यूरोप, अमेरिका सहित अन्य देशों में गिनती के ही प्रमुख वैश्विक स्थल प्रसिद्ध है, परंतु भारत में विविध क्षेत्रों में हजारों ऐसे मनोरम आकर्षक पर्यटन स्थल उपस्थित है, जिन्हें देखकर दुनिया आश्चर्यचकित रह जाएगी। आवश्यकता है देश में पर्यटन के अनुकूल इकोसिस्टम विकसित करने की।
भारत को प्रकृति, इतिहास, संस्कृति और आध्यात्मिकता की दृष्टि से देखें तो कदाचित् ही दुनिया का कोई दूसरा देश इतनी व्यापक पर्यटन सम्पदा प्रस्तुत करता हो। हिमालय की बर्फ से लेकर थार के रेगिस्तान तक, नदियों, झीलों, जंगलों, झरनों और समुद्र तटों से लेकर द्वीपों, घाटियों और गुफाओं तक भारत में पर्यटन की असाधारण सम्भावनाएं हैं। इसके साथ ही यहां हजारों वर्ष पुरानी सभ्यताओं, मंदिरों, मठों, गुरुद्वारों, किलों, महलों और ऐतिहासिक नगरों की विरासत उपस्थित है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि भारत में पर्यटन की क्षमता है या नहीं बल्कि यह है कि इस क्षमता को विश्वस्तरीय और टिकाऊ पर्यटन व्यवस्था में कैसे बदला जाए।

भारत में पर्यटन का वर्तमान विस्तार इस सम्भावना को प्रमाणित करता है। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार 2024 में भारत में लगभग 99.52 लाख विदेशी पर्यटक आए और घरेलू पर्यटक यात्राओं की संख्या 2948.19 मिलियन रही। पर्यटन से इसी वर्ष लगभग 2.93 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा आय हुई। 2023 की तुलना में घरेलू पर्यटक यात्राओं में लगभग 17.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पर्यटन क्षेत्र ने 2023 से 24 में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 8.46 करोड़ रोजगारों को समर्थन दिया और सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 5.22 प्रतिशत का योगदान दिया।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। धार्मिक पर्यटन में काशी विश्वनाथ, अयोध्या, अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, पुरी, मदुरै का मीनाक्षी मंदिर, तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर, रामेश्वरम, तिरुपति और द्वारका जैसे केंद्र हैं। ऐतिहासिक पर्यटन में अजंता एलोरा, सांची, खजुराहो, हम्पी, महाबलीपुरम, चित्तौड़गढ़, गोलकुंडा और राजस्थान के किले शामिल हैं। दक्षिण भारत विशेष रूप से मंदिर, स्थापत्य और समुद्री विरासत का विशाल क्षेत्र है। तमिलनाडु में मदुरै, तंजावुर, महाबलीपुरम, रामेश्वरम, कन्याकुमारी और चेट्टीनाड; कर्नाटक में हम्पी, मैसूर, बादामी और पट्टदकल; केरल में कोच्चि, मुन्नार, अलप्पुझा और वायनाड; आंध्र प्रदेश में विशाखापत्तनम, तिरुपति और अराकू घाटी जैसे अनेक स्थल हैं। इसी प्रकार भारत में पर्वतीय पर्यटन, समुद्री पर्यटन, वन्यजीव पर्यटन, साहसिक पर्यटन, ग्रामीण पर्यटन, जनजातीय पर्यटन, चिकित्सा पर्यटन, स्वास्थ्य और योग पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, विरासत पर्यटन, कृषि पर्यटन तथा द्वीप पर्यटन की व्यापक सम्भावनाएं हैं।

अंडमान निकोबार, लक्षद्वीप, गोवा, पुडुचेरी और ओडिशा के समुद्र तट अलग प्रकार के पर्यटन अनुभव दे सकते हैं। कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश पर्वतीय पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण हैं। भारत के पास रेगिस्तान, हिम क्षेत्र, समुद्र, जंगल, नदियां, झीलें और घाटियां एक ही देश में उपलब्ध हैं। यही भारत को दूसरे देशों से अलग करता है।
