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हिंदू समाज को कौन बाँट रहा है?

हिंदू समाज को कौन बाँट रहा है?

जातीय राजनीति, आरक्षण और बदलते सत्ता-समीकरण

by हिंदी विवेक
in सामाजिक
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आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में आज हमारा समाज एक ऐसे वैचारिक चौराहे पर खड़ा है जहाँ विकास की भौतिक परिभाषा ने हमारी प्राचीन सनातन जीवन-पद्धति और सांस्कृतिक चेतना को गहरे संकट में डाल दिया है। जब-जब पश्चिम के वैचारिक सांचों और नस्ल-आधारित प्रवृत्तियों को भारत की इस उर्वर भूमि पर जातिगत उपमाओं और कृत्रिम विभाजनों के साथ रोपने का प्रयास किया जाता है, तब-तब इस देश की मूल आत्मा आहत होती है।
यह राष्ट्र किसी यांत्रिक राज्य की भांति नहीं, बल्कि एक जीवंत और आध्यात्मिक इकाई के रूप में सांस लेता है, जहाँ समाज और शासन के बीच का जीवंत संवाद ही इसकी वास्तविक धुरी है। औपनिवेशिक काल के सुनियोजित षड्यंत्रों ने इस देश की सामाजिक और आर्थिक रीढ़ को इस प्रकार तोड़ा कि जो जातियां कभी इस राष्ट्र की आत्मनिर्भर व्यवस्था का मुख्य आधार थीं, उन्हें विदेशी नीतियों के माध्यम से श्रमिक या आश्रित बनने पर विवश कर दिया गया। स्वतंत्रता के पश्चात भी उसी औपनिवेशिक मानसिकता को पोषित करने वाले तत्वों ने समाज को ‘शोषित और शोषक’ की कृत्रिम विभाजक रेखाओं में उलझाकर रख दिया, ताकि इस देश की आंतरिक ऊर्जा को निरंतर क्षीण किया जा सके।

राजनीतिक परिदृश्य से एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के कमजोर होने के बाद उस वैक्यूम को भरने के लिए जिस प्रकार अल्ट्रा अंबेडकरवादी समूह और अल्ट्रा लेफ्ट इकोसिस्टम सक्रिय हुआ है, उसने समाज के ताने-बाने को एक नए संघर्ष में झोंक दिया है। ये समूह अपनी संकीर्ण राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और स्वार्थों के चलते राष्ट्र हित को पूरी तरह ताक पर रखने से भी गुरेज़ नहीं करते। सत्ता की लालसा में येन-केन-प्रकारेण अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए ये अपने ही वैचारिक मूलाधारों को छोड़कर अवसरवादी समीकरण गढ़ने से नहीं हिचकिचाते। इनके लिए राष्ट्र का व्यापक हित गौण है और इनका संपूर्ण उद्देश्य केवल अपनी राजनीतिक दुकान चलाना है।

कांग्रेस पार्टी भी इसी समीकरण को भुनाने के लिए इन ताकतों को मौन समर्थन दे रही है। इसके पीछे एक सुविचारित रणनीति है कि जितना अधिक सवर्ण बनाम दलित का यह ध्रुवीकरण बढ़ेगा, उतनी ही इन लठैत और संपन्न जातियों के सत्ता में आने की संभावना प्रबल होगी। उत्तर प्रदेश को इस विघटनकारी राजनीति की प्रयोगशाला बना दिया गया है। वहाँ का राजनीतिक गणित यह तय करता है कि यदि सत्ताधारी दल बाहर होता है, तो सवर्णों के खतरे में होने का तथाकथित नैरेटिव समाप्त हो जाएगा और उसके तुरंत बाद दबाव की राजनीति शुरू हो जाएगी, जिसमें निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग जैसे मुद्दे सबसे आगे होंगे।

यह टकराव केवल तात्कालिक राजनीतिक उठापटक नहीं है, बल्कि यह उस बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है जो 2014 के बाद अपनी आत्मरक्षा और अस्मिता के लिए हिंदुत्व की छतरी के नीचे आए विभिन्न समाजों को छिन्न-भिन्न करना चाहता है। सनातन हिंदुत्व के विचार को कभी भी अधर्मी और विध्वंसक शक्तियां स्वीकार नहीं कर सकतीं।

