किसी घायल, बीमार अथवा संकट में फंसे बाघ को बचाना वन विभाग और वन्यजीव संरक्षण तंत्र की सबसे कठिन दायित्वों में से एक है। एक जंगली बाघ को सुरक्षित पकड़ना, उसे उपचार के लिए ले जाना और फिर परिस्थितियां अनुकूल होने पर वापस जंगल में छोड़ना, यह पूरी प्रक्रिया सतह पर जितनी सरल दिखाई देती वास्तव में उसके विपरीत उतनी ही कठिन है जो की अत्यंत सावधानी, विशेषज्ञता और संवेदनशीलता की मांग करती है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में एक ऐसा पक्ष है जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है और जिसकी ओर संभवतः हमारा ध्यान कम जाता है और वो है कि बाघ को जिस पिंजरे में बचाया और परिवहन किया जा रहा है, क्या वो पिंजरा स्वयं उसके लिए सुरक्षित है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जंगली बाघ और मानव-आदी या लंबे समय से कैद में रह रहे बाघ के व्यवहार में बड़ा अंतर होता है। जंगल से अचानक पकड़ा गया बाघ स्वाभाविक रूप से कैद से निकलने के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाकर निकलने का हर संभव प्रयास करता है। वह पिंजरे की सलाखों, दरवाजों और उपलब्ध किसी भी छोटे से अंतर को बाहर निकलने का संभावित रास्ता समझ सकता है। ऐसी स्थिति में यदि पिंजरे की डिजाइन उसके स्वाभाविक व्यवहार को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई है, तो बचाव की प्रक्रिया में ही चोट का जोखिम पैदा हो सकता है और ये कई बार देखा गया है की ये चोट स्थायी होती है।
वन विभागों में लंबे समय से इस्तेमाल होते आए पारंपरिक लोहे के पिंजरे को अगर आप ध्यान से देखेंगे तो उस पिंजरे का केवल एक बिंदु या कहे तो एक ही लक्ष्य स्पष्ट रूप से दिखाए देता है, और वो है कि पिंजरा टूटना नहीं चाहिए। तो फिर क्या अपनी या मानवो की सुरक्षा की दृष्टि से मुख्य रूप से निर्माण किया गया वो पिंजरा बाघों की सुरक्षा की दृष्टि से भी निर्माण नहीं किया जाना चाहिए, जो पिंजरा हमें सुरक्षा का आभास देता है, क्या वही पिंजरा बाघों के लिए भी उतना ही सुरक्षित है?
एक तनावग्रस्त बाघ जब बाहर निकलने की कोशिश करता है तो वह अपनी ताकत, पंजों, सिर और दांतों का इस्तेमाल कर सकता है। चौड़ी दूरी वाली सलाखों वाला पिंजरा ऐसी स्थिति में विशेष जोखिम पैदा कर सकता है। बाघ अपना मुंह सलाखों के बीच डाल सकता है और यदि उसका दांत किसी गैप में फंस जाए तथा वह पीछे हटे या जोर लगाए, तो दांत और मुंह में गंभीर चोट का खतरा पैदा हो सकता है। अक्सर हमने देखा है कि स्वयं को स्वतंत्र करने की जोर में बाघों के कैनाइन दांत टूट जाते हैं और अगर ऐसा हुआ तो फिर वो बाघ जंगल में वापस छोड़ने लायक नहीं बचता है और पूरे बचाव की प्रक्रिया को विफल बना देता है।
इसी प्रकार तेंदुए जैसे छोटे लेकिन अत्यंत फुर्तीले बड़े बिल्ली प्रजाति के जानवर भी कैद से निकलने के प्रयास में दरवाजे अथवा सलाखों पर जोर लगाते हुए नाक और चेहरे को अक्सर घायल कर लेते हैं। मैंने एक चिड़िया घर में हाल ही लाये गए एक जंगली बाघ को वेंटिलेशन के लिए दिए गए छत से लगे छोटे से मोखे या खिड़की तक कूदते हुए देखा है।
एक बात स्पष्ट है कि हमें एक जंगली बाघ के बचाव तथा उसके पुनर्वास में और किसी चिड़िया घर के मानव-आदि बाघ के स्थानानंतरण में अंतर को समझना होगा, जो मापदंड, जो दिशानिर्देश हम किसी मानव-आदि बाघ के लिए अपनाते हैं, वो किसी जंगली बाघ पर नहीं अपनाये जा सकते हैं। वर्तमान में दोनों के लिए लगभग एक ही प्रकार की प्रक्रिया को अपनाया जाता है। हमें दोनों प्रकार के बाघों के लिए अलग-अलग दिशानिर्देश तथा सुरक्षा नियमों को विकसित करना होगा।
