भारत के पर्व केवल पूजा और अनुष्ठान की परंपराएँ नहीं हैं। वे समाज के अनुभव, परिवार के संबंध, लोक-स्मृति, प्रकृति के प्रति संवेदना और जीवन-मूल्यों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाले सांस्कृतिक माध्यम भी हैं। जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में जितिया या जिउतिया के नाम से जाना जाता है, इसी समृद्ध लोकपरंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है।
नाम की व्युत्पत्ति : जीमूतवाहन से जीवित्पुत्रिका और जितिया
इस पर्व के नाम के पीछे गहरा सांस्कृतिक व भाषाई इतिहास निहित है :
* जीवित्पुत्रिका (संस्कृत) : इसका शाब्दिक अर्थ है वह माता जिसकी संतान जीवित, दीर्घायु और आरोग्य रहे (जीवितः पुत्रः यस्याः सा)।
* जितिया/जिउतिया (लोक-भाषा) : यह संस्कृत शब्द ‘जीवित्पुत्रिका’ का प्राकृत और मैथिली/भोजपुरी/मगही लोकबोली में हुआ सहज अपभ्रंश रूप है।
* जीमूतवाहन से संबंध : धार्मिक मान्यताओं में इस व्रत के मुख्य देवता गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन हैं। जीमूतवाहन के पूजन से जुड़ा होने के कारण कालान्तर में इस व्रत को जीमूतवाहन व्रत या संक्षेप में ‘जितिया’ कहा जाने लगा।
आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माताएँ अपने बालकों के दीर्घ जीवन, आरोग्य और मंगल की कामना से यह व्रत करती हैं। यह तीन दिनों की परंपरा के रूप में दिखाई देता है— नहाय-खाय (सप्तमी) से आरंभ होकर अष्टमी के कठोर निर्जला उपवास और उसके पश्चात नवमी को पारण तक।
मातृत्व और संकल्प का पर्व : जीवन-नौका का प्रतीक
जितिया का केंद्र मातृभाव है। संतान के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की अभिलाषा से माताएँ कठोर व्रत धारण करती हैं। अनेक क्षेत्रों में यह निर्जला व्रत के रूप में रखा जाता है, अर्थात व्रत के निर्धारित समय में अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है।नौका-आभूषण (जीतिया लॉकेट) की लोकमान्यता
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की क्षेत्रीय लोकपरंपरा तथा पारंपरिक स्वर्णकार-शिल्प में माताओं द्वारा गले में धारण किए जाने वाले सोने या चाँदी के जितिया आभूषण का स्वरूप बहुधा नौका (नाव) अथवा जीमूतवाहन के प्रतीक की आकृति जैसा होता है।
क्षेत्रीय लोकमान्यता अनुसार जिस प्रकार एक कुशल नाविक उफनती नदी या भँवर से नौका को सुरक्षित तट पर ले जाता है, उसी प्रकार माता का यह निष्ठावान व्रत और जीमूतवाहन देव की कृपा संतान की ‘जीवन-नौका’ को समस्त विघ्न-बाधाओं से सुरक्षित पार लगाती है। यह आभूषण-शिल्प केवल अलंकरण नहीं, बल्कि मातृ-संकल्प का प्रतीकात्मक लोक-चिह्न है।
चिकित्सकीय दृष्टि से गर्भवती महिलाओं, रोगियों, वृद्धों अथवा किसी स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त व्यक्ति को लंबे समय तक भोजन-जल त्यागने से पूर्व डॉक्टरी परामर्श लेना चाहिए। किंतु सांस्कृतिक दृष्टि से इस व्रत का महत्व इसके दुष्कर होने से अधिक इसके पीछे छिपे संकल्प और भाव में है।
जीमूतवाहन की कथा और त्याग का आदर्श
जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक परंपरा में जीमूतवाहन की कथा विशेष महत्व रखती है। प्रचलित कथा के अनुसार, गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और त्यागी थे। उन्होंने राजपाट त्यागकर वन में निवास किया। वहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि नागवंश को गरुड़ के कोप से बचाने के लिए प्रतिदिन एक नाग की बलि दी जाती है।