अमेरिका और पश्चिम में नस्ल के आधार पर चलने वाले अल्ट्रा लेफ्ट और वैचारिक प्रवृत्तियों के सिद्धांतों को भारत में जाति के चोले में ढालकर जिस प्रकार आईडेंटिटी पॉलिटिक्स के रूप में लागू किया जा रहा है, वह पूरी तरह बाहरी और कम्युनिस्ट थ्योरीज से प्रेरित है। विडंबना यह है कि इस गहरे जाल को समझने के लिए आज का प्रबुद्ध वर्ग तैयार नहीं है और कई लोग यह भ्रम पाल बैठे हैं कि वे इस वैचारिक लड़ाई को अकेले लड़ लेंगे।
इस भंवर से निकलने के लिए अभी गहरी और संयमित धैर्य की आवश्यकता है। अल्ट्रा अंबेडकरवाद की इस दूसरी लहर के गुब्बारे में हवा भरने दी जाए; जितना अधिक ये लोग अतिवादी आचरण करेंगे, उतना ही समाज इनसे दूर होता जाएगा।

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की इस बार होने वाली पराजय के बाद, यह लठैत ओबीसी वर्ग विशेषकर यादवों का समूह एससी-एसटी एक्ट के विरुद्ध मुखर होना शुरू हो जाएगा, क्योंकि तब उनके अपने राजनीतिक स्वार्थ आहत होंगे। यदि उत्तर प्रदेश में सत्ता पक्ष प्रचंड बहुमत के साथ वापसी करता है, तो यह सारे विघटनकारी समीकरण स्वतः फेल हो जाएंगे और अल्ट्रा अंबेडकरवादी राजनीति केवल कुछ सिमटे हुए पॉकेट्स तक ही सीमित रह जाएगी।
एक समय में जो वृहद नेटवर्क इस राजनीति को खड़ा करने में सक्रिय था, क्या सनातन और हिंदुत्व के इस सांस्कृतिक विजय रथ के आगे वे शक्तियां शांत बैठेंगी जिनकी पूरी राजनीति ही समाज को जातियों में बांटने और अपने स्वार्थ साधने की रही है? वे कभी शांत नहीं बैठेंगी। वे सत्ता में प्रवेश पाने के लिए अपने विरोध को और अधिक उग्र करेंगी और आज मैदान में वही हो रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में हमारे अपने लोगों और संगठन की सबसे बड़ी भूल यह रही कि उन्होंने सामान्य वर्ग के साथ नियमित संवाद का सेतु टूट जाने दिया। समाज में जब भी कोई अप्रत्याशित घटना घटी या विरोध के कोई स्वर फूटे, उसे समय रहते समझा नहीं गया। सरकार एससी-एसटी एक्ट, यूजीसी के प्रावधानों और वर्तमान आरक्षण सुधार आंदोलनों के संदर्भ में पीछे छूट गई।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि शासन सत्ता में बैठे लोग सामान्य वर्ग के सभी गुटों से एक साथ संवाद स्थापित करें, उनकी समस्याओं का व्यापक समाधान खोजें और उन लोगों से भी संवाद करें जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं। जब तक सरकार दोनों पक्षों को साथ लेकर नहीं चलेगी, तब तक इस देश को इस अंतहीन टकराव से बचाना कठिन होगा। जितना यह टकराव बढ़ेगा, उतना ही वह हिंदुत्व के विराट विचार और हिंदू एकता के लिए घातक साबित होगा।
इस प्रकार के गंभीर विवादों को सार्वजनिक मंचों पर हवा देने के बजाय बंद कमरों और पर्दे के पीछे संवाद के माध्यम से सुलझाया जाना चाहिए। सनातन संस्कृति की मूल चेतना ‘वादे-वादे जायते तत्त्वबोधः’ यानी संवाद के माध्यम से ही परम सत्य और समाधान तक पहुँचने के सिद्धांत पर आधारित है। किंतु आज विडंबना यह है कि सदियों पुरानी इस महान भारतीय परंपरा को दरकिनार किया जा रहा है। वर्तमान समय में समाज को भ्रमित करने के लिए जो कृत्रिम टकराव रचा जा रहा है, वह पूरी तरह से अल्ट्रा लेफ्ट इकोसिस्टम, वैश्विक ताकतों और मिशनरी ताकतों का एक सुनियोजित षड्यंत्र है।

आज स्थिति यह हो चुकी है कि सामान्य वर्ग को यह महसूस हो रहा है कि राज्य उसके साथ अन्याय कर रहा है, जबकि दूसरी ओर एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों में भी एक अजीब असंतोष व्याप्त है जहाँ वे राज्य को ‘सोने का अंडा देने वाली मुर्गी’ के रूप में देखने लगे हैं।