अनेक देशों के कुछ ही पर्यटन स्थल विश्व प्रसिद्ध हैं, जबकि भारत के पास हजारों ऐसे स्थल हैं जिन्हें अभी व्यापक रूप से पर्यटन मानचित्र पर लाया जाना बाकी है। उदाहरण के लिए काशी केवल एक धार्मिक नगर नहीं बल्कि हजारों वर्षों से जीवित भारतीय नगरीय सभ्यता का उदाहरण है। तंजावुर केवल एक मंदिर का नगर नहीं बल्कि चोल स्थापत्य, मूर्तिकला, संगीत और ज्ञान परम्परा का केंद्र है। हम्पी केवल खंडहर नहीं बल्कि विजयनगर की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति की कहानी है। इसी प्रकार अजंता और एलोरा भारतीय कला, धर्म और तकनीकी दक्षता की असाधारण विरासत हैं, परंतु भारत के पर्यटन क्षेत्र की एक बड़ी समस्या पर्यटन का असमान वितरण है। कुछ प्रसिद्ध स्थानों पर अत्यधिक भीड़ रहती है, जबकि उनके आसपास के अनेक स्थल खाली रहते हैं।

हिमाचल इसका एक उदाहरण है। 2024 में राज्य में 1.81 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे। कुल्लू में लगभग 35.52 लाख और शिमला में लगभग 26.04 लाख पर्यटक आए। इससे स्पष्ट है कि कुछ केंद्रों पर पर्यटन का दबाव बहुत अधिक है। ऐसी स्थिति में यातायात, पार्किंग, जलापूर्ति, कूड़ा प्रबंधन और पर्यावरण पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। इसका समाधान यह है कि पर्यटन नीति का लक्ष्य केवल प्रसिद्ध स्थानों पर सुविधाएं बढ़ाना न हो बल्कि उनके आसपास नए पर्यटन केंद्र विकसित करना हो। यदि किसी शहर में भीड़ है तो उसके निकटवर्ती गांवों, प्राकृतिक स्थलों, ऐतिहासिक स्थानों और सांस्कृतिक केंद्रों को पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए। इससे पर्यटकों का दबाव भी विभाजित होगा और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। पर्यटन का विकास कुछ चुनिंदा शहरों तक सीमित करने के बजाए पूरे क्षेत्र में किया जाना चाहिए।
सरकार ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। स्वदेश दर्शन योजना के अंतर्गत 76 परियोजनाओं के लिए 5290.33 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए। इसके बाद स्वदेश दर्शन 2.0 को टिकाऊ और जिम्मेदार पर्यटन स्थलों के समग्र विकास पर केंद्रित किया गया है। इसमें आधारभूत सुविधाओं के साथ पर्यटन सेवाओं, मानव संसाधन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, गंतव्य प्रबंधन और प्रचार को भी महत्व दिया गया है। धार्मिक और विरासत पर्यटन के लिए प्रसाद योजना के अंतर्गत 54 परियोजनाओं के लिए 1726.74 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।
इन योजनाओं की विशेषता यह है कि सरकार अब केवल सड़क और भवन बनाने की सोच से आगे बढ़कर पर्यटन अनुभव विकसित करने पर भी ध्यान दे रही है। स्वदेश दर्शन 2.0 में गंगटोक सांस्कृतिक गांव, सोहरा जलप्रपात मार्ग, हम्पी में यात्री सुविधाएं, ममल्लपुरम में तट मंदिर का अनुभव क्षेत्र, मेघालय की गुफाओं का अनुभव क्षेत्र और शिलांग के सांस्कृतिक क्षेत्र जैसी परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत पर्यटन को स्थानीय संस्कृति और अनुभव से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। पूर्वोत्तर भारत इस संदर्भ में विशेष उदाहरण प्रस्तुत करता है। सिक्किम में संवेदनशील क्षेत्रों के लिए परमिट व्यवस्था, पंजीकृत मार्गदर्शक और नियंत्रित पर्यटन जैसी व्यवस्थाएं पर्यावरण संरक्षण के साथ पर्यटन को संतुलित करने का प्रयास हैं। अरुणाचल प्रदेश में भी स्थानीय संस्कृति, ग्रामीण आवास और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने की दिशा में काम हुआ है। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि पर्यटन का अर्थ केवल अधिक पर्यटक लाना नहीं बल्कि अनुशासित और जिम्मेदार पर्यटन वातावरण बनाना भी है।