जब वृद्धा नागमाता शंखचूड़ के पुत्र की बलि की बारी आई, तो जीमूतवाहन ने उसकी रक्षा हेतु स्वयं को कपड़े में ढँककर बलि-शिला पर प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ जब उन्हें ले जाने लगे, तो जीमूतवाहन के धैर्य और करुणा से प्रभावित होकर उन्होंने उनका वास्तविक परिचय पूछा। जीमूतवाहन का आत्मत्याग देखकर गरुड़ ने नागों की बलि लेने की परंपरा सदा के लिए समाप्त कर दी और सभी मृत नागों को जीवनदान दिया।
यह कथा केवल पौराणिक आख्यान नहीं है; इसका मूल संदेश परहित, साहस, करुणा और आत्मत्याग है— जो एक माता अपनी संतान के लिए और एक श्रेष्ठ नागरिक समाज के लिए धारण करता है।
चील-सियारी की लोककथा : सत्य-निष्ठा और अनुपालन का संदेश
जितिया व्रत की कथाओं में चील और सियारिन (सियारी) की लोककथा अत्यंत लोकप्रिय है, जो व्रत के नियमों के प्रति निष्ठा और लोक-नीति को दर्शाती है:
संक्षिप्त कथा : एक जंगल में चील और सियारिन दोनों सखियाँ थीं। दोनों ने जीमूतवाहन देव के जितिया व्रत का संकल्प लिया। व्रत के दिन चील ने पूरे नियम और निष्ठा के साथ निर्जला उपवास रखा। परंतु सियारिन को अत्यधिक भूख लग गई और उसने श्मशान में जाकर चुपके से माँस और हड्डियाँ चबाकर अपना व्रत खंडित कर लिया।
अगले जन्म में दोनों बहनों के रूप में जन्मीं। चील के रूप में निष्ठापूर्वक व्रत करने वाली बहन की सभी संतानों पर जीमूतवाहन की कृपा रही और वे जीवित व समृद्ध रहीं। जबकि नियम भंग करने वाली सियारिन की संतानों पर विपत्ति आती रही। अंततः जब उसे अपने पूर्वजन्म के नियम-भंग का भान हुआ, तो उसने पश्चाताप किया।
यह लोककथा प्रतीकात्मक रूप से समाज को अनुशासन, संकल्प के प्रति सत्यनिष्ठा और कर्तव्य-पालन का संदेश देती है।
नहाय-खाय से पारण तक : लोकजीवन की लय
जितिया की परंपरा में तीन मुख्य चरण हैं :
* नहाय-खाय (सप्तमी) : पवित्र स्नान के उपरांत सात्विक व पारंपरिक आहार (जैसे नोनी का साग, मडुआ की रोटी, झिंगुनी की सब्जी) ग्रहण करना।
* खुर-जितिया/निर्जला उपवास (अष्टमी) : चौबीस घंटे से अधिक समय का कठोर निर्जला व्रत, जिसमें शाम को स्नान उपरांत जीमूतवाहन देव की पूजा, कथा-श्रवण और रात्रि-जागरण होता है।
* पारण (नवमी) : सूर्योदय के पश्चात निर्धारित शुभ मुहूर्त में पूजन कर पारण सामग्री व जल ग्रहण करके व्रत पूर्ण करना।
यह क्रम शरीर की तैयारी, मानसिक संकल्प, सामूहिक अनुष्ठान और अंत में संतुलित आहार द्वारा सामान्य स्थिति में लौटने की एक सुव्यवस्थित लोक-प्रणाली है।
माटी से बाजार तक : स्थानीय अर्थव्यवस्था और स्वावलंबन
जितिया की परंपरा ग्रामीण अर्थव्यवस्था और बाड़ी-संस्कृति से गहराई से जुड़ी रही है। नहाय-खाय तथा पारण से जुड़े भोजन में प्रयुक्त सामग्रियाँ खेत, बाड़ी और स्थानीय पर्यावरण से प्राप्त होती थीं।
पूर्व में गाँवों में पड़ोसियों और संबंधियों के बीच स्थानीय सब्जियों व घरेलू उपज का सहज आदान-प्रदान सामान्य सामाजिक व्यवहार था। यह पारस्परिक सहयोग, सामुदायिक सहभागिता और स्वावलंबन का अनुपम उदाहरण है।
आज नगरीकरण के दौर में जितिया के अवसर पर फल, पूजन-सामग्री, मडुआ, नोनी साग, झिंगुनी, बाँस की टोकरी, सूत्र (जीतिया धागा) आदि की माँग बढ़ती है। इससे छोटे विक्रेताओं, ग्रामीण उत्पादकों और स्थानीय मौसमी बाजारों को सीधा आर्थिक प्रोत्साहन मिलता है।
पोषण-संस्कृति : आस्था और आधुनिक विज्ञान का संतुलन