स्वतंत्रता के पश्चात अपनाई गई समाजवादी नीतियों के कारण सरकारी नौकरियों का ‘देवत्व’ इस सीमा तक बढ़ा दिया गया है कि आज उसका अर्थ केवल सुरक्षा, बिना जवाबदेही के लूट और आजीवन पेंशन मान लिया गया है। इस कृत्रिम देवत्व के कारण वास्तविक मैरिटोक्रेसी की बात करना ही राजनीतिक रूप से भयभीत करने वाला बन गया है, जिसके चलते लगातार आरक्षण के दायरे को बढ़ाया जा रहा है और अब निजी सेक्टर में भी आरक्षण की मांग के स्वर गूंजने लगे हैं। सामान्य वर्ग की कुछ ऐसी ज्वलनशील और तार्किक माँगे हैं जिन पर आज गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है:

१. यूजीसी (UGC) के विवादित नियमों को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए या उनमें न्यायसंगत सुधार किए जाएं।
२. एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए पुख्ता और व्यावहारिक प्रावधान बनाए जाएं।
३. आरक्षण की ऊपरी सीमा को किसी भी स्थिति में न तोड़ा जाए और निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग को सिरे से नकारा जाए।
४. आरक्षण के भीतर वर्गीकरण (Sub-categorization) लागू किया जाए ताकि उसका वास्तविक लाभ सचमुच वंचित और जरूरतमंद तक पहुंचे।

सोशल मीडिया के माध्यम से इन गंभीर मुद्दों को उठाने वाले छोटे और मध्यम स्तर के डिजिटल हैंडल्स और प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं का यह संघर्ष सराहनीय है। किंतु असली खेल कुछ और ही है। इस पूरी प्रक्रिया में भावनात्मक रूप से जुड़े लोगों को यह अंदाजा ही नहीं है कि कैसे उनका इस्तेमाल एक बड़े राजनीतिक जाल के रूप में किया जा रहा है। आने वाले महीनों, विशेषकर नवंबर के आसपास, इस असंतोष को एक सुनियोजित दिशा देने का प्रयास किया जाएगा। इसका मुख्य निशाना उत्तर प्रदेश के चुनाव होंगे और इसका उद्देश्य सामान्य वर्ग की जायज मांगें मनवाना नहीं, बल्कि सड़कों पर भीड़ का दबाव दिखाकर सरकार से राजनीतिक रूप से मोलभाव करना होगा। यह एक ऐसा ट्रैप है जिससे समाज को समय रहते बाहर निकलना होगा।

जाति पंचायतें, जो कभी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थीं, आज अचानक महाशक्तिशाली बन चुकी हैं। इसका कारण यह है कि विभिन्न जातीय समूहों के हाथों में ‘संगठन और भीड़ की शक्ति’ का ऐसा सूत्र लग गया है जिससे वे राजनीतिक दलों को आसानी से ब्लैकमेल कर सकते हैं।

कभी दो अलग ध्रुवों की जातियों को एक मंच पर लाकर सोशल इंजीनियरिंग की गई थी और बाद में इसी फार्मूले को छोटे-छोटे समूहों को जोड़कर सत्ता प्राप्त करने के लिए बेहतर ढंग से उपयोग किया गया। लेकिन पांच साल सत्ता का सुख भोगने के बाद अब इन जातीय समूहों के नेताओं को पूरी तरह ब्लैकमेलिंग की कला आ गई है। वे अपने पीछे खड़ी भीड़ के बल पर अपने निजी स्वार्थ साध रहे हैं। अब ‘सामाजिक न्याय’ का मुखौटा पहनकर केवल ‘निजी न्याय’ किया जा रहा है और संविधान के नाम पर हर समूह अपना अलग विधान चलाने लगा है। 2024 के बाद उपजातियों के भीतर भी जो चेतना आई है, उसने उन्हें अपने संकीर्ण स्वार्थों को राष्ट्र और हिंदू समाज के व्यापक हित से ऊपर रखने के लिए प्रेरित कर दिया है।

आज स्थिति यह हो गई है कि विभिन्न जातियां आपस में गाली-गलौज, हाथापाई और एक-दूसरे के प्रति घृणा के भाव से भर चुकी हैं और इन सबके बीच एक तीसरा और अत्यंत खतरनाक समूह छाया हुआ है— वह बीड़ी पीते हुए चुपचाप इन जातियों को आपस में लड़ते हुए देख रहा है। वह जानता है कि जब ये सब आपस में लड़-लड़कर पूरी तरह थक जाएंगे, तब वह अपना चाकू लेकर एक-एक को काट देगा। यही वह अदृश्य और विध्वंसक शक्ति है जो भारत को अंदर से खोखला करना चाहती है। यदि जातियां इसी तरह आपस में लड़ती रहीं, तो परिणाम भयावह होंगे और देश एक बार फिर 1990 के दशक के उस अराजक और अंधकारमय दौर में पहुँच जाएगा।

