक स्वयं सबसे बड़ा उदाहरण

शिक्षक का सबसे प्रभावी पाठ उसकी अपनी जिंदगी होती है। विद्यार्थी शिक्षक के शब्दों से जितना सीखता है, उससे कहीं अधिक उसके व्यवहार को देखकर सीखता है। यदि शिक्षक समय की पाबंदी सिखाता है, तो उसका स्वयं समय का सम्मान करना आवश्यक है। यदि वह संवेदनशीलता की बात करता है, तो उसके व्यवहार में संवेदनशीलता दिखाई देनी चाहिए। यदि वह विद्यार्थियों से प्रश्न पूछने की अपेक्षा करता है, तो उसे स्वयं भी विद्यार्थियों के प्रश्नों का सम्मान करना होगा। यही शिक्षक और शिक्षा के बीच का सबसे गहरा संबंध है—शिक्षक जो कहता है, उसे अपने जीवन में जीता भी है।

डॉ. राधाकृष्णन की विरासत

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जीवन शिक्षा और दर्शन के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। भारत सरकार के प्रकाशन प्रभाग के अनुसार उन्होंने अपने जीवन के लगभग 40 वर्ष शिक्षक के रूप में बिताए और भारतीय संस्कृति तथा दर्शन को भारत और पश्चिमी जगत के बीच संवाद का माध्यम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी विरासत हमें यह संदेश देती है कि शिक्षक होना केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी है। आज जब हम उनका जन्मदिवस शिक्षक दिवस के रूप में मनाते हैं, तो वास्तव में हम उस विचार का सम्मान करते हैं जिसमें शिक्षा को समाज परिवर्तन का माध्यम माना गया है।

संकल्प की जरूरत

आज शिक्षक दिवस के अवसर पर केवल शुभकामनाएं देने से आगे बढ़ने की आवश्यकता है। हमें यह विचार करना होगा कि हम शिक्षा को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं और शिक्षक की भूमिका को किस तरह अधिक प्रभावी बना सकते हैं। आइए, इस शिक्षक दिवस पर हम तीन संकल्प लें— शिक्षा को अधिक समावेशी बनाएंगे, सीखने को जीवन और रोजगार से जोड़ेंगे तथा नवाचार और रचनात्मकता को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे। शिक्षक अपने दायित्व को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित न रखे और समाज शिक्षा को केवल विद्यालय की जिम्मेदारी न माने। जब शिक्षक, परिवार और समाज मिलकर शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का साझा दायित्व मानेंगे, तभी ज्ञान की वह रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सकेगी, जिसकी कल्पना हमारी महान शिक्षा परंपरा ने की है।

आखिरकार, एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसके कितने विद्यार्थी परीक्षा में सफल हुए, बल्कि यह है कि उसके कितने विद्यार्थी जीवन में अच्छे इंसान बने, कितनों ने चुनौतियों के सामने हार नहीं मानी और कितनों ने समाज को कुछ बेहतर देने का प्रयास किया। इसलिए शिक्षक दिवस केवल शिक्षक के सम्मान का दिन नहीं, बल्कि अपने भीतर के विद्यार्थी को जीवित रखने और शिक्षा के माध्यम से बेहतर समाज बनाने के संकल्प का दिन भी है। यही डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और हमारे जीवन को दिशा देने वाले सभी शिक्षकों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

– प्रो. पवन सिंह

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