जितिया में प्रयुक्त पारंपरिक आहार का पोषण-विज्ञान (Nutritional Science) और उपवास-प्रबंधन (Fasting Dietetics) की दृष्टि से विशेष महत्व है :
* मडुआ/रागी : मडुआ एक निम्न-ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाला कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट है, जो प्रचुर आहार-रेशा, कैल्शियम और आयरन से समृद्ध होता है। निर्जला उपवास से पूर्व (नहाय-खाय) इसका सेवन करने से शरीर को धीमी और निरंतर ऊर्जा मिलती है, जिससे उपवास के दौरान रक्त-शर्करा स्तर में अचानक गिरावट नहीं आती।
* नोनी का साग/कुलफ़ा : यह जंगली/स्थानीय साग वनस्पति जगत में ओमेगा-3 फैटी एसिड (विशेष रूप से अल्फा-लिनोलेनिक एसिड – ALA), एंटीऑक्सिडेंट्स (विटामिन C, E और बीटा-कैरोटीन) तथा खनिजों का सबसे समृद्ध स्रोत माना जाता है। यह पाचन स्वास्थ्य और विषहरण में सहायक है।
* झिंगुनी/तोरई : यह जल-तत्व (Water Content) से भरपूर, अत्यंत हल्की और सुपाच्य सब्जी है। निर्जला उपवास के उपरांत पारण के समय यह संवेदनशील पाचन तंत्र पर बिना भार डाले शरीर में जल व खनिजों की पूर्ति करती है।
ICMR-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN), हैदराबाद भी इन पारंपरिक अनाजों व स्थानीय सब्जियों को उत्कृष्ट पौष्टिक आहार स्वीकार करता है।
लोकगीत, सामूहिकता और पीढ़ियों का संवाद
जितिया का सबसे सुंदर सामाजिक पक्ष इसका स्त्री-केंद्रित लोक-मंच है:
* लोकगीत : व्रत के दौरान महिलाएँ सामूहिक रूप से जो लोकगीत गाती हैं, वे केवल धार्मिक पंक्तियाँ नहीं हैं; उनमें संतान-स्नेह, सामाजिक अनुभव, जीवन के संघर्ष और लोक-विश्वास संजोए होते हैं।
* पीढ़ीगत हस्तांतरण : परिवार की वरिष्ठ महिलाएँ (दादी-नानी) नई पीढ़ी की स्त्रियों को पूजा की विधि, कथा और लोकगीत सिखाती हैं। इस प्रकार वरिष्ठ महिलाएँ एक ‘जीवित सांस्कृतिक अभिलेखागार’ के रूप में परंपरा को आगे बढ़ाती हैं।
* पितृस्मरण से भावी पीढ़ी तक : जितिया का पर्व पितृपक्ष के दौरान पड़ता है। जहाँ पितृपक्ष अतीत (पूर्वजों) के प्रति कृतज्ञता है, वहीं जितिया भविष्य (संतान) के आरोग्य की अभिलाषा है। वर्तमान पीढ़ी इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करती है।
वर्ष 2026 : तिथि एवं पंचांग संदर्भ
पंचांग संदर्भ (वर्ष 2026) :
* नहाय-खाय (सप्तमी) : शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026
* मुख्य निर्जला व्रत (अष्टमी) : शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 (अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को पूरे दिन व्याप्य रहेगी)
* व्रत का पारण (नवमी) : रविवार, 4 अक्टूबर 2026 (प्रातः सूर्योदय के उपरांत उदयातिथि नवमी में पारण किया जाएगा)
(स्थानीय उदयातिथि व पंचांग भेद के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में समय में आंशिक अंतर संभव है।)
ममता से समाज तक
जीवित्पुत्रिका व्रत केवल एक दुष्कर धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह मातृत्व के अमूर्त संकल्प को जीमूतवाहन के त्याग, चील-सियारी की लोक-नीति, मडुआ-नोनी की पोषण-संस्कृति और लोकगीतों की मिठास के साथ जोड़कर एक संपूर्ण सामाजिक ताना-बाना बुनता है।
यह पर्व हमें सिखाता है कि अपनी जड़ों, स्थानीय खाद्य-संस्कृति, पर्यावरण और पारस्परिक संबंधों को सहेजते हुए ही एक स्वस्थ व संवेदनशील समाज का निर्माण संभव है।
– अखिलेश चौधरी