इस समस्या का दीर्घकालिक और स्थाई समाधान तभी संभव है जब हम सबसे पहले सरकारी नौकरियों के उस कृत्रिम ‘देवत्व’ को समाप्त करें, जमीनी स्तर पर उद्यमिता और स्टार्टअप्स को बढ़ावा दें और कृषि सुधारों को पूरी दृढ़ता के साथ लागू करें। जब तक समाज के भीतर झूठी शोषित-शोषक बाइनरी थ्योरीज के विरुद्ध एक वैचारिक और अकादमिक काउंटर खड़ा नहीं होता, तब तक यह संघर्ष थमेगा नहीं।
आज समाज के विचारकों और प्रबुद्ध वर्ग को इस दिशा में जुटना होगा, क्योंकि अगले 10 से 15 वर्षों में जब नई पीढ़ी इन झूठी और विदेशी थ्योरीज के खिलाफ मुखर होकर खड़ी होगी, तभी हिंदू एकता का वास्तविक मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

यदि आने वाले 30 से 40 वर्षों में आरक्षण और सामाजिक विसंगतियों के इस जाल को समाप्त नहीं किया गया, तो इस राष्ट्र का विनाश निश्चित है। यह आने वाले तीन-चार दशकों की एक निर्णायक वैचारिक लड़ाई है, जिसे धैर्य, संवाद और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा के साथ ही जीता जा सकता है।
भारतीय राज्य और इसके प्रशासनिक तंत्र की सबसे बड़ी भूल यह है कि वे इस विराट हिंदू समाज के मूल स्वभाव को एक ‘भेड़ के बाड़े’ की तरह हांकने योग्य मानते हैं। वे इस समाज की जीवंत चेतना और आत्मबल को आज तक समझ नहीं पाए हैं। यहाँ तक कि जो लोग स्वयं को हिंदुत्व के विचार के प्रणेता कहते हैं, वे भी इस समाज की गहराई को पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पाए हैं। इस समाज को सही अर्थों में समझने के लिए हमें अपनी प्राचीन वेदांत, स्मृति और श्रुति परंपरा के शाश्वत सूत्रों की ओर लौटना होगा।

हमारी श्रुतियों और स्मृतियों में निहित वसुधैव कुटुंबकम और एतत् साम्यं सर्वेषां भूतानाम् के सूत्र यह सिखाते हैं कि पूरा समाज एक ही चेतना का विस्तार है। जब हम इस दार्शनिक दृष्टि से देखते हैं, तो यह बोध होता है कि यह संपूर्ण हिंदू समाज किसी सामान्य भीड़ या जड़ वस्तु का समूह नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म नारायण का ही जीवंत विग्रह है; इस विराट समाज को समझने का अर्थ सीधे तौर पर साक्षात नारायण को ही आत्मसात करना है। इस राष्ट्र को चलाने और समझने के लिए केवल प्रशासनिक परीक्षाओं को पास कर लेना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए प्राचीन दार्शनिक ग्रंथों और सनातन सूत्रों का गहन अध्ययन आवश्यक है।

भारतीय राष्ट्र कोई पश्चिमी या यूरोपियन नेशन-स्टेट नहीं है, जहाँ समाज को एक ‘भेड़ के बाड़े’ की तरह हांका जा सके। हमारा समाज एक जीवंत, विराट और चेतना से परिपूर्ण प्रवाह है, जो हर कठिन परिस्थिति में अपनी राख से पुनर्जीवित होकर खड़ा होने की क्षमता रखता है।
यदि राज्य ने इसे यूरोपीय सिद्धांतों के चश्मे से देखकर इसके अधिकारों और स्वभाव को बाड़ों में बंद करने का दुस्साहस किया, तो यह सृजन शक्ति विनाशकारी रूप भी धारण कर सकती है। इसलिए, सत्ता और शासन में बैठे लोगों का यह मुख्य कर्तव्य होना चाहिए कि वे इस विराट समाज को दबाने के बजाय इसके धर्म-तत्त्व और आत्मीय चेतना को समझें। धैर्य, संवाद और सनातन संस्कृति के प्रति अटूट निष्ठा ही इस पूरे संकट से उबरने का एकमात्र मार्ग है।

– दीपक कुमार द्विवेदी

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