पिंजरा केवल ऐसा नहीं होना चाहिए जिसे बाघ तोड़ न सके, पिंजरा ऐसा भी होना चाहिए जिसमें बाघ खुद को चोट भी न पहुंचा सके। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के “जंगल में अनाथ/छोड़ दिए गए बाघ के बच्चों और बूढ़े/घायल बाघों से निपटने के लिए मनाक संचालन प्रक्रिया” में बाघों के परिवहन के लिए पिंजरे के डिजाइन और निर्माण के संबंध में अत्यंत स्पष्ट तथा विशेष वर्णन दिए गए हैं। एनटीसीए के दस्तावेज में बाघ के औसत आकार तथा परिवहन पिंजरे के आंतरिक आयाम तक निर्धारित किए गए हैं। अब आवश्यकता केवल उसे व्यापक रूप से लागू करने की है।
एनटीसीए की दिशा निर्देशों के अनुसार एक एआई (AI) मॉडल के सहयोग से विकसित पिंजरे का चित्र
वैसे ये सोच केवल पिंजरे मात्र तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जंगली बाघों के बचाव तथा पुनर्वास के पूरे तंत्र में एक महत्वपूर्ण तंत्र उनके किसी चोट या बीमारी से पूरी तरह से उबरने की अवधी भी होती है, जिसमें की वो जंगली बाघ किसी चिड़िया घर या किसी बचाव केंद्र में होते हैं।
यदि हम मानते हैं कि परिवहन के दौरान जंगली बाघ को ऐसी संरचना में नहीं रखा जाना चाहिए जिसमें वह अपने दांत या शरीर के अन्य हिस्सों को फंसाकर घायल कर सके, तो यही सिद्धांत किसी चिड़िया घर या किसी बचाव केंद्र पर भी लागू होना चाहिए।
ऐसे में आम तौर पर चिड़िया घरो में तथा किसी बचाव केंद्र में रचना के रूप में उपयोग किये जा रहे चैन लिंक फेंसिंग की भी चिंता करने की आवयशकता है। सरलता से देखा जाये तो अगर चैन लिंक फेंसिंग की रचना इस प्रकार की है कि बाघ उसके अंतर में अपने पंजे या अपने कैनाइन दांत घुसा पा रहा है तो फिर उसके रचना पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए या कोई ऐसा विकल्प अवश्य प्रयोग में लाना चाहिए कि किसी बाघ को ऐसा करने से रोका जा सके। इस प्रकार के बाड़े की रचना का मुख्य उद्देश्य बाघों की तथा बाघों से सुरक्षा, दोनों के अनुसार विकसित करने की आवश्यकता है।
समय आ गया है कि एनटीसीए द्वारा दिए गए बिंदुओं के अनुसार सभी बाघ अभयारण्य तथा अन्य सभी बाघों या तेंदुओं के विचरण वाले जंगल, चिड़िया घर तथा बचाव केन्द्रों में ईस्तेमाल हो रहे पुराने पिंजरों एवं बाड़ो का एक राष्ट्रीय स्तर पर तकनिकी ऑडिट हो, जहां पुराने रचना के पिंजरे हैं जिनसे की बाघों तथा तेंदुओं को खतरा है, उन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए और उनके स्थान पर एनटीसीए के दिशानिर्देशों पर आधारित पिंजरे उपलब्ध कराए जाएं।
किसी भी बाघ या तेंदुओं को, जो कि जंगल में वापस जाने योग्य है, उनके बचाव तथा पुनर्वास में जो सबसे अधिक महवत्पूर्ण बिंदु है वो है उनका जंगल में पुनर्वास सफलता से हो जाना। सम्बंधित वन विभाग का भी मुख्य उद्देश्य यही होना चाहिए कि जिस बाघ या तेंदुओं को हम बचा रहे हैं उसके जंगल में सफलता से वापस जाने की क्षमता, फिर चाहे वो किसी चोट के कारण या फिर अधिक मानव हस्तक्षेप से, को नुक्सान ना पहुंचे। बचाव तथा पुर्नवास की सफलता बाघों के अपने घर को लौट जाने में है, उन्हें हमारी किसी उपेक्षा के परिणामस्वरूप पूरा जीवन कैद में रखने से नहीं।
– प्रकाश श्रीवास्तव