भारत में पर्यटन के विकास के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता अच्छी योजना और स्थानीय प्रशासन की सक्रिय भागीदारी है। प्रत्येक प्रमुख पर्यटन स्थल पर पर्याप्त पार्किंग, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ शौचालय, पेयजल, प्राथमिक चिकित्सा, अग्निशमन, आपदा प्रबंधन और कूड़ा प्रबंधन की व्यवस्था होनी चाहिए। पहाड़ी, समुद्री और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक निर्धारण किया जाना चाहिए। जहां आवश्यकता हो वहां वाहनों और पर्यटकों की संख्या नियंत्रित की जानी चाहिए। पर्यटकों में नागरिक बोध विकसित करना भी उतना ही आवश्यक है। कूड़ा फेंकने पर प्रभावी जुर्माना, पर्याप्त कूड़ेदान, कूड़े का पृथक्करण और वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए। पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी दाायित्व मानने के बजाए पर्यटक, स्थानीय नागरिक, होटल संचालक, टैक्सी चालक और दुकानदार सभी को इसमें भागीदार बनाना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता प्रभावी प्रचार की है। भारत को अपने पर्यटन स्थलों को केवल स्थान के रूप में नहीं बल्कि उनकी कहानी के साथ प्रस्तुत करना होगा। तंजावुर को चोल सभ्यता के साथ, काशी को जीवित सभ्यता के साथ, अजंता एलोरा को भारतीय कला के साथ, हम्पी को विजयनगर की कहानी के साथ और कोच्चि को समुद्री व्यापार तथा सांस्कृतिक सम्पर्क के इतिहास के साथ प्रचारित किया जा सकता है। इसी प्रकार स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, लोककला, मंदिर परम्पराएं, संगीत, नृत्य और वास्तुकला को पर्यटन अनुभव का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। पर्यटन का सबसे बड़ा लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचना चाहिए। स्थानीय युवाओं को मार्गदर्शक, चालक, पर्वतीय प्रशिक्षक, हस्तशिल्प विक्रेता, होमस्टे संचालक और स्थानीय भोजन उद्यमी के रूप में प्रशिक्षित किया जाए। इससे पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करेगा और लोगों में अपने क्षेत्र की विरासत के प्रति स्वाभिमान भी बढ़ाएगा।
भारत के सामने आज एक बड़ा अवसर है। बढ़ता मध्यम वर्ग, बेहतर सड़क और रेल सम्पर्क, हवाई सेवाओं का विस्तार और डिजिटल माध्यमों से यात्रा की सरलता घरेलू पर्यटन को तेजी से बढ़ा रही है। आवश्यकता केवल नए होटल बनाने की नहीं बल्कि नए पर्यटन नगर, नए मार्ग और नए अनुभव विकसित करने की है।
अंततः भारत को पर्यटन में विश्व का अग्रणी देश बनने के लिए केवल अधिक पर्यटक नहीं बल्कि बेहतर पर्यटन चाहिए। बेहतर सुविधाएं, संतुलित क्षेत्रीय विकास, स्थानीय रोजगार, प्रभावी प्रचार, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक बोध इस दिशा के आधार स्तम्भ हैं। चम्बा और पांगी से लेकर चेट्टीनाड तक, कच्छ से लेकर कोणार्क तक, हम्पी से लेकर महाबलीपुरम तक और पूर्वोत्तर के गांवों से लेकर अंडमान के द्वीपों तक भारत के पास अनगिनत अपेक्षाकृत कम चर्चित स्थल हैं। यदि सरकार, प्रशासन, स्थानीय समाज और पर्यटन उद्योग मिलकर इन स्थलों को सुविधाओं, कहानी और प्रभावी प्रचार से जोड़ सकें तो भारत के पास न केवल दुनिया के सबसे बड़े पर्यटन बाजारों में शामिल होने बल्कि एक विशिष्ट भारतीय पर्यटन मॉडल प्रस्तुत करने का भी अवसर है।
शिवा पंचकरण

